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इंटरनेशनल विडोज़ डे पर जानें विधवा पेंशन स्कीम के नाम पर मिलने वाले पैसे का सच

हर दूसरे या तीसरे दिन कोई न कोई दिवस आता है. माने किसी प्रोफेशन या रिलेशन या फिर किसी अवेयरनेस प्रोग्राम को डेडिकेट करते हुए हम उस दिवस को मनाते हैं. जैसे 8 मार्च को होता है इंटरनेशनल विमन्स डे. इस दिन हम हर लड़की या महिला को हैप्पी इंटरनेशनल विमन्स डे कहते हैं, बड़े शान से. इसी तरह आज भी एक दिवस है. लेकिन इसे मनाते वक्त इसके आगे हम हैप्पी शब्द का इस्तेमाल नहीं कर सकते. क्योंकि आज है इंटरनेशनल विडोज़ डे यानी अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस. ये दिन दुनिया की उन औरतों को समर्पित है, जिन्होंने अपना लाइफ पार्टनर खो दिया है. ऐसी औरतों की ज़िंदगी आसान नहीं होती. खासतौर पर भारत में. उन्हें न केवल आर्थिक परेशानी होती है, बल्कि सामाजिक तौर पर भी उन्हें कई सारी बेड़ियों में बांध दिया जाता है. आज इंटरनेशनल विडोज़ डे पर हम इन्हीं औरतों के बारे में बात करेंगे. बताएंगे कि इस दिन की शुरुआत कब और क्यों हुई? और भारत में विधवा औरतों के क्या हाल हैं? सरकार की तरफ से उन्हें कोई मदद मिलती भी है या नहीं? सब बताएंगे एक-एक करके.

शुरुआत एक कहानी से करते हैं. साल 1954 की बात है. पंजाब के धिलवान टाउन में एक लोकल व्यापारी जागिरी लाल लूम्बा अपने परिवार के साथ रहता था. टीबी के चलते 23 जून 1954 के दिन उसकी मौत हो गई. उसकी 37 बरस की पत्नी पुष्पा वति के ज़िम्मे सात बच्चों को पालने की ज़िम्मेदारी आ गई. इन बच्चों में 10 साल का एक लड़का था, जिसका नाम था राज. पिता की मौत के दिन उसने अपने घर में कुछ ऐसा देखा, जिसे वो ज़िंदगी भर नहीं भूल सका. राज की दादी ने पुष्पा वति को ऑर्डर दिया कि वो अपने सारे गहने, चूड़ियां, बिंदी सब उतार दे, और सफेद साड़ी पहनना शुरू कर दे. पुष्पा अचानक ही एक खुशहाल शादीशुदा औरत से दुखी, उजड़ी हुई विधवा औरत बन गई.

राज बड़ा हुआ, उसने शादी की. शादी के मौके पर पुजारी ने पुष्पा से कहा कि वो रस्मों से दूर रहे, क्योंकि वो विधवा है और उसकी मौजूदगी से उसके बेटे के जीवन में बदकिस्मती आ सकती है. राज के दिमाग में आया कि एक मां, जो अपने बेटे से बहुत प्यार करती हो, उसकी केयर करती हो, शादी में उसकी मौजूदगी बेड लक कैसे ला सकती है? ऐसे कुछ-कुछ वाकये राज ने अपनी मां के साथ होते देखे. वो अच्छी तरह समझता था कि ये सोसायटी किस तरह एक विधवा की ज़िंदगी में मुश्किलें लाती है. राज फिर चला गया यूके. बड़ा बिज़नेसमेन बन गया. चूंकि उसके पिता व्यापारी थे, तो पैसे की कमी नहीं थी. इसलिए पुष्पा को अपने सातों बच्चों को पालने में आर्थिक तौर पर कोई दिक्कत नहीं हुई. लेकिन राज ये बात भी जानता था कि अगर उसकी मां के पास पैसे नहीं होते, तो वो अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा नहीं पाती और उनकी ज़िंदगी बहुत अलग होती.

Raj Loomba And Pushpa Lumba
पुष्पा वति लूंबा और राज लूंबा. (फोटो- लूंबा फाउंडेशन वेबसाइट)

ये सारी बातें राज के दिमाग में चल ही रही थीं कि 90 के दशक में पुष्पा की मौत हो गई. इसके बाद राज ने अपनी पत्नी वीना के साथ मिलकर मां की मौत के पांच साल बाद एक ट्रस्ट शुरू किया. नाम दिया श्रीमति पुष्पा वति लूम्बा ट्रस्ट. इसका मकसद था विधवा औरतों को लेकर हो रहा भेदभाव खत्म करना और उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा देना. मौजूदा समय में इस ट्रस्ट को द लूम्बा फाउंडेशन के नाम से हम जानते हैं. इसी फाउंडेशन ने साल 2005 में इंटरनेशनल विडोज़ डे की शुरुआत की. चूंकि 23 जून 1954 को राज के पिता का निधन हुआ था, इसलिए इसी दिन को चुना गया. दिसंबर 2010 में UN यानी यूनाइटेड नेशन्स ने भी 23 जून को इंटरनेशनल विडोज़ डे के तौर पर मान्यता दे दी. इस दिन को मनाने का मकसद है कि दुनियाभर की विधवा औरतों को सशक्त बनाने की तरफ काम किया जाए. उनके साथ होने वाले भेदभाव के खिलाफ जागरूकता लाई जाए.

भारत में क्या स्कीम्स चलाई जा रही हैं?

UN की मानें तो दुनियाभर में करीब 258 मिलियन यानी 25 करोड़ 80 लाख विधवा औरतें हैं. साल 2011 में भारत में हुई जनगणना के मुताबिक, हमारे देश में चार करोड़ 32 लाख विधवा औरतें हैं. ये सच है कि हमारे देश में औरतें भी अब नौकरियां करने आगे आ रही हैं, लेकिन ये भी सच है कि औरतों की कुल जनसंख्या का बड़ा हिस्सा आज भी पैसों के मामले में पुरुषों पर ही निर्भर है. ऐसे में जब घर चलाने वाले पति की मौत हो जाए, तो औरतों को बहुत दिक्कत होती है. और अगर बच्चे रहें, वो भी छोटे रहें तो ये दिक्कत दोगुनी हो जाती है. ऐसी औरतों की मदद के लिए हमारी सरकार ने कई सारी स्कीम्स की शुरुआत की है. हम केंद्र सरकार द्वारा चलाई जा रही कुछ अहम स्कीम्स के बारे में आपको बताते हैं.

जून 2019 में महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने लोकसभा में एक सवाल का लिखित जवाब दिया था. जिसमें विधवाओं के लिए चलाई जा रही स्कीम्स की जानकारी दी गई थी. इनमें से कुछ स्कीम्स सीधे विधवाओं पर फोकस करती हैं, तो कुछ ऐसी हैं, जो जनसंख्या के बड़े हिस्से को कवर करती हैं और इस हिस्से का एक पार्ट विधवा औरतें भी हैं.

पहली स्कीम है इंदिरा गांधी नेशनल विडो पेंशन स्कीम, शॉर्ट में इसे IGNWPS कहते हैं. साल 1995 में इसे केंद्र सरकार ने लॉन्च किया था. नेशनल सोशल असिस्टेंस प्रोग्राम के तहत. इसमें गरीबी रेखा यानी BPL कैटेगिरी में आने वाली विधवा औरतों को हर महीने विधवा पेंशन के तौर पर 300 रुपए मिलते हैं. 40 से 79 साल के बीच की विधवा औरतों को 300 रुपए और 80 या उससे ज्यादा उम्र की औरतों को 500 रुपए. इसके लिए ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों की तरीकों से रजिस्ट्रेशन कराया जा सकता है. ये स्कीम करीब करीब सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू है. खैर, जहां एक किलो दाल 100-150 रुपए से कम में न मिल रही हो, वहां महीने के 300 रुपए क्या बदलाव लाएंगे, ये आप खुद ही सोच लीजिए.

International Widows Day 2
स्मृति ईरानी ने इन स्कीम्स की जानकारी जून 2019 में दी थी.

अगली स्कीम है होम फॉर विडोज़. इसके तहत यूपी के वृंदावन में विधवाओं के लिए एक घर बनाया गया है. जहां करीब 1000 औरतों के रहने का अरैंजमेंट है. केंद्र सरकार की एक और स्कीम है, नाम है नेशनल फैमिली बेनिफिट स्कीम, शॉर्ट में NFBS. ये स्कीम ग्रामीण विकास मंत्रालय के तहत काम करती है, इसके तहत उस घर के लोगों को 20 हज़ार रुपए दिए जाते हैं, जहां मुख्य कमाने वाले व्यक्ति की मौत हो जाए. अगली स्कीम है स्वाधार गृह योजना. WCD मिनिस्ट्री इसे चला रही है. इसके तहत बेसहारा और ज़रूरतमंद औरतों को रहने की जगह दी जाती है. वो आगे अपनी ज़िंदगी संभाल सकें, इसके लिए उन्हें ट्रेनिंग वगैरह भी दी जाती है. WCD की ही एक और योजना है, नाम है महिला शक्ति केंद्र स्कीम. इसके तहत कम्युनिटी पार्टिसिपेशन के तहत ग्रामीण इलाकों की औरतों को सशक्त बनाने की तरफ काम किया जाता है. ऐसा माहौल बनाया जाता है, जहां ये औरतें ये जान सकें कि वो आगे क्या-क्या कर सकती हैं.

अब बात प्रधानमंत्री आवास योजना, इसके तहत तो खैर पुरुष और महिला दोनों ही कवर होते हैं, लेकिन महिलाओं को इसमें ज्यादा लाभ दिया जाता है, जैसे हाउसिंग लोन के लिए इंटरेस्ट कम होता है. EMI भी कम होती है. इसके अलावा एक अन्य योजना है जो सैनिकों की विधवाओं के लिए बनाई गई है. नाम है- Assistance for vocational training of widows of ex-servicemen. इसके तहत सैनिकों की विधवाओं आर्थिक लाभ दिया जाता है, प्रशिक्षिण दिया जाता है और गंभीर बीमारी में ट्रीटमेंट मिलता है.

ये कुछ अहम स्कीम्स हमने आपको बताई हैं. इनमें से बहुत ही कम स्कीम्स ऐसी हैं, जो सीधे तौर पर केवल विधवा औरतों पर फोकस करती हों. ज्यादातर स्कीम्स जनसंख्या के बड़े वर्ग को कवर करती हैं, जिनका एक हिस्सा विधवा औरतें हैं. इन स्कीम्स को केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालय सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू करवाते हैं. इनके अलावा भी अलग-अलग राज्य सरकारें अपने स्तर पर विधवा औरतों के लिए स्कीम्स लॉन्च करती रही हैं. जैसे मध्य प्रदेश की बात करें तो यहां कन्या विवाह योजना के तहत गरीब लड़कियां, विधवा औरतों का सामूहिक विवाह कराया जाता है. पंजाब में 60 हज़ार से कम की एनुअल इनकम वाली विधवा महिला को प्रति माह 750 रुपए देने का प्रावधान है.

एक्सपर्ट्स क्या कहते हैं?

जितनी भी स्कीम्स के बारे हमने आपको बताया, उनके बारे में इतनी जानकारी पाने के लिए भी हमें कई बार गूगल पर अलग-अलग कीवर्ड्स डालकर सर्च करना पड़ा. तब कहीं जाकर इतना पता लगा. सरकारी वेबसाइट्स ठीक से खुलती नहीं हैं. आसान भाषा में सटीक जानकारी नहीं होती है. यानी सूचना का अभाव है. ये हमने हमारा एक्सपीरियंस बताया, अब आप सोचिए कि एक विधवा महिला, और अगर वो अनपढ़ है, तो उस तक ये जानकारी कैसे पहुंचेगी. चलिए किसी भी तरह से पहुंच भी गई, तो भी इन योजनाओं का लाभ उठाने के लिए उसे दर-दर भटकना पड़ता है. ये हम नहीं कह रहे हैं, हमारे सामने रोज़ाना कई ऐसी खबरें आती हैं, जो चीख-चीखकर बताती हैं कि सरकारी सुविधाओं का लाभ ज़रूरत मंद तक नहीं पहुंच रहा. कहीं विधवा औरत को पेंशन के लिए चक्कर काटने पड़ते हैं, तो कहीं घर के अभाव में शौचालय में रहना पड़ता है. विधवाओं के लिए काम करने वाले कुछ लोगों से हमने बात की, वो साफ कहते हैं कि सरकार केवल नाम के लिए ही विधवा पेंशन योजना चला रही है. MIW के मैनेजिंग ट्रस्टी आचार्य भास्कर वर्मा कहते हैं-

“इतनी महंगाई में विधवा औरतों को हज़ार रुपए या 1500 रुपए महीना कहीं से मिल रहा है, तो मैं तो ये कहूंगा कि ये शर्म की बात है. आप केवल नाम के लिए विधवाओं के लिए पेंशन योजना चला रहे हैं. मतलब बस एक नाम चल रहा है लाभ कुछ नहीं है. असल में हमारी सरकारें कुछ करना नहीं चाहतीं. मैं उदाहरण देता हूं, अभी कोरोना वैक्सीन का टीकाकरण हुआ, आधार कार्ड को बस लिंक कराना था, बाकी काम हो जा रहा था. कितनी आसानी से हुआ. कोई मुश्किल काम है नहीं. बहुत आसान काम है. लेकिन पेंशन की बात करें तो यहां फॉर्म दे दिया गया. उसे भरो. ऐसे में जो कम पढ़े-लिखे हैं, उन्हें फॉर्म भरने में दिक्कत आती है. फिर उसे जमा कराओ, कई सारे डॉक्यूमेंट्स लेकर आओ. फिर जमा कराओ, वैरिफाई कराओ. कई बार चक्कर लगाओ. तो असल में ये प्रोसेस बहुत लंबी है. अगर सरकार वाकई कुछ करना चाहती, तो जैसे टीकाकरण घर-घर जाकर हुआ है, वैसा पेंशन स्कीम्स में भी हो सकता था. लेकिन इतना डॉक्यूमेंटेशन इसलिए है क्योंकि सरकार करना ही नहीं चाहती. नहीं तो ऐसा गरीब आदमी जो चार बार चक्कर लगाता है वो थक जाता है. पेंशन नहीं मिलती उसे. एक विधवा महिला कितनी बार चक्कर लगाएगी, कहां जाएगी, किससे पता करेगी. कोई ऐसी योजना नहीं है, कोई ट्रांसपेरेंसी नहीं है.”

सोशल एक्टिविस्ट मीनू त्रेहन कहती हैं-

“विधवा औरतों को सरकारी की तरफ से जो पेंशन मिलती है, वो है 300, 400 रुपए महीना. इसमें उन्हें पूरे महीने का गुजारा करना होता है. बाकी सुविधाएं उनको थोड़ी बहुत उस आश्रम से मिल जाती हैं, जहां वो रह रही हैं. लेकिन बाकी सुविधा पेंशन से ही मिल पाती है. रही बात डॉक्यूमेंटेशन की, तो आश्रम में रहने वाली औरतों को तो आश्रम की तरफ से मदद मिल जाती है डॉक्यूमेंटेशन में, लेकिन जो पढ़ा-लिखा नहीं है उसे आगे जाकर दिक्कत का सामना करना पड़ता है. कई बार औरतें बैंक तक नहीं पहुंच पातीं. या फिर पेंशन बैंक में आ जाती है, लेकिन उन तक नहीं पहुंच पाती. मिलते भी हैं तो 300 रुपए. क्या गुजारा होगा इतने पैसे में. आश्रम में रहने वाली औरतों को खाना वगैरह तो मिल जाता है वहां से, लेकिन बाकी ज़रूरतें ऐसी हैं, जो पेंशन के सहारे पूरी होती हैं. लेकिन 300 में ये नहीं हो पाता. कम से कम 1000 रुपए महीने तक तो होना चाहिए. ताकि वो दवा तो खरीद सकें.”

ये तो हो गई आर्थिक पहलू की बात. अब चलते हैं सामाजिक पहलू की तरफ. आज भी आप किसी भी शादी में देख लीजिए, कोई भी शुभ काम में देख लीजिए, विधवा औरतों को पार्टिसिपेट नहीं करने दिया जाता. उनसे ये उम्मीद की जाती है कि चूंकि उनका पति चला गया है, तो वो सादे कपड़े पहनें, सजे-संवरे नहीं. क्यों? क्योंकि आज भी औरत के अस्तित्व को पुरुष के होने, न होने से डिफाइन किया जाता है. विधवा शब्द तो इसका जीता जागता उदाहरण है. ये शब्द ही अपने आप में असीम दुख समेटे हुए है. ये सच है कि पार्टनर का जाना बड़ा नुकसान होता है, खासतौर पर तब जब आप वाकई एक-दूसरे से प्यार करते हों. लेकिन ये भी सच है कि किसी के चले जाने से ज़िंदगी खत्म नहीं होती. तो क्यों कोई जीना छोड़े. किसी महिला के पति के जाने से हमें ये नहीं सोचना चाहिए कि उसकी पत्नी का अस्तित्व खत्म हो गया, नहीं हुआ. क्योंकि वो खुद अपने आप में एक संपूर्ण इंसान है. ऐसा भी देखने को मिला है कि जो औरत पति की मौत के बाद भी अपने रहन-सहन में कोई बदलाव न करे, तो भी उसे टोचा जाता है. नाम धरा जाता है. आर्थिक मदद देना न देना, सरकार के हाथ में है, लेकिन किसी विधवा औरत की सामाजिक मदद करना हमारे हाथ में है.


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