Submit your post

Follow Us

कोरोना काल में जहां अपने भी पराए हो रहे, वहां इन औरतों ने कायम की नई मिसाल

एक तस्वीर काफी वायरल हो रही है. जिसमें PPE किट पहनी एक महिला एक मरीज़ के बालों पर कंघी फेर रही है. ये तस्वीर ट्विटर पर IAS अधिकारी प्रियंका शुक्ला ने पोस्ट की है. हमें नहीं पता कि PPE किट के अंदर जो हैं, उनका नाम क्या है. उम्र क्या है. लेकिन ये एक ऐसी तस्वीर है जो इस मुश्किल समय में हमें उम्मीद देती है. एक तरफ जहां प्रशासन और सरकार कोविड के मरीज़ों से हाथ छुड़ाते दिख रहे हैं, वहीं ये तस्वीर इस बात का एग्ज़ाम्पल है कि आज भी इंसान एक-दूसरे के साथ है.

ये तस्वीर रायपुर के आंबेडकर अस्पताल की है. PPE किट के अंदर एक नर्स है. इस फोटो को लोग “हैप्पी इंटरनेशनल नर्सेज़ डे” कहकर शेयर कर रहे हैं. इसी तस्वीर के बहाने हम आपको आज हमारे देश की नर्सों के कामकाज से रूबरू करवाएंगे. और बताएंगे कि आज ही इंटरनेशनल नर्सेज़ डे क्यों मनाया जाता है.

क्या होता है ‘नर्स’ का मतलब?

ये जो शब्द है न ‘नर्स’, ये लैटिन भाषा के नूट्रायर (Nutrire) शब्द से बना है, जिसका मतलब होता है दूध पिलाना या पोषण देना. इसी शब्द के विकसित रूप nourish, nutrition या nursery है. इन सभी शब्दों का मतलब जुड़ा है पोषण से, ख्याल रखने से. माने जो नर्स शब्द है उसका सीधा मतलब है किसी का ख्याल रखने वाला व्यक्ति. अब देखिए, हमारी दुनिया धीरे-धीरे विकसित हुई और अभी भी हो रही है. अभी जैसे हमारे पास प्रॉपर हेल्थ केयर सिस्टम है, वैसा सिस्टम आज से करीब 250-300 साल तक एग्जिस्ट नहीं करता था. इसलिए अगर कोई व्यक्ति बीमार पड़ता था, तो उसकी देखरेख करने के लिए आस-पास की औरतों को पैसे दिए जाते थे. यूरोप के कुछ देशों में धार्मिक संगठन नर्सिंग की सुविधा मुहैया कराते थे. कुछ भी प्रॉपर नहीं था. ‘victorianweb.org’ नाम की एक वेबसाइट है, इसके मुताबिक 17वीं सदी के शुरुआती बरसों में तो नर्सों को प्रॉस्टिट्यूट की तरह ही समझा जाता था, इस प्रोफेशन के बारे में लोग ऐसा सोचते थे कि इसके लिए कोई निश्चित पढ़ाई की ज़रूरत नहीं है. भारत में भी कुछ इसी तरह का सीन था. गांवों में गर्भवती महिला की डिलीवरी कराने के लिए दाई होती थी, जो मां और बच्चे दोनों का ख्याल रखती थी. इसे हम एक तरह से नर्सिंग का सबसे शुरुआती चरण मान सकते हैं.

कैसे नर्सिंग प्रोफेशन को नई पहचान मिली?

ऐसा नहीं है कि एक झटके में ये अव्यवस्थित सा प्रोफेशन बढ़िया व्यवस्थित हो गया. समय-समय पर हुई छोटी-छोटी प्रोग्रेस और बदलाव की वजह से इसे मौजूदा रूप मिला है. और इसका सबसे बड़ा क्रेडिट जाता है फ्लोरेंस नाइटिंगेल को. कौन हैं ये? बताते हैं. 1820 में इनका जन्म हुआ था, एक धनी ब्रिटिश परिवार में. पैरेंट्स चाहते थे कि अच्छे घर में शादी हो जाए, इसलिए पढ़ाया-लिखाया और शादी की तैयारी शुरू कर दी. लेकिन फ्लोरेंस को तो दूसरों की सेवा करना पसंद था. वो नर्स बनना चाहती थीं. परिवार वाले इसके खिलाफ थे, उन्हें लगता था कि ये उनकी प्रतिष्ठा से मेल नहीं खाता. परिवार ने मना कर दिया. फिर फ्लोरेंस ने कह दिया कि वो कभी शादी नहीं करेंगी और निकल पड़ीं अपनी नर्सिंग की ट्रेनिंग के लिए. खुद सीखकर उन्होंने बाकी महिलाओं को भी नर्सिंग में ट्रेनिंग देनी शुरू की.

Florence Nightingale (2)
फ्लोरेंस नाइटिंगेल ने नर्सिंग की फील्ड में काफी अहम बदलाव किए थे. (फोटो- Getty)

फिर आया साल 1853. इस साल शुरू हुआ क्रीमियन वॉर. 1856 तक चला. एक तरफ रूस था, तो दूसरी तरफ ऑटोमन एम्पायर, यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, और सारडीनिया. इस युद्ध में ब्रिटेन के कई सैनिक घायल हुए. तब फ्लोरेंस अपने साथ ट्रेन्ड हुईं 38 नर्सों को लेकर सैनिकों की सेवा के लिए पहुंच गईं. उन्होंने देखा कि युद्ध में लगी चोटों और घावों से ज्यादा आस-पास की गंदगी, और उससे फैली बीमारियां सैनिकों की जान ले रही थीं. जैसे टाइफाइड, कॉलरा, दस्त. फिर ब्रिटेन की सरकार की मदद से फ्लोरेंस ने एक अस्पताल बनवाया. मरीज़ों की साफ-सफाई पर खासा फोकस किया. इससे मरने वालों की संख्या में तेज़ी से कमी आई. फ्लोरेंस जब सैनिकों का ध्यान रख रही थीं, तब रोज़ रात में हाथ में एक जलता हुआ लैंप लेकर अस्पताल का राउंड लेती थीं, इस वजह से उन्हें लेडी विद द लैंप भी कहा जाता था. इसके बाद उन्होंने 1860 में नाइटिंगेल ट्रेनिंग स्कूल भी खोला, जहां नर्सिंग की प्रोफेशनल ट्रेनिंग शुरू हुई. और इन्हीं फ्लोरेंस नाइटिंगेल के जन्मदिन के मौके पर मनाया जाता है इंटरनेशनल नर्सेज़ डे.

Florence Nightingale (1)
फ्लोरेंस नाइटिंगेल रात में लैम्प लेकर अस्पताल का दौरा करती थीं. (फोटो- Getty)

अब करते हैं भारत की बात. यहां 1857 की क्रांति के दौरान फ्लोरेंस की नज़र भारत पर पड़ी. उन्होंने तुरंत भारत में सेवा देने की इच्छा जताई. हालांकि उनकी सेवा की ज़रूरत नहीं थी, लेकिन फिर भी उन्होंने भारत की सैनिटेशन व्यवस्था पर एक स्टडी कर डाली. उनके सुझावों पर तब की ब्रिटिश सरकार ने एक सैनिटरी डिपार्टमेंट बनाया. फ्लोरेंस कभी भारत नहीं आईं लेकिन उन्होंने अपने एक पेपर में भारत की गरीबी और खस्ताहाल सैनिटेशन पर ज़रूर फोकस किया. ये बात थी 1860 के आस-पास की.

‘इंडियन नर्सिंग काउंसिल’ के प्रेसिडेंट टी. दिलीप कुमार अपने एक आर्टिकल में बताते हैं कि फ्लोरेंस के भारत में ध्यान देने के पहले ही कुछ-कुछ अस्पताल यहां खुल गए थे, लेकिन उनके सुझावों के बाद भारत में प्रोफेशनल नर्सिंग पर ज्यादा ध्यान दिया गया. 1867 में दिल्ली में सेंट स्टीवन्स अस्पताल खोला गया, जिसका मकसद औरतों को नर्सिंग की ट्रेनिंग देना था. 1871 में मद्रास में गवर्नमेंट जनरल अस्पताल खोला गया, जहां शुरुआत में चार स्टूडेंट्स ने दाखिला लिया था, इन्हें मिडवाइव्स यानी डिलीवरी कराने वाली नर्स की ट्रेनिंग दी गई. इसके बाद तो एक के बाद एक कई सारे नर्सिंग इंस्टीट्यूट भारत में खुलने लगे. 1949 में इंडियन नर्सिंग काउंसिल यानी INC की स्थापना हुई, ये भारत सरकार की एक ऑटोनॉमस बॉडी है, नर्सिंग को लेकर जो भी फैसले राष्ट्रीय स्तर पर होते हैं, सब इस काउंसिल के अंडर ही होता है. इस काउंसिल से जुड़ा एक्ट 1947 में ही पास हो गया था, यानी आज़ादी के बाद से ही भारत सरकार ने नर्सिंग को एक ऑर्गेनाइज़्ड प्रोफेशन का दर्जा दे दिया था.

क्या कहती हैं हमारी नर्सेज़?

नर्सें केवल अस्पताल में सेवा नहीं देती हैं, वो युद्ध में भी घायल सैनिकों की सेवा करती हैं. इसके अलावा जब-जब भी ये दुनिया किसी माहामारी की चपेट में आई, तब-तब नर्सों ने बढ़-चढ़कर सेवा दी. अभी कोरोना वायरस का कहर पूरी दुनिया में बरपा हुआ है. इस दौरान हमारी नर्सें क्या एक्सपीरियंस कर रही हैं, ये जानने के लिए हमने कुछ नर्सेज़ से बात की. दिल्ली के फोर्टिस अस्पताल में पोस्टेड नर्स हज़मा कहती हैं-

“पहले कोविड ड्यूटी में हमें बहुत डर लगता था. कई बार दम सा घुटता था. घर जाने में भी डर लगता था कि घरवाले कहीं पॉज़िटिव न हो जाएं मेरी वजह से. क्योंकि हम लोगों को तो कोविड में हेल्थ इंश्योरेंस मिलता है तो हमारा तो इलाज हो जाता है, लेकिन घरवालों का नहीं हो पाता. इसलिए हम लगातार उन्हें जागरूक करते रहते हैं. बताते हैं कि सोशल डिस्टेंसिंग कितना ज़रूरी है. हमें अभी इतना डर नहीं लगता. हम पेशेंट को परिवार की तरह ट्रीट करते हैं.”

Hazama

डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर अस्पताल, रायपुर की स्टाफ नर्स नीलिमा शर्मा कहती हैं-

“हमारी ड्यूटी 14 दिन की होती है, इसमें कोई रेस्ट नहीं होता और इसमें हमें मॉर्निंग ईवनिंग और नाइट तीनों शिफ्ट करना होता है. ड्यूटी के दौरान हम बहुत थक जाते हैं, खासतौर पर नाइट में. क्योंकि नाइट ड्यूटी हमारी 12 घंटे की हो जाती है. उसके बाद जो मॉर्निंग और ईवनिंग ड्यूटी है उसमें भी हम लगातार काम करते हैं. क्योंकि मरीज़ बहुत दुखी, लाचार होते हैं, परिवार का कोई उनके साथ नहीं होता है. कोरोना के कारण हम परिवार को साथ नहीं रखते. सारी व्यवस्था मेडिकल स्टाफ ही करता है. कोविड की पहली वेव के दौरान हम घर नहीं जा पाते थे, हॉस्टल में रहते थे. ये मानसिक तौर पर भी बहुत पीड़ादायक होता था.”

Neelima

डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर अस्पताल, रायपुर की स्टाफ नर्स विमला सिन्हा कहती हैं-

“मैं जब पहली बार घर से बाहर गई थी कोविड ड्यूटी पर, तब बहुत डरी थी. तब बच्चे और पति ने समझाया कि नर्सिंग जॉब में आए हो, तो इससे नहीं डरना है. और ऐसा ही हुआ. मैं 14 दिन तक हॉस्टल में रही. ड्यूटी के दौरान सबकुछ भुलाकर मैंने काम किया. किट पहनने से तकलीफ होती थी, लेकिन ड्यूटी करते वक्त 6 घंटे कैसे बीत जाते थे, पता ही नहीं चलता था. दूसरी बार दिसंबर में मेरी ड्यूटी लगी थी, उस समय मरीज़ों की संख्या बढ़ी हुई थी. इस दौरान भी मैं 14 दिन घर से बाहर रही थी. बच्चों से दूर थी. अभी मौजूदा लहर में मैं खुद कोरोना पॉज़िटिव हूं, तो ड्यूटी पर नहीं जा रही हूं.”

Vimla

नर्सिंग एक नोबेल प्रोफेशन है. जब कोई मरीज़ क्रिटिकल कंडिशन में अस्पताल में भर्ती हो, और इलाज के बाद ठीक हो जाए, तो कहा जाता है कि डॉक्टर ने अच्छा इलाज दिया. कभी कोई ये नहीं कहता कि नर्स ने सही ध्यान रखा. हम ये नहीं कह रहे कि डॉक्टर का योगदान नहीं है, है पूरा योगदान है, लेकिन नर्सों के कॉन्ट्रिब्यूशन को भी नकारा नहीं जा सकता. पेशेंट को अगर कोई दिक्कत होती है तो ख्याल रखने के लिए नर्स होती है, उसे दवा देना, उसे ड्रिप चढ़ाना, ये सब नर्सें देखती हैं. लेकिन फिर भी हमारे देश में इस प्रोफेशन को बदले में जितना पैसा मिलना चाहिए, उतना मिलता नहीं है. अगर किसी सरकारी अस्पताल में नर्स हैं तो बढ़िया, सैलेरी अच्छी होगी, लेकिन ये भी सोचिए कि सरकारी अस्पतालों के लिए वैकेंसी निकलती ही कितनी है, निकलती भी है तो आउटसोर्सिंग के ज़रिए नर्सों को हायर कर लिया जाता है, परमानेंट नहीं होतीं, ऐसे में सैलेरी भी ज़रा सी ही मिलती है. कितने-कितने घंटे काम करना होता है, क्या काम होता है, ये सब हमें बताया दिल्ली के एक प्राइवेट अस्पताल में पोस्टेड एक नर्स ने.

दिल्ली के एक प्राइवेट अस्पताल की नर्सिंग इन-चार्ज विवेकी कपूर कहती हैं-

“पहले नर्सों को अस्पताल में मुफ्त इलाज मिलता था. और उनके साथ वालों को भी मिलता था. लेकिन अभी प्राइवेट अस्पताल का सीन ऐसा हो गया है, जैसे आप अगर होटल में काम कर रहे हो तो खाना खाने बाहर जाओगे. अगर रोड किनारे किसी का एक्सीडेंट हो जाता है, तो उसका फ्री में इलाज होता है. लेकिन नर्सेज़ के साथ ऐसा नहीं होता. वो उसी अस्पताल में ट्रीट कर रही हैं, लेकिन अगर नर्स खुद बीमार हो जाए या उसके परिवार के किसी व्यक्ति को इलाज की ज़रूरत हो तो उसे पैसों से ही इलाज कराना होगा. कोई इंश्योरेंस नहीं है. पहले हुआ करता था, लेकिन अब बंद कर दिया गया. काम भी बहुत देर तक करना पड़ता है. खाना खाने का टाइम नहीं होता. कभी कोई चिल्लाता है तो कभी कोई. सैलेरी भी ज्यादा नहीं है.”

Viveki

‘इंडियन नर्सिंग काउंसिल’ की वेबसाइट के मुताबिक नर्सिंग के सात तरह के कोर्स हमारे देश में होते हैं. ज्यादातर अस्पतालों में पोस्टेड नर्सें B.Sc इन नर्सिंग होती हैं, हालांकि पढ़ाई का लेवल ANM से शुरू होकर पीएचडी तक भी जाता है. पढ़ाई के स्तर और काम के एक्सपीरियंस के हिसाब से ही अस्पतालों में नर्सों को पद दिया जाता है. यूनाइटेड नर्सिंग एसोसिएशन यानी UNA के प्रेसिडेंट जोशी मैथ्यू बताते हैं कि सबसे पहले नर्सों को अस्पताल में, खासतौर पर प्राइवेट अस्पतालों में छह महीने के प्रोबेशन पीरियड पर रखा जाता है, उसके बाद जूनियर स्टाफ नर्स बनाया जाता है, फिर सीनियर स्टाफ नर्स बनाते हैं. इसके बाद टीम लीडर बनाया जाता है, नर्सिंग इन-चार्ज बनाया जाता है. स्टाफ नर्स की ही ड्यूटी को ही रोटेट करके अलग-अलग जगहों पर पोस्ट किया जाता है. ये ज़िम्मा नर्सिंग इन-चार्ज का होता है. प्राइवेट अस्पताल में काम करने वाली एक नर्स बताती हैं कि काम बहुत होता है, पद भी बढ़ता है, लेकिन सैलेरी मुश्किल से एक या दो हज़ार ही बढ़ती है. प्राइवेट अस्पतालों में नर्सों की स्टार्टिंग सैलेरी 15 से 20 हज़ार के बीच होती है.

भारत में इस वक्त लगभग 3 लाख से कुछ कम नर्स हैं. ये आंकड़ा फाइनेंस कमिशन की एक रिपोर्ट के ज़रिए सामने आया. अगर औसत निकालें तो 670 पेशेंट्स में एक नर्स हैं. हालांकि इन नर्सों में महिलाएं कितनी हैं और पुरुष कितने, इसका एग्जेक्ट आंकड़ा हमें नहीं पता. लेकिन एम्स नागपुर की एक नोटिफिकेशन के बाद बीते साल काफी हल्ला देखा था. और ट्विटर पर भी इसपर खूब बहस हुई. नोटिफिकेशन में नर्स भर्ती में 80 फीसद महिलाओं के रिजर्वेशन की बात लिखी हुई थी.

आप खुद भी देखेंगे कि अस्पतालों में अक्सर फीमेल नर्स ही होती हैं. बल्कि नर्स का अर्थ ही लोग महिला नर्स से लगाते हैं. इस शब्द को सुनकर कभी पुरुष की कल्पना नहीं करते. नर्सिंग प्रोफेशन को लोग औरतों का प्रोफेशन ही मानते हैं. सवाल उठता है ऐसा क्यों? जवाब है इस प्रोफेशन का नेचर. नर्सिंग माने केयर करना. और किसी भी घर में आप देख लीजिए बड़ों की, बच्चों की, इनकी केयर का ज़िम्मा अपने आप ही महिलाओं के पास आ जाता है. औरतों को पुरुषों की तुलना में ज्यादा इमोशनल माना गया है, इसलिए ऐसा समझा जाता है कि औरतें ही इमोशन्स के साथ सही केयर दे सकती हैं. जबकि किसी की केयर करना असल में उसके जेंडर से तय नहीं हो सकता. हालांकि समय के साथ-साथ पुरुष भी नर्सिंग के प्रोफेशन में आ रहे हैं, लेकिन फिर भी उनकी संख्या कम ही है.

खबर की शुरुआत हमने एक तस्वीर से की थी, अंत भी एक तस्वीर से ही करते हैं. ये देखिए-

Nurse Day

दरअसल, दुनिया के हर कोने में 12 मई को नर्सेज़ डे मनाया गया. एक तस्वीर कोयंबटूर के ESI अस्पताल से आई. यहां नर्सेज़ डे सेलिब्रेशन के दौरान डीन नर्सों के चरणों में झुक गए, और बहुत इमोशनल स्पीच भी दी.


वीडियो देखें: कोविड ड्यूटी में लगीं महिला पुलिस अफसरों ने सुनाई परेशान करने वाली आपबीती

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

क्राइम

मुसलमान औरतों  पर अश्लील चर्चा कर उनकी बोलियां लगाने वालों के बुरे दिन शुरू

मुसलमान औरतों पर अश्लील चर्चा कर उनकी बोलियां लगाने वालों के बुरे दिन शुरू

'सुल्ली डील्स' मामले में दर्ज हुई FIR. आरोपियों को ट्रेस करने में जुटी पुलिस.

9 साल की बच्ची के रेप मामले में BJP नेता के खिलाफ पुलिस ने चार्जशीट फाइल कर दी है

9 साल की बच्ची के रेप मामले में BJP नेता के खिलाफ पुलिस ने चार्जशीट फाइल कर दी है

मार्च, 2020 में हुई थी घटना. पहले नेता को बचाने के लिए POCSO की धाराएं हटा दी गई थीं.

UP में बदले के नाम पर मां-बाप के सामने 16 साल की बच्ची से गैंगरेप का आरोप

UP में बदले के नाम पर मां-बाप के सामने 16 साल की बच्ची से गैंगरेप का आरोप

आरोप है कि बदला लेने के लिए आरोपियों ने ये हरकत की.

खुद को आर्मी अफसर बताकर 57 लड़कियों को लूटा, अब धराया तो 50 लाख का खुलासा हुआ

खुद को आर्मी अफसर बताकर 57 लड़कियों को लूटा, अब धराया तो 50 लाख का खुलासा हुआ

चार लड़कियों से फर्जी शादी का भी आरोप.

MP: एक दिन में तीन बच्चियों के रेप के मामले आए सामने, एक की मौत, दूसरी की हालत नाजुक

MP: एक दिन में तीन बच्चियों के रेप के मामले आए सामने, एक की मौत, दूसरी की हालत नाजुक

हाई कोर्ट ने पूछा- आखिर रेप दोषियों को पैरोल पर क्यों छोड़ रही सरकार?

अस्पताल में भर्ती एयर होस्टेस की आइसक्रीम खाने से मौत, इंसाफ मांग रहे भतीजे की भी जान गई

अस्पताल में भर्ती एयर होस्टेस की आइसक्रीम खाने से मौत, इंसाफ मांग रहे भतीजे की भी जान गई

दोनों के लिए न्याय की मांग को लेकर सड़क पर उतरे लोग.

विकलांग औरतों को क्यों है यौन शोषण और रेप का ज्यादा खतरा?

विकलांग औरतों को क्यों है यौन शोषण और रेप का ज्यादा खतरा?

जब पुलिस वालों ने डिसेबल औरत से कहा- "मैं तुम्हारी बात क्यों सुनूं?"

मध्य प्रदेश: बर्बर भीड़ ने दो युवतियों को बेरहमी से पीटा, डंडा टूट गया पर पीटना बंद नहीं किया

मध्य प्रदेश: बर्बर भीड़ ने दो युवतियों को बेरहमी से पीटा, डंडा टूट गया पर पीटना बंद नहीं किया

धार पुलिस ने सात आरोपियों को गिरफ्तार किया है.

बिना बताए ससुराल से मामा के घर चली गई युवती, पिता और भाइयों ने पेड़ से लटकाकर पीटा

बिना बताए ससुराल से मामा के घर चली गई युवती, पिता और भाइयों ने पेड़ से लटकाकर पीटा

घटना का वीडियो वायरल.

शादी के नाम पर लड़कियों की अदला-बदली करने वाली ये घटिया प्रथा कब खत्म होगी?

शादी के नाम पर लड़कियों की अदला-बदली करने वाली ये घटिया प्रथा कब खत्म होगी?

इसी घटिया प्रथा के चलते एक लड़की ने अपनी जान ले ली.