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रेलवे स्टेशन पर सामान ढोती इन महिलाओं की तस्वीर में दिक्कत क्या है?

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस. 8 मार्च को मनाया जाता है. इसी सिलसिले में रेल मंत्रालय ने ट्वीट किया. तीन तस्वीरें डालीं जिनमें महिला पोर्टर्स (सामान उठाने वाली) अपना काम करते हुए दिख रही हैं. इसके साथ रेल मंत्रालय ने ट्वीट किया:

भारतीय रेलवे के लिए काम करते हुए इन महिला कुलियों ने ये साबित कर दिया है कि ये किसी से कम नहीं हैं. हम उन्हें सलाम करते हैं.

इस ट्वीट के बाद रेल मंत्रालय को मिले जुले रिएक्शन देखने को मिले. किसी ने ट्वीट करके कहा, यही महिला सशक्तिकरण है. एक अकाउंट ने लिखा,

इन बहादुर महिलाओं को कोई जबरन ये मेहनत वाला काम करने के लिए मजबूर नहीं कर रहा. कई महिलाएं खेतों में काम करती हैं. उसमें भी मेहनत होती है. इसलिए कड़ी मेहनत कर ईमानदारी से अपने परिवार के लिए चंद पैसे कमाने में कुछ भी गलत नहीं है.

वहीं कई लोगों ने रेलवे को इस बात पर खरी-खोटी सुनाई है. एक अकाउंट ने लिखा:

प्रिय रेलवे,

कुछ तो शर्म करो. ये बेचारी मजबूरी में कुली का काम कर रही हैं. अगर आप इन्हें इसके बदले कोई दूसरा काम दे सकें तो.

ध्यान से देखें तो अधिकतर ट्वीट रेल मंत्रालय के ट्वीट की तारीफ कर रहे हैं. उनके लिए ये महिला सशक्तिकरण है. जो इसकी आलोचना कर रहे हैं, उनमें से अधिकतर का ये कहना है कि महिलाएं बोझा ढोने के लिए थोड़े ही बनी हैं. शशि थरूर ने ट्वीट किया.

ये कितनी शर्म की बात है. लेकिन इसके लिए शर्माने के बजाए हमारा रेल मंत्रालय गरीब औरतों के भारी बोझा ढोने के शोषण की बात पर गर्व कर रहा है?

तीन चीज़ें हैं

#1.डिग्निटी ऑफ वर्क. यानी श्रम का बराबर सम्मान. चाहे वो एक सड़क साफ करने वाला आदमी हो, या जहाज का इंजन फिट करती इंजिनियर. काम सभी के आवश्यक हैं. इसमें गैर–बराबरी हमारे क्लासिस्ट (वर्ग भेदी) नज़रिए को दिखाता है. सामान उठाने को नीचा काम मानना गलत है.

#2. पुरुष हो या महिला, सभी को अपनी आजीविका के लिए काम करने का हक़ है. सभी को बराबर मौके मिलने चाहिए.

#3.जब खेतों में काम करने वाली, बोझा उठाने वाली महिलाओं के चेहरे इतनी तारीफ़ इकठ्ठा करते हैं. तो इन महिलाओं के अपने श्रम से पैसे कमाने पर क्या दिक्कत है?

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सबकी मेहनत का मूल्य समान होना चाहिए. छोटे से छोटे काम से लेकर बड़े कॉर्पोरेट घरानों तक. (तस्वीर: ट्विटर)

हां. रेलवे को बैट्री चालित वाहन लगाने चाहिए. ट्रॉलियां देनी चाहिए यात्रियों को, जैसा एयरपोर्ट्स पर होता है. लेकिन जब तक वो सुविधा सभी के लिए उपलब्ध नहीं हो जाती, तब तक इस काम में जेंडर को लाना गलत ही कहा जाएगा.

जिस एक बात से दिक्कत होनी चाहिए फिलहाल, वो कुली शब्द का इस्तेमाल है. पुरुष हों या महिला, उनके लिए इस शब्द का इस्तेमाल करना गलत है. कई दशक पहले बंधुआ मजदूरी के लिए चीन, और कैरेबियाई देशों में भारत और आस पास के देशों से लोग भेजे गए.उन्हें कुली कहा गया. भारत में ये शब्द स्टेशन वगैरह पर सामान उठाने वाले सहायकों के लिए इस्तेमाल होता था.

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सिर्फ पुरुष ही नहीं, महिलाएं भी बंधुआ मजदूर के तौर पर भेजी गई थीं. ऐसी ही एक ‘कुली महिला’ की तस्वीर. (तस्वीर:विकिमीडिया)

इसके पीछे वजह ये भी थी कि जब ट्रेन और पानी की जहाज की यात्रा ही इकलौता साधन थे तब बंधुआ मजदूर बड़े बाबुओं और मेम साहब के बड़े बक्से उठाकर लोड करते थे. इस शब्द को बेहद नस्लभेदी माना जाता है. आज पुरुषों के लिए भी स्टेशनों पर कुली शब्द इस्तेमाल नहीं होता. पोर्टर/सहायक कहा जाता है. आम बोलचाल में भले ये शब्द इस्तेमाल होता हो. लेकिन रेल मंत्रालय का अकाउंट एक ऑफ़िशियल अकाउंट है. भारत सरकार का. इस तरह के शब्द उनकी तरफ से तो नहीं ही कहे जाने चाहिए.


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