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शादी के बाहर अफेयर वाले कानून से इंडियन आर्मी को क्या दिक्कत है?

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ऐसी रिपोर्ट आ रही है कि भारतीय थल सेना यानी इंडियन आर्मी जल्द ही सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाने वाली है. मामला है सेक्शन 497 से जुड़ा हुआ. हिंदुस्तान टाइम्स में छपी एक खबर के हवाले से ये पता चला है कि अडल्ट्री एक्ट में हुए बदलाव को लेकर सेना के अफसर संतुष्ट नहीं हैं. मामले में क्या पेंच हैं, पहले वो जान लीजिए.

सेक्शन 497, भारतीय दंड संहिता में है क्या?

पिछले साल सितंबर तक आईपीसी की धारा 497 के तहत कानून कुछ यूं था:

ये जानते हुए भी कि महिला शादीशुदा है, उसके पति की मर्ज़ी के बिना अगर आप महिला के साथ यौन संबंध बनाते हैं तो इस संबंध को बलात्कार नहीं माना जाएगा, इसके लिए आप अडल्ट्री के अपराधी हैं. इसमें आपको पांच साल तक की सज़ा या फाइन या दोनों हो सकते हैं. अडल्ट्री के लिए पत्नी को दोषी नहीं ठहराया जाएगा.

अडल्ट्री को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के अनुसार अपराध माना जाता था. अडल्ट्री के लिए महिला को दोषी नहीं माना जाता, उस आदमी को दोषी माना जाता था जो महिला के साथ संबंध बनाता, भले ही ये संबंध दोनों की सहमति यानी कंसेंट से बना हो.

पहले अडल्ट्री को लेकर सज़ा सिर्फ पुरुष को होती थी, वो भी तब यदि कोई दूसरा पुरुष शिकायत करे. सांकेतिक तस्वीर: पीटीआई
पहले अडल्ट्री को लेकर सज़ा सिर्फ पुरुष को होती थी, वो भी तब यदि कोई दूसरा पुरुष शिकायत करे. (सांकेतिक तस्वीर: पीटीआई)

इस कानून पर क्या बहस चल रही थी?

कुछ समय पहले, केरल के जोसेफ शाइन ने सुप्रीम कोर्ट में अडल्ट्री के खिलाफ जनहित याचिका दायर की थी. जोसेफ का मानना था कि इसे आपराधिक मामलों में से हटा देना चाहिए. इसके बाद तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की बेंच इस पर सुनवाई कर रही थी. इस बेंच में जस्टिस ए.एम. खानविल्कर और जस्टिस डी.वाय. चंद्रचूड़ भी शामिल थे.

इस कानून पर बहस क्यों शुरू हुई थी?

लोगों का मानना था कि ये समानता के अधिकार के खिलाफ है. हर इंसान अलग-अलग तरह से इसका अर्थ निकाल रहा था. फेमिनिस्ट्स का मानना था कि ये महिला विरोधी है क्योंकि महिला को सिर्फ एक सेक्स करने की चीज़ समझा जा रहा था. वहीं कई लोगों का मानना था कि अगर रिश्ते दोनों की सहमति से बने हैं तो सिर्फ पुरुष को दोषी क्यों माना जाए?

असल में इस धारा में कुछ बुनियादी दिक्कतें थीं. इसके अनुसार अडल्ट्री के लिए सिर्फ पुरुषों को दोषी माना जाता था और इसकी शिकायत भी सिर्फ महिला का पति कर सकता था या कोई ऐसा व्यक्ति जो पति की गैर-मौजूदगी में महिला का ध्यान रख रहा हो. महिला खुद भी चाहे तो इसकी शिकायत नहीं कर सकती थी. मतलब, कि ऐसे संबंधों में महिला की अपनी राय, मर्ज़ी या कंसेंट की कोई इम्पॉर्टेंस नहीं थी. पर हां, अगर महिला की सेक्स में कोई मर्ज़ी नहीं है पर उसके पति को उस संबंध से दिक्कत नहीं है, तो उसे रेप नहीं माना जाता था.

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के समय कहा था कि पुराने अडल्ट्री लॉ में औरतों और मर्दों के बीच काफी भेदभाव था. ख़ासतौर पर औरतों के प्रति. (सांकेतिक तस्वीर: पिक्साबे)
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के समय कहा था कि पुराने अडल्ट्री लॉ में औरतों और मर्दों के बीच काफी भेदभाव था. ख़ासतौर पर औरतों के प्रति. (सांकेतिक तस्वीर: पिक्साबे)

जस्टिस दीपक मिश्रा और बाकी जजों की बेंच ने कहा था कि अडल्ट्री तलाक देने की वजह ज़रूर बन सकती है पर ये एक कानूनी अपराध नहीं है. पांच जजों की बेंच ने कहा कि हमारे संविधान की खूबसूरती ‘मैं और हम’ में है. साथ ही ये भी कहा कि पति, पत्नी का मालिक नहीं है. आईपीसी की धारा 497 औरतों के प्रति सौतेला बर्ताव करती थी. यानी अगर किसी महिला का पति उसे चीट कर रहा है तो वो कानूनन अपराध नहीं था. और महिला अपने पति के खिलाफ कुछ नहीं कर सकती थी.

क्या बदलाव हुए?

पांच जजों की बेंच ने अडल्ट्री को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था. क्योंकि अब अडल्ट्री एक कानून अपराध नहीं है, इसलिए किसी को ऐसा करने पर जेल या जुर्माना नहीं होगा. पर इसके आधार पर तलाक लेना आसान हो जाएगा. अगर आपका पति या पत्नी आपको चीट कर रहे हैं, तो आप उसे मुद्दा बनाकर तलाक ले सकते या सकती हैं. यही नहीं, अगर किसी के एक्स्ट्रामैरिटल अफेयर की वजह से उसका पति या पत्नी सुसाइड कर लेता है. और कोर्ट में ये साबित कर दिया जाता है. तो उसे एबेटमेंट ऑफ सुसाइड की तरह ट्रीट किया जाएगा. जोकि एक अपराध है.

जब कानून में बदलाव हुए, इसे लोगों ने विवाहेतर संबंध (एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर) बनाने का लाइसेंस देने वाला बदलाव कहकर इसकी आलोचना की. सोशल मीडिया पर इस तरह के पोस्ट काफी चले. लेकिन अब इसी कानून को लेकर आर्मी वाले सुप्रीम कोर्ट के पास अर्जी लगाने की सोच रहे हैं.

कथित रूप से आर्मी के अफसर इस बदलाव से संतुष्ट नहीं हैं और हाल में ही एक ऐसा मामला सामने आया था जिसकी वजह से एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर वाली बात तूल पकड़ गई . (सांकेतिक तस्वीर: पीटीआई)
कथित रूप से आर्मी के अफसर इस बदलाव से संतुष्ट नहीं हैं और हाल में ही एक ऐसा मामला सामने आया था जिसकी वजह से एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर वाली बात तूल पकड़ गई . (सांकेतिक तस्वीर: पीटीआई)

सेना को क्या दिक्कत है?

भारतीय सेना के तीन हिस्से हैं- थल सेना (आर्मी), जल सेना (नेवी), वायु सेना (एयरफोर्स). इन तीनों के अपने-अपने अलग-अलग एक्ट यानी कानून हैं. अभी तक एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स के जो भी मामले होते थे, आर्मी एक्ट के दो प्रावधानों  के तहत उन पर सुनवाई होती थी. एक था- एक ऑफिसर के मर्यादा के विपरीत कोई काम करना, और दूसरा था ऐसा व्यवहार जो आर्मी के डिसिप्लिन को प्रभावित करता हो.

ये जो दोनों प्रावधान हैं, इनको सेक्शन 497 से ही ताकत मिलती थी. लेकिन जब उसमें बदलाव हो गए, तो मामला थोड़ा टेढ़ा हो गया. हिंदुस्तान टाइम्स में ही छपी खबर के अनुसार एक मामला सामने आया जिसमें एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर की बात हुई. एक रिटायर्ड ऑफिसर ने कर्नल पर आरोप लगाया कि उनकी पत्नी के साथ उस कर्नल के दो मौकों पर एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर रहे थे. इस बात को लेकर कर्नल का कोर्ट मार्शल हुआ. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मामले को खारिज कर दिया और कर्नल को उनके पद पर वापस बहाल कर दिया. इस बात को लेकर रिटायर्ड ऑफिसर ने सेना से शिकायत की.

आर्मी के लिए इस कानून में छूट देने की बात कही जा रही है. आम तौर पर सेना से जुड़े मामलों में पहले कोर्ट मार्शल होता है, सेना केस देखती है, उसके बाद सिविल कोर्ट में मामला जाता है. (सांकेतिक तस्वीर: पीटीआई)
अडल्ट्री को आर्मीवालों के लिए अपराध बनाए रखने की बात हो रही है. आम तौर पर सेना से जुड़े मामलों में पहले कोर्ट मार्शल होता है, सेना केस देखती है, उसके बाद सिविल कोर्ट में मामला जाता है. (सांकेतिक तस्वीर: पीटीआई)

नाम न बताने की शर्त पर सेना के ही एक सीनियर अधिकारी ने बताया ,

‘जब सेना के जवान और ऑफिसर्स दूर होते हैं, तो उनके मन में परिवार को लेकर चिंता नहीं होनी चाहिए. सेना किसी दूसरी सर्विस की तरह नहीं है. जैसे कि कुछ मूलभूत अधिकार जो संविधान में दिए गए हैं, वो सेना के अधिकारियों पर लागू नहीं होते. जैसे वर्दीधारी लोग सर्विस के दौरान किसी भी पॉलिटिकल पार्टी को जॉइन नहीं कर सकते. यूनियन नहीं बना सकते. फ्रीडम ऑफ स्पीच पर भी कुछ बंदिशें हैं. इसी तरह सेक्शन  497 का बदलाव मिलिट्री पर लागू नहीं होना चाहिए’.

एक और अफसर ने ये भी कहा कि मिलिट्री के लोग अपने परिवारों से महीनों दूर रहते हैं, और उनका ध्यान दूसरे लोग रखते हैं. ऐसे में किसी भी तरह के  गलत व्यवहार से उन्हें रोकने के लिए कोई न कोई प्रावधान होना ही चाहिए. ये बात यहां क्लियर होना ज़रूरी है कि इसमें आर्मी एक्ट में बदलाव के लिए नहीं कहा जा रहा है. मांग ये है कि भारतीय दंड संहिता में धारा 497 को भले ही अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया हो, लेकिन मिलिट्री से जुड़े लोगों के लिए इसे अपराध की तरह ट्रीट किया जाए.

अब इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट के पास कब तक अपील होती है, और सुप्रीम कोर्ट का इस पर क्या रुख होता है, ये तो समय ही बताएगा.


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