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लंबी लड़ाई के बाद भारतीय सेना की 147 महिला ऑफिसर्स को मिला परमानेंट कमीशन

एक लंबे संघर्ष के बाद भारतीय सेना की महिला अफसरों के लिए एक अच्छा फैसला आया है. सेना ने 147 महिला अफसरों को परमानेंट कमीशन दे दिया है. इसी साल 25 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने आर्मी की आलोचना की थी. कहा था कि महिला ऑफिसर्स को परमानेंट कमीशन देने के लिए आर्मी ने मूल्यांकन के जो पैमाने तय किए हैं, वो मनमाने हैं और भेदभाव से भरे हुए हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में ही दिया था महिलाओं को परमानेंट कमीशन देने का आदेश

17 फरवरी,2020 को सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में ऐतिहासिक फैसला सुनाया था. कोर्ट ने कहा था कि आर्मी की हर स्ट्रीम में तैनात महिलाएं परमानेंट कमीशन के लिए योग्य होंगी. कोर्ट ने इसके लिए आर्मी को एक बोर्ड बनाने का आदेश भी दिया था. इस बोर्ड को परमानेंट कमीशन के लिए महिला ऑफिसर्स का मूल्यांकन करना था. पर उसके बाद भी एक साल तक महिला अफसरों को परमानेंट कमीशन नहीं दिया गया.

महिला अफसरों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाल दी. याचिका में कहा गया कि आर्मी बोर्ड महिला ऑफिसर्स के साथ भेदभाव कर रहा है. कई स्तरों पर. जैसे किसी 45 साल की महिला ऑफिसर की फिटनेस, 25 या 30 साल के पुरुष अधिकारी के स्टैंडर्ड पर मापी जाती है. उनका प्रेगनेंसी टेस्ट किया जाता है. उनकी अप्रेजल रिपोर्ट को सर्विस के केवल पांचवें और दसवें साल तक ही कन्सीडर किया जाता है. जबकि पुरुष अधिकारियों की आगे की भी रिपोर्ट कन्सीडर की जाती है. ऑफिसर्स ने अपनी शिकायत में यह भी कहा कि बोर्ड में निर्णायक पदों पर बैठे अधिकारी पुरुष ही हैं.

Supreme Court
सुप्रीम कोर्ट ने इस साल मार्च में कहा था कि सेना महिलाओं  के साथ संस्थागत भेदभाव कर रहा है. (फाइल फोटो)

सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर टिप्पणी करते हुए कहा कि आर्मी बोर्ड महिला अधिकारियों के साथ संस्थागत भेदभाव कर रहा है. उसके जो चयन के पैमाने हैं, उनमें पुरुषवादी सोच बहुत अंदर तक धंसी हुई है.  बेंच ने पाया कि जहां एक तरफ महिला अधिकारियों की अप्रेजल रिपोर्ट को कंसीडर करने का तरीका पक्षपाती है, वहीं उनकी मेडिकल फिटनेस भी मनमाने तरीके से आंकी जाती है. ऐसे कि एकदम फिट विमेन ऑफिसर्स को भी इस पैमाने पर रिजेक्ट कर दिया गया. वहीं उन महिला अधिकारियों को भी परमानेंट कमीशन के काबिल नहीं पाया गया, जिन्होंने देश के लिए सर्वोच्च बहादुरी का प्रदर्शन किया, जिन्होंने देश के लिए सम्मान कमाया और यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र के साथ हेवी कॉन्फ्लिक्ट जोन में काम किया.

बेंच ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यह काफी नहीं कि सेना के लोग गर्व से कहें कि हम महिला अधिकारियों को भी भारतीय सेना में सर्विस देने का मौका दे रहे हैं, जबकि सच्चाई अलहदा है. बराबरी का भ्रम पैदा करना और असली बराबरी में बहुत अंतर है. बराबरी का भ्रम संविधान के साथ धोखा है. बेंच ने यह भी ऑब्जर्व किया कि महिला अधिकारियों के परमानेंट कमीशन को लेकर इंडियन आर्मी की 1991 की मेरिट पॉलिसी का भी उल्लंघन किया गया. इस पॉलिसी के तहत मेरिट लिस्ट तभी बनती है, जब परमानेंट कमीशन के लिए 250 से अधिक कैंडिडेट हों.

परमानेंट कमीशन पाने वाली ऑफिसर्स की स्पेशल ट्रेनिंग होगी

फिलहाल 147 अतिरिक्त महिला ऑफिसर्स को परमानेंट कमीशन देने के बाद आर्मी की तरफ से कहा गया है कि अब परमानेंट कमीशन पाने वालीं कुल महिला ऑफिसर्स की संख्या बढ़कर 424 हो गई है. जबकि कुल 615 ऑफिसर्स का मूल्यांकन किया गया था. आर्मी की तरफ से कहा गया कि कुछ ऑफिसर्स के रिजल्ट प्रशासनिक कारणों की वजह से रोके गए हैं. आर्मी की तरफ से यह भी कहा गया कि जिन महिला अधिकारियों को परमानेंट कमीशन दिया गया है, उनकी स्पेशल ट्रेनिंग होगी और साथ ही साथ उन्हें चुनौतीपूर्ण असाइनमेंट भी सौंपे जाएंगे ताकि उन्हें आर्मी में टॉप लेवल की जिम्मेदारियों के लिए तैयार किया जा सके.

हम आपको परमानेंट कमीशन के बारे में भी बता देते हैं. दरअसल, सैन्य सेवाओं में महिलाओं की नियुक्ति शॉर्ट सर्विस कमीशन के आधार पर होती है. इसके तहत 14 साल की सर्विस के बाद उन्हें रिटायर होना पड़ता है. यही नहीं शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत नियुक्त हुई फीमेल ऑफिसर्स को जंग के मैदान के अलावा केवल आर्मी की सपोर्टिंग टुकड़ियों में तैनात किया जाता है. शॉर्ट कमीशन में ये महिलाएं ऊंची रैंक पर भी नहीं पहुंच पातीं, जिन्हें कमांड पोस्ट कहा जाता है. वहीं परमानेंट कमीशन में 14 साल की ऐसी कोई लिमिट नहीं होती. महिला ऑफिसर्स रिटायरमेंट की उम्र तक अपनी सेवाएं दे सकती हैं. परमानेंट कमीशन मिल जाने पर ऊंची रैंक के साथ उन्हें दूसरी सुविधाएं भी मिलती हैं. मसलन, रिटायरमेंट के पेंशन.


 

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