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'दिन रात काम कर महीने के 2 हजार भी नहीं मिलते', हड़ताल पर आशा वर्कर्स की मांगें कोई सुनता क्यों नहीं?

साल 2005. देश में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA सरकार थी. इस सरकार ने नेशनल रूरल हेल्थ मिशन (NRHM) शुरू किया. लक्ष्य था ग्रामीण इलाकों के लोगों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना. इसी नेशनल रूरल हेल्थ मिशन के तहत एक्रेडिटेड सोशल हेल्थ एक्टिविस्ट्स (ASHA) की तैनाती की गई. ये आशा कर्मचारी देशभर के ग्रामीण इलाकों में जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े काम करती हैं. मसलन, महिलाओं की डिलीवरी करना, स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रमों और सर्वे में भाग लेना, टीकाकरण कराना इत्यादि. कोविड काल में भी इन आशा कर्मचारियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. जिसके चलते सरकार ने इन्हें फ्रंटलाइन वर्कर घोषित किया. इनके लिए तमाम योजनाओं की घोषणा भी की गई. लेकिन ये आशा वर्कर जिन हालातों में काम करती हैं, जितना ज्यादा काम करती हैं, उसके बदले न उन्हें सही मानदेय मिलता है और न ही सुविधाएं. इसी के चलते महाराष्ट्र में आशा वर्कर्स हड़ताल पर चली गई हैं.

70 हज़ार ASHA कर्मचारियों की हड़ताल

महाराष्ट्र में करीब 70 हजार आशा कर्मचारी अनिश्चितकालीन हड़ताल हैं. वे अपना वेतन बढ़ाने, खुद को श्रमिक के तौर पर दर्जा दिलाने और दूसरी योजनाओं के फायदे देने की मांग कर रही हैं. उनका कहना है कि वे केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकार के सामने अपनी मांगें रख चुकी हैं. लेकिन कुछ नहीं हुआ. थक हारकर उन्हें हड़ताल का रास्ता चुनना पड़ा.

मजदूर संगठन सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन्स यानी CITU से जुड़ीं महाराष्ट्र की एक आशा कर्मचारी स्वाति ने बताया-

“हमें महीने में केवल 1650 रुपये मिलते हैं. जबकि काम हर दिन 8 से 9 घंटे करना पड़ता है. इतने कम पैसों में हमारा घर खर्च नहीं चलता. सरकार से हमारी मांग है कि एक तो हमें कर्मचारी के तौर पर मान्यता दी जाए और फिर हमारा मासिक वेतन बढ़ाकर 18 हजार रुपये किया जाए.”

स्वाति ने बताया कि कोरोना काल में आशा कर्मचारियों पर काम का बोझ बढ़ा है. इसके बाद भी उनको मिलने वाले पैसों में बढ़ोतरी नहीं हुई.

दूसरी तरफ ये आशा कर्मचारी कोविड का शिकार हुईं अपनी साथियों के लिए बीमा राशि की भी मांग कर रही हैं. दरअसल, पिछले साल केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत आशा कर्मचारियों के लिए 50 लाख रुपये बीमा की घोषणा की थी. छत्तीसगढ़ जैसे कुछ राज्यों में आशा कर्मचारियों के परिवार वालों को बीमा की रकम देने के आदेश भी जारी किए गए. हालांकि, महाराष्ट्र की आशा कर्मचारियों का कहना है कि उनकी बहुत सी साथी कोविड ड्यूटी करते-करते जिंदगी की जंग हार गईं. कोरोना से ही उनकी मौत हुई. लेकिन इसके बाद भी उनके परिवारों को बीमा के पैसे नहीं मिले.

छत्तीसगढ़ के राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की तरफ राज्य के मुख्य चिकित्सा अधिकारी को लिखा गया पत्र, जिसमें 25 मार्च से 19 अप्रैल के बीच कोविड से जिंदगी की जंग हार गईं आशा कर्मचारियों के परिवारों को केंद्र सरकार की योजना के तहत 50 लाख रुपये का बीमा दिए जाने के नियमों को साफ करने की बात कही गई. (फोटो: विशेष प्रबंध)
छत्तीसगढ़ के राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की तरफ राज्य के मुख्य चिकित्सा अधिकारी को लिखा गया पत्र, जिसमें 25 मार्च से 19 अप्रैल के बीच कोविड से जिंदगी की जंग हार गईं आशा कर्मचारियों के परिवारों को केंद्र सरकार की योजना के तहत 50 लाख रुपये का बीमा दिए जाने के नियमों को साफ करने की बात कही गई. (फोटो: विशेष प्रबंध)

इस बारे में CITU की तरफ से एक बयान जारी कर बताया गया है कि महाराष्ट्र में कोरोना की वजह से अब तक 26 आशा कर्मचारियों की मौत हो चुकी है और उनमें से एक भी आशा कर्मचारी के परिवार को बीमा के पैसे नहीं मिले. CITU की तरफ से यह भी कहा गया कि इस साल 24 मार्च को यह बीमा योजना खत्म कर दी गई थी, लेकिन कोविड की दूसरी लहर आने के बाद आलोचना होने पर केंद्र सरकार ने 20 अप्रैल को इसे फिर से शुरू कर दिया. अभी तक केंद्र सरकार ने यह साफ नहीं किया है कि 25 मार्च से 19 अप्रैल के बीच जिन आशा कर्मचारियों की मौत कोविड से हुई है, उनके परिवारों को किस योजना के तहत मुआवजा दिया जाएगा.

दूसरे राज्यों में भी यही हालात

महाराष्ट्र ही नहीं, दूसरे राज्यों की आशा कर्मचारी भी इस तरह की मांग उठा रही हैं. मसलन, बिहार के सिमरिया गांव में कार्यरत आशा कर्मचारी रानी ने हमें बताया,

“हम आशा कर्मचारी सुबह से लेकर शाम तक काम करती हैं. कोरोना की वजह से खतरा भी बढ़ गया है. इस काम और खतरे के एवज में हमें जो पैसे मिलते हैं, वो बहुत कम हैं. महीने के पैसे भी तीन-तीन महीने के अंतराल पर आते हैं. उनमें भी कटौती हो जाती है. इंसेटिव भी हर बार नहीं मिलता. केंद्र सरकार की तरफ से जो फ्रंट लाइन वर्कर्स के तौर पर एक हजार रुपये हर महीने मिलने थे, वो भी अब नहीं मिलते. इस जनवरी में हमने धरना दिया था. महीने के पैसे बढ़ाकर 18 हजार करने की मांग की थी. चुनाव से पहले जरूर नीतीश कुमार ने पैसे बढ़ाने का वादा किया था. लेकिन अभी तक पैसे नहीं बढ़े हैं.”

रानी के बयान में दो महत्वपूर्ण बातों का जिक्र है. पहली, इंसेटिव और दूसरी केंद्र सरकार की तरफ से आशा वर्कर्स को कोविड काल में फ्रंट लाइन वर्कर्स मानते हुए उन्हें अतिरिक्त एक हजार रुपये दिए जाने की घोषणा. दरअसल, आशा कर्मचारियों को महीने के एक फिक्स मेहनताने के अतिरिक्ति कुछ इंसेटिव भी मिलता है. यह इंसेटिव उनके द्वारा नियमित तौर पर किए जाने वाले काम से अतिरिक्त काम करने पर मिलता है. मसलन, महिलाओं की डिलीवरी कराना, टीकाकण में भाग लेना इत्यादि. एक डिलीवरी कराने पर किसी आशा कर्मचारी को 600 रुपये मिलते हैं. वहीं किसी बच्चे का टीकाकरण कराने पर 50 से 100 रुपये. आशा कर्मचारी इस इंसेटिव को भी बढ़ाने की मांग कर रही हैं.

कर्नाटक की आशा कर्मचारियों ने पिछले महीने विरोध प्रदर्शन किया था. (फोटो: ANI)
कर्नाटक की आशा कर्मचारियों ने पिछले महीने विरोध प्रदर्शन किया था. (फोटो: ANI)

इसी तरह पिछले साल केंद्र सरकार ने आशा वर्कर्स को फ्रंट लाइन वर्कर्स मानते हुए उन्हें हर महीने एक हजार रुपये अतिरिक्त देने की बात कही थी. CITU का कहना है कि ज्यादातर आशा कर्मचारियों को ये अतिरिक्त पैसे मिल नहीं रहे हैं. साथ ही साथ संगठन ने इस राशि को एक हजार रुपये से बढ़ाकर 9 हजार रुपये करने की मांग की है.

मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में काम करने वालीं आशा कर्मचारी गिरिजावती ने हमें बताया कि केंद्र सरकार की तरफ से जो अतिरिक्त एक हजार रुपये की घोषणा की गई है, वो पैसा उन्हें आज तक नहीं मिला. उन्होंने बताया,

“2011 से मैं आशा कर्मचारी के तौर पर काम कर रही हूं. सुबह उठती हूं. घर का काम करती हूं. फिर बाहर जाती हूं अपनी ड्यूटी करने. देर शाम में घर वापस आती हूं. कभी-कभी डिलीवरी कराने के लिए रात में ही उठकर जाना पड़ता है. इतना सब करने के बाद सरकार की तरफ से हर महीने महज तीन हजार रुपये मिलते हैं. कोरोना के समय में हमने जी तोड़ मेहनत की है. लेकिन सरकार हमारे पैसे नहीं बढ़ा रही है. हमने कई बार धरना प्रदर्शन किया. हमारी जो साथी कोरोना से मर गईं, उनके परिवार के लिए 50 लाख रुपये बीमा की मांग भी की. लेकिन वो बीमा का पैसा भी नहीं मिला.”

कोरोना काल में आशा कर्मचारियों के ऊपर उनके नियमित कामकाज के अतिरिक्त दूसरी जिम्मेदारियां भी हैं. मसलन, टीकाकरण कराना. लोगों को मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग के लिए जागरूक करना. घर-घर जाकर सर्वे करना, कोविड के लिए लोगों की स्क्रीनिंग करना, उन्हें स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचाना इत्यादि. सिमरिया की आशा कर्मचारी रानी ने हमें बताया कि इन सब कामों के लिए न तो उन्हें मास्क मिले और न ही सैनिटाइजर. उन्होंने खुद अपने लिए सैनिटाइजर का इंतजाम किया और खुद ही मास्क सिले.


24 मई को कर्नाटक की आशा कर्मचारियों ने भी इन मुद्दों को लेकर एक दिन की हड़ताल की थी. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने उनकी हड़ताल का संज्ञान लिया था और कहा था कि अगर कर्नाटक की आशा कर्मचारियों को समय पर मेहनताना नहीं मिल रहा है और काम करने के लिए मास्क और सैनिटाइजर जैसी बेसिक चीजें नहीं मिल रही हैं, तो यह काफी शर्मनाक है.

सरकारें केवल कागजी घोषणा करती हैं

हरियाणा के सोनीपत में बतौर आशा कर्मचारी काम कर रहीं शकुंतला ने हमें बताया कि कोविड में उनके पति की नौकरी चली गई. दूसरी तरफ उनके ऊपर काम का बोझ बढ़ गया. लेकिन पैसे नहीं बढ़े. घर में दो बच्चे हैं और महीने के दो से तीन हजार रुपये में गुजारा नहीं होता. शकुंतला ने बताया कि देश के प्रधानमंत्री कई बार कोविड के दौरान आशा कर्मचारियों के काम की तारीफ कर चुके हैं लेकिन पैसे नहीं बढ़ाए गए. विरोध प्रदर्शन करने के बाद भी सरकार नहीं सुनती.

आशा कर्मचारियों की मांग उठाने के लिए एक और केंद्रीय श्रम संगठन ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस भी आगे आया है. हमने इस संगठन की महासचिव अमरजीत कौर से इस संबंध में बात की. उन्होंने कहा कि उनके संगठन ने महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, बिहार, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, ओडिशा, मध्य प्रदेश जैसे प्रमुख राज्यों में समय-समय पर आशा कर्मचारियों की मांग को उठाया है. अमरजीत कौर ने हमें विस्तार से आशा कर्मचारियों के मुद्दे के बारे में बताया. उन्होंने कहा-

“आशा कर्मचारियों की जो सबसे बड़ी मांग है, वो है उन्हें एक श्रमिक के तौर पर दर्जा दिया जाना. जब उन्हें श्रमिक का दर्जा दिया जाएगा, तब बात न्यूनतम मेहनताने की आएगी, जो कि 18 हजार रुपये प्रति महीना है. इस न्यूनतम मेहनताने के साथ सोशल सिक्योरिटी की भी बात होगी. दूसरी बात कोविड काल में उनके लिए घोषित किए गए बीमे की है. मणिपुर से लेकर महाराष्ट्र तक और पश्चिम बंगाल से लेकर पंजाब तक बहुत सी आशा कर्मचारियों की जान कोविड की वजह से जा चुकी है. लेकिन उनके परिवार को बीमे का पैसा नहीं मिला. हमने प्रधानमंत्री से लेकर केंद्रीय श्रम मंत्री तक को पत्र लिखे कि जब पैसे देने ही नहीं होते, तो घोषणा ही क्यों की जाती है. तीसरा मुद्दा कोविड इंसेटिव का है. ये इंसेटिव भी नहीं मिल रहा है. इसके लिए भी हम हरियाणा, महाराष्ट्र, उत्तराखंड, पंजाब, कर्नाटक और मध्य प्रदेश में प्रदर्शन कर चुके हैं. फिर से वही बात. सरकार घोषणा कर देती है लेकिन पैसे नहीं देती. इसके बाद आशा कर्मचारियों को विरोध प्रदर्शन करना पड़ता है.”

महाराष्ट्र में लगभग 70 हजार आशा कर्मचारियों के हड़ताल पर चले जाने से ग्रामीण हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर पर काफी असर पड़ने की बात कही जा रही है. कोविड वैक्सीनेशन को लेकर ग्रामीण इलाकों में काफी डर है. इस डर को दूर करने में आशा कर्मचारी बड़ी भूमिका निभा रही हैं. उनके हड़ताल पर जाने से पहले से ही धीमी वैक्सिनेशन प्रक्रिया के और धीमी पड़ जाने की आशंका है. यह भी कहा जा रहा है कि अगर महाराष्ट्र के बाद कुछ और राज्यों या पूरे देश में आशा कर्मचारी हड़ताल पर चली जाती हैं, तो परिस्थितियां काफी बिगड़ सकती हैं.


 

वीडियो- उइगर मुसलमानों की यातना पर रिपोर्टिंग कर पुलित्जर जीतने वालीं इस पत्रकार की कहानी सुनिए

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