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ब्लॉग: सरकारें 'स्मार्ट' शहर तो बना लेंगी, मगर औरतों के लिए 'समझदार' शहर कैसे बनेगा?

इस आर्टिकल को लिखने वाले ह्यूगो रिबादो ड्यूमा फ्रांस से हैं. आजकल पीएचडी कर रहे हैं, पेरिस के CEIAS/CNRS से. दिल्ली में रहते हैं, यहां CSH (समाजिक विज्ञान केंद्र) के साथ जुड़े हुए हैं. उनके रिसर्च का विषय इंडिया में शहरी विकास तथा औरतों और पुरुषों पर उसके प्रभाव के बारे में है. तक़रीबन दस साल से हिंदुस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान में रह रहे हैं.


कुछ महीने पहले, दिल्ली सरकार ने एक महा-विज्ञापन अभियान चलाया. इसके ज़रिए, जो पहल AAP सरकार ने औरतों की सुरक्षा के लिए की थी, उसके बारे में हमें पता चला. अगर दिल्ली में रहते हैं, तो इन बड़े-बड़े बिलबोर्ड्ज़ को ज़रूर देखा होगा. सच तो ये है कि राजधानी में सरकार कुछ-कुछ क़ाबिल-ए-तारीफ़ कदम उठा चुकी है, जैसे बसों में सारी महिलाओं के लिए मुफ़्त सफ़र.

मगर एक अजीब चीज़ ने मेरा ध्यान खींच लिया. इस अभियान में, “महिलाओं ” का ज़िक्र है ही नहीं. सिर्फ़ “बहनों” की बात है. पोस्टर्स हमें बताते हैं कि “बहनों की सुरक्षा के लिए” ये हुआ, वो हुआ. “बहन” शब्द का इस्तेमाल क्यों? क्या पुरुषों को आधिकारिक विज्ञापनों में कभी “भाई” कहा जाता है? सरकार हमें क्या बोलना चाहती है? ये कि महिलाओं को सुरक्षा का हक़ इसलिए है क्योंकि वे हमारे घर की बेटियां जैसी हैं? और जो औरतें हमारी बहनें नहीं लगतीं, उनके लिए क्या? असुरक्षा? इस अभियान का छुपा हुआ मतलब यह था: “लेडीज़ लोग, आप फ़िक्र मत कीजिये, हम भाई लोग हैं न, आपकी रक्षा हम करेंगें”. पितृसत्तात्मक सन्देश काफ़ी साफ़ है: शहर और महिलाएं, दोनों मर्दों के मुट्ठी में रहते हैं.

दरअसल, जब मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की तरफ़ देखते हैं, तो दिल्ली सरकार का अभियान इतना बुरा भी नहीं है. इधर, MP सरकार ने ऐलान किया है कि काम करने वाली औरतों को पुलिस थाने में रजिस्टर करना होगा (जैसे कि समस्या वे हैं, छेड़छाड़ करने वाले नहीं). उधर, लखनऊ पुलिस ने एक नया सीसीटीवी कैमरा पेश किया है जो महिलाओं के चेहरों को लगातार जांचकर बेबसी का भाव डिटेक्ट कर सकता है (जैसे कि नज़र उन पर रखनी है, छेड़छाड़ करने वालों पर नहीं).

सिर्फ़ इंडिया में ही नहीं, पूरी दुनिया में महिलाओं को शहरों में बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिनका अनुभव मर्दों को नहीं होता, जैसे रोज़ की छेड़छाड़, हमले का ख़ौफ़ और नकारात्मक सामाजिक आदर्श. इस माहौल के कारण, औरतों की बाहर जाने की इच्छा और क्षमता दोनों कम हो जाती है, और इसके साथ-साथ काम, दोस्ती और मस्ती करने के मौक़े भी.

“स्मार्ट सिटी” से ज्यादा ज़रूरी भी कुछ है

पिछले सात बरसों से, भारत सरकार “स्मार्ट सिटीज़” के कॉन्सेप्ट को बहुत ज़ोरदार तरीके से बढ़ावा दे रही है. इसमें बहुत पैसा लगने वाला है– तक़रीबन दो लाख करोड़ रुपये का निवेश. शहरी महिलाओं को इससे क्या फ़ायदा हो सकता है? यह लेख इसी के बारे में है.

“स्मार्ट सिटी” क्या होता है? उसकी कोई एक परिभाषा नहीं होती. इन शब्दों के पीछे बहुत मतलब हो सकता है, और बहुत खोखलापन भी. शहरों को “स्मार्ट” बनाना अच्छा मकसद है, मगर जिस तरह से इंडिया में “स्मार्ट” को समझा जाता है, इस में दो बड़ी दिक्कतें हैं. पहली दिक्कत- सरकार के मन में, स्मार्ट और टेक्नोलॉजी बराबर हैं. इस नज़रिये के मुताबिक, शहर की सारी परेशानियों को आईटी ही ख़त्म कर सकती है. नल में पानी नहीं आता? स्मार्ट मीटर चला दो. बिजली नहीं है? स्मार्ट ग्रिड बना दो. महिलाओं को छेड़खानी से तकलीफ़ होती है? सीसीटीवी कैमरा लगा दो!

हां, तकनीकी प्रगति ज़रूरी है, मिसाल के तौर पर बारीक डेटा इकट्ठा करने के लिए. लेकिन शहरों के सबसे बड़े मसले, तकनीकी ही नहीं, सामाजिक भी होते हैं. साधारण सुविधाओं की कमी हो या हिंसा की घटनाएं हों. उदाहरण के लिए, अगर लोग मानते हैं कि लड़कियों का घर से बाहर जाना ग़लत बात है, लखनऊ वाला कैमरा इस सोच को उखाड़ तो नहीं पाएगा. टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल ज़रूर करना चाहिए, मगर अंधे होकर नहीं, सामाजिक उपायों की ज़रूरत भी होती रहेगी.

दूसरी दिक्कत- जहां तक महिलाओं की बात है, सरकार का स्मार्ट सिटीज़ अभियान एक ही मुद्दे पर अटका हुआ है- सुरक्षा. हां, औरतों के ख़िलाफ़ हिंसा के मामले जो होते रहते हैं, वे बहुत ही गंभीर हैं. मगर ज़रा सोचिये, क्या वह सुरक्षा वाली बात सचमुच सिर्फ़ महिलाओं के भले की ख़ातिर उठाई जाती है? मुझे शक है. असली डर महिलाओं के कष्ट का नहीं, बेइज़्ज़ती का है. परिवार की और समाज की भी. जब भी किसी लड़की का रेप होता है, तो लोगों को लगता है कि पूरे समुदाय की नाक कट गई है. इसलिए दिल्ली सरकार “बहनों” की बात करती है

नतीजा यह है कि इज़्ज़त को अहमियत ज़्यादा दी जाती है, और आज़ादी को कम. इस चक्कर में लड़कियों की स्वतंत्रता और भी सीमित हो जाती है. औरतों का लगातार पीछा करना, जैसे यूपी और एमपी में प्रस्ताव आए हैं, उसी सोच का परिणाम है. इस वातावरण में महिलाओं पर मानसिक दबाव कैसे नहीं बढ़ेगा? क्या स्मार्ट है यह?

स्मार्ट ही नहीं, महिलाओं के लिए शहरों को समझदार बनाना है. सुनने में “स्मार्ट” बड़ा मस्त लगता है, मगर शब्द के पीछे समझदारी भी होनी चाहिए. महिलाओं के लिए शहरों को दोस्ताना बनाने के लिए कीमती टेक्नोलॉजी के अलावा और भी क़दम उठाने हैं. तकनीकी अविष्कारों का मेक-अप लगाकर सुरक्षा का असली अहसास नहीं होता, समाज की सोच गहराई से बदलानी होगी.

कैसे? फोकस तब्दील करना पड़ेगा. प्राथमिकता आज़ादी होनी चाहिए, हिफ़ाज़त नहीं. सुरक्षा का दबाव लड़कियों के कन्धों से हटाना चाहिए, और उनकी आज़ादी की चिंता पूरे समाज को सौंप देना चाहिए. सड़क पर महिलाओं की मौजूदगी एक चुनौती नहीं, एक लक्ष्य समझा जाना चाहिए. सरकार को यह सन्देश साफ़-साफ़ भेजना है कि लड़कियों को घूमने-फिरने के लिए कोई वजह नहीं चाहिए, जैसे बुद्धिजीवी शिल्पा फडके, समीरा ख़ान और शिल्पा राणाडे वकालत करती हैं.

शहर में महिलाओं की दृश्यता बढ़ाने के लिए बहुत सारे उपाय उपलब्ध हैं, जैसे- विशेष रोजगार योजनाएं, निशुल्क परिवहन या आरक्षित सार्वजनिक स्थान. उसके साथ-साथ, सड़कों को थोड़ा कम डरावना और ज़्यादा आरामदेह बनाने के वास्ते कई और इलाज भी मौजूद हैं, जैसे- उचित स्ट्रीट डिज़ाइन (चौड़ी गलियां, कम बाड़) और सुविधाएं (पर्याप्त रोशनी, साफ़ सार्वजनिक शौचालय). सड़कों में काफ़ी चहल-पहल होना भी ज़रूरी है, दुकानों या मनोरंजन के ज़रिये, ताकि हर समय आम लोग मौजूद रहकर गवाह बन सकें. इन सबमें से, सिर्फ़ एक ही पहल से कुछ चमत्कार नहीं हो सकता. मगर कुल मिलाकर, पक्का परिवर्तन आ सकता है, जनता के मन में, और महिलाओं के शहरी तजुर्बे में (मैंने कहा महिलाएं, बहनें नहीं!). तभी बनेगा समझदार शहर.

(लेखक के विचार निजी हैं. दी लल्लनटॉप इनसे सहमत या असहमत हो सकता है.)


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