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लॉकडाउन में जब आप शौक पूरे कर रहे थे, आपकी मां क्या कर रही थीं?

लॉकडाउन. ये एक शब्द भर नहीं. बल्कि पिछले कुछ महीनों में जीने का एक तरीका बन गया. इंटरनेट पर सबकुछ छोड़ लोग रेसिपी खोजने और पढ़ने में लगे रहे. फ़िल्म स्टार्स और सेलेब्स ने झाडू लगाते हुए वीडियो डाले. हमने एक दूसरे को बताया कि कुछ नया करो. और फिर सोशल मीडिया पर हर दूसरी तस्वीर गोलगप्पे, जलेबी, बिरयानी या ऐसी चीजों की होती, जिन्हें शौकिया बनाया जा रहा था. लेकिन समय के साथ शौक ढलने लगे और ये तस्वीरें गायब हो गईं.

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जिस कुकिंग को हममें से कई लोगों ने शौक के रूप में किया. या कुछ नया, कुछ अलग करने की चाह  में किया. वो असल में बहुत सी महिलाओं का रोज़ का काम है. आज के इस ब्लॉग में अपनी राय बहुत कम दूंगी. उसकी जगह कुछ लोगों की राय आपके लिए लेकर आऊंगी. इन लोगों से मैंने बात की, ये समझने को कि लॉकडाउन के बाद उनके घरेलू जीवन में क्या बदला. घर के काम कैसे हुए. ये वो लोग हैं, जो आपके आस-पास हैं. परिवार या फ्रेंड सर्कल में. वो लोग जो हम और आप खुद हैं.

शुरुआत निहारिका से. 34 साल की मैनेजमेंट कंसलटेंट हैं. मुंबई में रहती हैं. निहारिका बताती हैं:

मैं खाना बनाने से हमेशा से भागती रही हूं. ये पहली बार था जब मैंने ये किया. फोन करके मम्मी से सबकुछ सीखा. मुझे ये अच्छा लगा कि मैंने खाना बनाना सीख लिया. बेसिक काम है. आना ही चाहिए. मगर काम और कुकिंग के साथ लाइफ इतनी हेक्टिक हो गई थी कि घर आ गई. पर अब लगता है वापस चली जाऊं. अपना स्पेस चाहिए.

दूसरी ओर बात रोहित की. 23 साल के मीडिया प्रोफेशनल हैं. कहते हैं:

हमेशा अकेला रहा हूं. मगर कभी खाना बनाना नहीं सीखा. टिफिन आता था या बाहर खाते थे. 2-3 साल से इसी तरह रह रहे थे. लॉकडाउन में शुरुआत में तो सही लगा. लेकिन अपना किचन सेट नहीं था कभी. अप्रैल और मई केवल उबला हुआ खाना खाया. जो इलेक्ट्रिक केतली में बन सकता था. मैगी से एक्सपेरिमेंट करने लगे तो शुरू में मजा आया. पोहा उबाल लिया कभी. फिर मैगी देखकर ही उल्टी आने लगती. दूध-ब्रेड देखकर अजीब लगता. ऊपर से खाना खाने के बाद बर्तन धोना. मैंने कभी ये काम नहीं किया था. लॉकडाउन में सब्जियां खरीदनी सीखीं. नहीं झिला तो घर ही चला आया. यहां खाना मम्मी ही बना रही थीं. मैंने कभी सीखा ही नहीं. जबकि घर में बहन से खाना बनाने में बराबर मदद ली जाती है. इतनी कि कभी-कभी वो पढ़ भी नहीं पाती है. जिसके चलते मेरी मम्मी से बहस हो जाती है.  

ऐसे ही एक और नौकरीपेशा युवा हैं 23 साल के अविनाश. कहते हैं:

लॉकडाउन के पहले मेरी पार्टनर साथ थी. वो जब तक थी तबतक किचन सही था. सबकुछ साफ़ था. मैंने दो हफ्ते तक किया. उसके जाने के बाद मन ही नहीं करता था. कोई और दोस्त भी होता तो शायद कर लेता. मुझे नॉर्मल चीजें बनानी आती थीं. कुछ यूट्यूब से सीखा. लेकिन फिर उससे भी तंग आ गया. फिर खाना ऑर्डर करना शुरू किया. फिर वो रूटीन बन गया. डेली दो टाइम मंगाकर खाने लगे. फिर उससे भी ऊब हो गई. कभी एक बार खा रहे हैं. कभी बिना खाए सो रहे थे. कभी बनाने उठता भी तो सिंक में जूठे बर्तन देखकर ही मूड ऑफ हो जाता. फिर घर ही जाना पड़ा. आलस ने टेकओवर कर लिया.

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घर के कामों की जब बात आती है, तो पुरुषों के लिए कभी-कभी उन्हें कर लेना उनका शौक कहलाता है. महिलओं के लिए उनकी ड्यूटी. (सांकेतिक तस्वीर: Pexels)

वहीं 33 साल की स्नेहा की अलग कहानी है. ये रेडिओ प्रोफेशनल हैं और अकेली रहती हैं. इनका कहना था:

मैं दो साल से अकेली रह रही हूं. मुझे खाना बनाना बिलकुल पसंद नहीं है. लेकिन सर्वाइवल के लिए मैं कर सकती हूं. मैंने टिफिन बंधवा रखा था. लेकिन मेरा किचन सेट था. बाहर से ऑर्डर करना सेफ़ नहीं था. अब मैंने खाना बनाना चालू किया है. बहुत मज़ा नहीं आता. लेकिन सहज हो गई हूं. फैंसी चीजें भी ट्राय कर लेती हूं. लेकिन मेरे घर में मेरी मां का काम बढ़ गया है. क्योंकि मां ही पूरा काम करती हैं. पापा कोई घरेलू ज़िम्मेदारी शेयर नहीं करते हैं. मेरी बहन मदद करती है. अंततः घर की दो औरतें ही काम कर रही हैं. पुरुषों में उस उम्र के जो लोग हैं, उनको सुधारना बहुत मुश्किल रहता है. मम्मियां भी अपनी भूमिका में खुश रहती हैं. मेरे कुछ पुरुष दोस्त हैं जो खाना बनाना एन्जॉय करते हैं. एक ने तो अपनी मेड को बुला रखा है. वो लगातार आती रही है. कुछ लड़के ऐसे हैं कि रिस्क ले लेंगे. मगर कुकिंग नहीं सीखेंगे.

ये चार प्रोफेशनल्स थे. अलग अलग उम्र के. अकेले रहते हुए. ये शायद संयोग हो कि दोनों लड़के काम करने में उकता गए. मगर लड़कियां सहज होने लगीं. या महज़ उम्र का फेर हो. क्योंकि 4 लोगों से बात कर जजमेंट नहीं दिया जा सकता. मगर जब हम अपने घरों की तरफ बढ़ेंगे तो ये फ़र्क साफ़-साफ़ देख पाएंगे.

सुनीता एक 55 साल की होममेकर हैं. कहती हैं:

लॉकडाउन में कुछ नहीं बदला. कुछ समय बाद बेटा-बहू भी घर आ गए. दोनों वर्क फ्रॉम होम करते हैं. बहुत मेहनत करते हैं वो. उन दोनों से अपेक्षा नहीं रखती कि वो किसी काम में हाथ बंटाएं. खाना तो मैं पहले भी बनाती थी. लेकिन अब ज्यादा बनाना पड़ रहा है. बच्चों के आने से लगता है कुछ नया बनाएं. काम तो बढ़ गया है. लेकिन मन खुश है क्योंकि अकेलापन नहीं है. हसबेंड ने भी कुछ काम किए जो पहले नहीं करते थे. जैसे मोटर चलाकर पानी भरना. या गमलों में पानी देना. लेकिन इसे मदद न समझा जाए. बात सीधी है. जब आदमी के पास कोई काम नहीं है, उसका मन ऊबेगा तो कुछ तो करेगा. वो इसलिए काम नहीं कर रहा है कि पत्नी को करना पड़ रहा है. जब उनको शौक चढ़ता है तब पकवान भी बनाते हैं. लेकिन आदमी इस वक़्त भी अपनी मर्ज़ी का मालिक है. मेरी उम्र की या मेरी जानने वाली सभी महिलाओं का यही हाल है.

वहीं युवा कपल्स में अलग माजरा है. 28 साल सुनैना की कुछ महीने पहले ही शादी हुई है. कहती हैं:

हम दोनों ही टीचर हैं. तो बस उसी हिसाब से काम बंटा हुआ है. लेकिन सबकुछ स्मूद है. लड़ाई हो जाती है. ऐसे क्यों किया, वैसे क्यों किया. और कभी-कभी दोनों ही छोड़ देते हैं. कि भाड़ में जाओ. नहीं करेंगे सफाई. नहीं बनाएंगे खाना. लेकिन कभी ऐसा नहीं हुआ कि एक व्यक्ति पर बोझ ज्यादा आए.

32 साल के राघव बताते हैं:

मैं सरकारी जॉब करता हूं. वाइफ प्राइवेट में हैं. हम दोनों करियर के लिए अलग शहरों में अकेले रहते आए हैं. मेड का सहारा कभी नहीं लिया. उसके पास आया हूं तो मिलकर काम करते हैं. इतने दिन दूर रहने के बाद उनसे और ज्यादा करीब महसूस होता है. मैं बड़ा हो रहा था तो मुझे कुछ नहीं आता था. घर में एक गिलास पानी भी नहीं लेता था. नौकरी लगी तो बाहर ही खाना खाया. फिर दूसरी जॉब के बाद धीरे-धीरे काम करना सीखा. मेरी वाइफ शादी के पहले लंबे समय तक बाहर रही हैं, इंडिपेंडेंट रही हैं. उनको शादी के पहले तक हाउसहोल्ड का कोई आइडिया नहीं था क्योंकि वो पीजी में रही हैं. उन्होंने शादी के बाद सीखा. मैंने नौकरी करते हुए. इसलिए हमें काम बांटने आते हैं.

वहीं 34 साल की नम्रता कहती हैं:

मैं और मेरे पति एक तरह के कॉन्टेस्ट में हैं. कौन कितने दिन गंदगी बर्दाश्त कर सकता है. मुझे नहीं लगता कि हमारे घर में काम बराबर बंटा हुआ है. मुझे लगता है ये बंट ही नहीं सकता. ऐसा नहीं है कि वो मुझसे कहेंगे कि तुम काम करो. बल्कि इस इंतज़ार में हैं कि मेड कबसे आएगी. काम करने और किसी से करवा देने में फर्क होता है. मुझे लगता है अलग-अलग घरों में जो पुरुष खाना बनाते भी हैं वो वही चीजें बनाते हैं जिसमें तारीफ मिल सके. कुछ ख़ास, कुछ स्पेशल. वो खाना बनाएंगे भी तो आटा गूंधने और रोटी बनाने जैसे आम काम, जिसकी कोई तारीफ नहीं करता, नहीं करेंगे. 

कई घरों में डोमेस्टिक हेल्प आती भी हैं. लेकिन कई घरों में कुछ नहीं बदला. 50 साल की प्रेमलता आंगनबाड़ी में काम करती हैं. बताती हैं कि सुबह उठकर वो गाय को नहलातीं, गोबर साफ़ करतीं, खिलातीं. फिर नहाना-धोना और पूजा करके नाश्ता करतीं. और काम पर निकलतीं. गांव में लोगों को कोरोना के बारे में बताने के लिए. उनकी बेटी इस बीच घर में दो बार की सफाई, दो बार के बर्तन और दो बार का खाना पकाती. बेटा अधिक से अधिक सलाद काट देता है या पानी का गिलास भर लाता है. पति जितने दिन घर पर रहे. बस घर पर रहे. प्रेमलता और उनकी बेटी के लिए इसमें कुछ अजीब नहीं है. कुछ शिकायत लायक नहीं है. आम है.

जिन लोगों की हमने बात की. उसमें अलग-अलग उम्र के लोग थे. नौकरीपेशा. और हाउसवाइफ. इन लोगों से बात कर और इनकी बात यहां रखने के पीछे क्या मकसद था? ये नहीं कि हम किसी की पर्सनल लाइफ में घुस, उनसे उनकी पारिवारिक इक्वेशन पर सवाल उठाएं. बल्कि ये था कि उन कामों को हम कितना समझ पाए हैं जो हमने कभी नहीं किए. हम बड़े हुए तो हमने अपनी मांओं को ये सारे काम करते देखा. लेकिन जब ये काम हमारे ऊपर पड़े तो हम कहीं न कहीं थके, परेशान हुए, असहज हुए. ये सच है कि बदलते समय के साथ घर में काम करने को लेकर भी भूमिकाएं बदली हैं. लेकिन क्या ये आदर्श जगह पर पहुंची हैं? इसका जवाब खुद से मांगिए. क्योंकि सबके जवाब अलग होंगे.

और अगर आप होममेकर हैं. और कोई आपसे पूछ बैठे कि आप क्या करती हैं. तो ये न कहें कि “कुछ नहीं करती, बस हाउसवाइफ हूं.” सिर्फ इसलिए कि घर पर मेंटल और मैन्युअल लेबर करना सैलरी लेकर नहीं आता, वो लेबर कम नहीं हो जाता. हाउसवाइफ होना कभी भी ‘कुछ नहीं करना’ नहीं हो सकता.


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