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महिला मेंटल पेशेंट्स बिना पैड्स काट रहीं अपने पीरियड, शर्मिंदा करने वाले हालात

गौरव बंसल नाम के एक वकील हैं. ह्यूमन राइट और मेंटल हेल्थ एक्टिविस्ट भी हैं. इन्होंने भारत के मेंटल अस्पतालों के हालात में सुधार लाने की मांग रखते हुए सुप्रीम कोर्ट और कुछ हाई कोर्ट्स में याचिकाएं डाली थीं. ‘लाइव लॉ’ की रिपोर्ट की मानें तो 1 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने गौरव बंसल की एक याचिका पर सुनवाई की. इस याचिका में मेंटल केयर इंस्टीट्यूशन्स में रह रहे लोगों के रिहैबिलिटेशन की मांग की गई थी, साथ ही उनके वैक्सीनेशन की भी मांग रखी गई थी. इसी के साथ ऐसे इंस्टीट्यूशन्स और अस्पतालों में रहने वाली औरतों की दयनीय स्थिति पर भी सवाल खड़े किए गए थे.

याचिका में कहा गया था कि कुछ इंस्टीट्यूशन्स में औरतों का ज़बरन मुंडन कर दिया जाता है, ये कहकर कि उन्हें जुएं से बचाने के लिए ऐसा किया जा रहा है. इसके अलावा कुछ इंस्टीट्यूशन्स में औरतों को उनके बच्चों से अलग रखा जाता है और कुछ में तो सैनिटरी नैपकिन्स जैसी बेसिक सुविधा भी उन्हें नहीं मिल पाती. एडवोकेट गौरव बंसल ने NIMHANS की 2016 में आई एक रिपोर्ट और राष्ट्रीय महिला आयोग यानी NCW की 2020 में आई स्टडीज़ का हवाला देते हुए ये बात कही. NIMHANS माने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज.

सुप्रीम कोर्ट ने इन सारी दिक्कतों पर ध्यान देते हुए गंभीर चिंता जताई. जस्टिस चंद्रचूड़, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस हिमा कोहली की बेंच इस मामले पर सुनवाई कर रही थी. कोर्ट ने ऑब्ज़र्व किया,

“NIMHANS की 2016 की स्टडी और 2020 में NCW की स्टडी के आधार पर, ये हाइलाइट किया गया है कि मेंटल हेल्थकेयर इंस्टीट्यूशन्स में औरतों को कई तरह के अपमान का सामना करना पड़ता है और उनके मानवाधिकारों का भी उल्लंघन होता है. जो मुद्दे उठाए गए हैं वो गंभीर चिंता का विषय हैं.”

Supreme Court
SC ने कहा कि मेंटल हेल्थ इंस्टीट्यूट्स में रहने वाली महिलाओं का जबरन मुंडन न कराया जाए. File Photo

TOI की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने निर्देश दिया कि मेंटल इंस्टीट्यूशन्स में रहने वाली औरतों का ज़बरन मुंडन न कराया जाए. इसके लिए कोर्ट ने राज्य सरकारों को निर्देश भी दिए. साथ ही इंस्टीट्यूशन्स से ये भी कहा गया कि Mentally Ill Patients को सैनिटरी नैपकिन्स मुहैया कराए जाएं. तीसरा अहम निर्देश ये दिया गया कि प्रोटोकॉल के हिसाब से महिलाओं का प्रॉपर मेडिकल टेस्ट कराया जाए, जिससे ये पता लग सके कि उनके बच्चे उनके साथ रह सकते हैं या नहीं.

याचिका में और क्या-क्या कहा गया?

याचिका में ये भी कहा गया था कि मेंटल केयर इंस्टीट्यूशन्स में हज़ारों ऐसे लोग रह रहे हैं, जो ठीक हो गए हैं और अब उन्हें इंस्टीट्यूशन्स की बजाए रिहैबिलिटेशन सेंटर्स में रखना चाहिए. या फिर हाफ-वे होम में रखना चाहिए. हमारे साथी नीरज ने एडवोकेट गौरव बंसल से बात की. उन्होंने बताया कि साल 2016 में उन्हें RTI और अन्य सूत्रों के ज़रिए ये जानकारी मिली थी कि देश के करीब 43 सरकारी मेंटल हेल्थ इंस्टीट्यूशन्स में कुछ नहीं तो पांच हज़ार लोग ऐसे हैं, जो ठीक हो गए हैं. लेकिन उनके परिवार वाले उन्हें अपना नहीं रहे हैं. इसकी वजह मेंटल हेल्थ से जुड़ा सोशल स्टिगमा है. और कई दिनों तक मेंटल केयर इंस्टीट्यूशन्स में रहने के बाद अचानक से घर के माहौल में एडस्ट होने में भी दिक्कत आती है, इसलिए एक रिहैबिलिटेशन सेंटर या हाफ वे होम बनाने का निर्देश दिया गया था.

हाफ वे होम यानी घर पहुंचने का आधा सफर तय कर लेना. इन सेंटर्स में ठीक हो चुके लोगों को घर पहुंचने के लायक बनाया जाना था. लेकिन कई राज्य की सरकारों ने इस निर्देश पर ठीक से काम नहीं किया. महाराष्ट्र ने अलग से रिहैबिलिटेशन सेंटर बनाने के बजाए ओल्ड एज होम और बेगर्स होम में उन्हें शिफ्ट करना शुरू कर दिया. वहीं उत्तर प्रदेश में भी ओल्ड एज होम को हाफ वे होम या रिहैबिलिटेशन सेंटर के तौर पर कंसिडर किया जाने लगा.

‘लाइव लॉ’ की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों के इस रवैये पर भी चिंता जताई. कोर्ट ने कहा कि मेन टास्क रिहैबिलिटेट करना है, रिलोकेट नहीं. सुप्रीम कोर्ट ने राज्य की सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि ऐसे इंस्टीट्यूशन्स में रह रहे लोगों को कोविड वैक्सीन लगाई जाए और इसके लिए टाइम बाउंड शेड्यूल एक महीने के अंदर तैयार किया जाए. कोर्ट ने आगे ये निर्देश भी दिया कि सभी राज्य में 6 महीने के अंदर जितनी जल्दी हो सके हाफवे होम्स तैयार किए जाएं. मिनिस्ट्री ऑफ सोशल जस्टिस और इम्पॉवरमेंट को ये निर्देश दिया गया कि वो हर महीने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ मीटिंग करे, और हाफ-वे होम्स, रिहैबिलिटेशन होम्स को लेकर कितना काम हुआ है, ये ट्रैक करे. इस मामले पर अब अगली सुनवाई दिसंबर महीने के आखिरी हफ्ते में होगी.

Mental Health
महाराष्ट्र और यूपी जैसे राज्यों ने कोर्ट के निर्देशों को बाइपास करके मरीजों को बेगर होम्स और ओल्ड एज होम्स में शिफ्ट कर दिया है. जबकि ये नियमों के खिलाफ है. फोटो- Getty

अब लौटते हैं मेंटल केयर इंस्टीट्यूशन्स में रहने वाली महिलाओं के मुद्दे पर. हमारे साथी नीरज ने एडवोकेट गौरव बंसल से बात की. हमने उनसे और भी डिटेल में जानना चाहा कि औरतों की क्या हालत है ऐसे इंस्टीट्यूशन्स में. उन्होंने बताया कि ज़रूरी नहीं है कि हर इंस्टीट्यूशन्स के हाल खराब हों, कुछ काफी सही से भी काम कर रहे हैं, लेकिन कुछ ऐसे हैं, जहां ठीक से ध्यान नहीं रखा जा रहा. सुप्रीम कोर्ट में मेंटल हेल्थ केयर एक्ट 2017 का भी ज़िक्र हुआ था, कहा गया था कि एक्ट के सेक्शन 104 का उल्लंघन हो रहा है. ये एक्ट क्या है और सेक्शन 104 का उल्लंघन कैसे हो रहा है. इसके जवाब में गौरव ने कहा,

“सेक्शन 104 है कस्टोडियल इंस्टीट्यूशंस के लिए. माने ऐसे होम्स जहां लोगों को कस्टडी में रखने की ज़रूरत है. जैसे विमेन सेंटर्स, बेगर्स होम, ओल्ड एज होम आदि कस्टोडियल होम्स हैं. तो जब कोर्ट ने आदेश दिया कि ठीक हो चुके मानसिक रोगियों के लिए रिहैबिलिटेशन सेंटर या हाफ वे होम बनाएं, तो राज्यों ने उस नियम को बायपास करते हुए इन पेशेंट्स को ऐसे कस्टोडियल होम्स में रखवा दिया. जबकि मेंटल हेल्थ पेशेंट्स को कस्टोडियल होम्स में नहीं रखा जा सकता है. एक्ट में ये साफ लिखा है.”

इतनी सारी चर्चा के बाद ये बात तो कन्फर्म हो गई है कि कुछ मेंटल केयर इंस्टीट्यूशन्स के हाल काफी खराब हैं. बहुत सारी सुविधा का अभाव है. लेकिन नियमों के मुताबिक एक तथाकथित आदर्श मेंटल हेल्थ केयर इंस्टीट्यूशन्स कैसा होना चाहिए. इस पर गौरव ने कहा,

“आदर्श मेंटल हेल्थ केयर इंस्टीट्यूट की बात करें तो वहां बेसिक ह्यूमन राइट्स का ख्याल रखा जाना चाहिए. और ये बहुत मुश्किल नहीं है. आपको अच्छा खाना मिले, आपके हाईजीन का ख्याल रखा जाए. ट्रीटमेंट पर फोकस हो. रिहैबिलिटेशन पर फोकस हो. आपकी आइडेंटिटी का ख्याल रखा जाए. आपकी प्राइवेसी का ख्याल रखा जाए. ये बुनियादी चीज़ें हैं. अब इससे आगे बढ़ें तो ये ज़रूरी है कि किसी भी पेशेंट का अस्पताल में लॉन्ग स्टे नहीं होना चाहिए. इलाज के तरीके इतने डेवलप हो चुके हैं कि तीन से छह महीने में पेशेंट को ठीक किया जा सकता है. डॉक्टर्स कहते हैं कि एक पेशेंट में तीन महीने के अंदर पर्याप्त बदलाव आ जाते हैं. अगर किसी मरीज में बदलाव नहीं आ रहा है, तो उसकी कंडीशन के हिसाब से उसकी रीहैबिलिटेशन पर फोकस किया जाना चाहिए.”

NIMHANS और NCW की स्टडी में क्या है?

2015-16 में NIMHANS और NCW ने मिलकर स्टडी की थी और 2019-20 में भी. 19-20 में हुई स्टडी में ये सामने आया था कि कई नामी सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त मात्रा में सैनिटरी नेपकिन्स नहीं दिए जाते, और जहां दिए भी जाते हैं वहां उन्हें खुले में फेंका जाता है. NCW ने19 सायकायट्रिक होम्स का दौरा किया था. जिसके बाद ये पता चला था कि इन होम्स में बड़ी संख्या में नर्सेज़ और मेडिकल अटेंडेंट्स की जगह खाली है. ये भी सामने आया था कि महिला मरीज़ों के लिए उपलब्ध बेड्स की संख्या पुरुष मरीज़ों की तुलना में कम थे. कई इंस्टीट्यूशन्स में तो मरीज़ों को उनके परिवार वालों से भी मिलने नहीं दिया जाता है.

Mental Health Institutes1
एडवोकेट गौरव बताते हैं कि अच्छा खाना, साफ-सफाई, इलाज पर फोकस और प्राइवेसी का ख्याल एक आदर्श मानसिक स्वास्थ्य केंद्र की बुनियादी ज़रूरतें हैं. फोटो- Getty

हाफ वे होम की सुविधा होना हर सायकायट्रिक होम में ज़रूरी है, लेकिन कई इंस्टीट्यूट्स में ये सुविधा नहीं थी. केरल के एक मेंटल हेल्थ सेंटर के सर्वे में ये पता चला था कि सैनिटरी पेड्स तभी दिए जाते हैं जब ज़रूरी हो, नियम के मुताबिक, रेगुलर बेसिस पर नहीं दिए जाते. पंजाब के एक सरकारी मेंटल हेल्थ अस्पताल के सर्वे में पता चला था कि सैनिटरी पेड्स और बाकी पर्सनल टॉयलेटरी आइटम्स डोनेशन बेसिस पर दिए जाते हैं, अस्पताल के पास अलग से इसका कोई बजट नहीं है. तेलंगाना के एक सरकारी मेंटल अस्पताल में दौरे के बाद ये बात सामने आई थी कि यहां सैनिटरी नैपकिन्स दिए ही नहीं जाते. सर्वे में ये भी पाया गया कि ऐसे इंस्टीट्यूशन्स में बंद औरतें घर जाना चाहती हैं.

साल 2014 में ‘ह्यूमन राइट वॉच’ ने एक रिपोर्ट जारी की थी. जिसमें भारत के मेंटल हेल्थ इंस्टीट्यूशन्स में रह चुकी औरतों से बात की गई थी. जिसमें ये कहा गया कि इन इंस्टीट्यूशन्स में रहने वाली औरतों के साथ “जानवरों से भी बदतर” बर्ताव किया जाता है. HRW ने पाया कि कई औरतें इन इंस्टीट्यूशन्स में भर्ती ही नहीं होना चाहती थीं, लेकिन उनके परिवार वाले ज़बरन उन्हें भर्ती करवा देते थे. जहां उन्हें काफी ज्यादा अब्यूज़ का सामना करना पड़ता है. HRW में रिसर्चर कीर्ति शर्मा ने कहा था,

“इन इंस्टीट्यूशन्स में औरतों और लड़कियों को एक तरह से उनके परिवार वाले डम्प कर देते हैं, क्योंकि सरकार ज़रूरी सपोर्ट प्रोवाइड करने में नाकाम रहती है. और एक बार वो औरतें वहां चली जाएं तो उनकी ज़िंदगी अकेलेपन, डर, अब्यूज़ के सहारे हो जाती है और उन्हें बचने की कोई उम्मीद नहीं दिखती.”

मेंटल हेल्थ से जुड़ी दिक्कतें, वैसी ही हैं जैसी शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़ी दिक्कतें होती हैं. लेकिन हमारे यहां मेंटल हेल्थ की किसी भी दिक्कत से जूझ रहे व्यक्ति को हिकारत भरी नज़रों से देखा जाता है. ये समझा ही नहीं जाता कि मेंटल हेल्थ से जुड़ी समस्याएं भी इंसान को हो सकती हैं. इस सोच को बदलने की सख्त ज़रूरत है.


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