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'गुंजन सक्सेना' में वायुसेना को लेकर झूठी बातें दखाई गईं? क्या कहती हैं महिला अफसर?

‘गुंजन सक्सेना – द कारगिल गर्ल’ फिल्म नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ हो चुकी है. और इसी के साथ एक नई बहस भी छिड़ गई है. बहस की शुरुआत हुई इंडियन एयर फोर्स यानी भारतीय वायुसेना (IAF) के एक लेटर से. IAF ने सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) यानी सेंसर बोर्ड को एक लेटर लिखा. कहा कि फिल्म और ट्रेलर में वायुसेना को नकारात्मक तरीके से दिखाया गया. ‘इंडिया टुडे’ में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, लेटर में लिखा गया,

“स्क्रीन पर एक्स-फ्लाइट लेफ्टिनेंट गुंजन सक्सेना के किरदार को ग्लोरिफाई करने के चक्कर में धर्मा प्रोडक्शन ने कुछ स्थितियों को ऐसे पेश किया जो भ्रमित करने वाली हैं और ऐसा दर्शाती हैं कि खासकर वायुसेना में महिलाओं को लेकर वर्क कल्चर खराब है.

एक सेवा के तौर पर वायुसेना ने हमेशा सुनिश्चित किया है कि संगठन हमेशा जेंडर न्यूट्रल रहे और उसने हमेशा महिला और पुरुषों को बराबर मौके दिए हैं. स्क्रिप्ट के सीन/डायलॉग का निचोड़ जेंडर बायस दिखाने की वजह से आपत्तिजनक है.”

असल में फिल्म में दिखाया क्या गया है?

दरअसल, फिल्म में गुंजन के बचपन से लेकर कारगिल युद्ध में हेलीकॉप्टर उड़ाने तक के सफर को दिखाया गया है. उन्हें लड़की होने की वजह से किस तरह की दिक्कत आई, जब वो एयर फोर्स में बतौर हेलीकॉप्टर पायलट शामिल हुईं, तो ट्रेनिंग के वक्त उन्हें क्या-क्या सामना करना पड़ा, पुरुष अधिकारी एक महिला पायलट को लेकर क्या सोच रखते थे, ये सब दिखाया गया है. फिल्म में. एक सीन में तो फ्लाइट कमांडर दिलीप सिंह, गुंजन से ये तक कहते दिखे हैं कि वो मर्दों जितनी ताकतवर नहीं हैं, वो महिला हैं इसलिए कमज़ोर हैं. लगभग-लगभग पूरी फिल्म में गुंजन की क्षमता को पुरुष पायलट्स के मुकाबले कम आंका गया. लेकिन आखिर में गुंजन ने साबित किया कि वो भी किसी से कम नहीं हैं. मोटा-मोटी यही पूरी फिल्म में अलग-अलग तरीकों से देखने को मिला है. इसी बात पर एयर फोर्स की तरफ से सेंसर बोर्ड को लेटर लिखा गया.

तो महिला अधिकारियों से कैसा बर्ताव होता था?

ऊपर जो कुछ भी हमने लिखा है, वो फिल्म की कहानी के आधार पर लिखा है. लेकिन फिल्म में दिखाई जाने वाली बात कितनी सही है कितनी नहीं. और एयर फोर्स का दावा कितना सही है कितना नहीं, ये समझने के लिए हमने बात की एयर फोर्स की कुछ महिला अधिकारियों से. जिनसे भी बात की, वो एयर फोर्स में महिलाओं की एंट्री के शुरुआती कुछ बैचेस में शामिल थीं. यानी 1994 से 1999 के आस-पास के बैचेस में.

# फ्लाइंग ऑफिसर कविता (बदला हुआ नाम)

कौन हैं?

वायुसेना में ट्रांसपोर्ट पायलट थीं. पहले पायलट कोर्स के तहत वायुसेना में शामिल हुई थीं.

एक्सपीरियंस बताने से पहले कविता ने फिल्म में दिखाए गए एक फैक्ट पर बात की. कहा,

“मैं पहले कोर्स की फ्लाइंग अधिकारी हूं. फिल्म में गुंजन को पहले पायलट कोर्स की फ्लाइंग अधिकारी बताया गया, लेकिन ऐसा नहीं है. वो चौथे पायलट कोर्स की फ्लाइंग अधिकारी हैं. फिल्म में ये बात गलत दिखाई गई है. उन्होंने डिस्क्लेमर दे रखा है कि वो अपनी क्रिएटिव फ्रीडम का इस्तेमाल करेंगे, जिससे लोगों को फिल्म-मेकर ने ये बताने की कोशिश की है कि वो (गुंजन) शुरू के बैचेस की थीं.”

फिर एक्सपीरियंस पर क्या कहा?

कविता कहती हैं,

“हम ज्यादातर लड़कियों को इतना तो मालूम था कि इतना आसान नहीं होने वाला. ज्यादातर आदमी शुरू-शुरू में हमसे बात नहीं करते थे. दो-तीन महीने मैं भी अपने रूम में अकेले बैठती थी. एक कोने पर टेबल लगा हुआ था, उसी में मैं पढ़ती रहती थी. मैं और मेरी कोर्समेट दिल्ली में थे. लेकिन अलग यूनिट में थे. शुरू-शुरू में ज्यादातर हम लोगों को काफी शो के लिए… क्योंकि नॉवेल्टी थी शायद इसलिए हमको ज्यादा गार्ड ऑफ ऑनर के लिए भेजा जाता था. रिसीव करने के लिए एस्कॉर्ट्स के तौर पर. वैसे हर अधिकारी ये करता था. तो इसी वजह से हमें शुरू में फ्लाइंग कम मिली.”

क्या टॉयलेट न होने की दिक्कत थी?

फिल्म में दिखाया गया कि गुंजन को अपने यूनिट में अलग से लेडी वॉशरूम या टॉयलेट नहीं मिलता था, ओवरऑल्स बदलने के लिए उनके लिए कोई जगह नहीं थी. इस पर कविता ने अपने अनुभव पर कहा,

“वो दिक्कत बिल्कुल थी. जैसा कि मैंने कहा कि हम गुंजन से डेढ़-दो साल पहले के बैच के हैं, तो ये दिक्कत तो थी. यूनिट के अंदर से अलग से कोई लेडीज़ टॉयलेट नहीं था. मेल टॉयलेट्स थे. और जो नॉर्मल टॉयलेट्स होते हैं, वो थे. लेकिन हमारे सीनियर अधिकारी बहुत अच्छे भी थे. मेरे CO ने मुझे कह दिया था कि मैं उनके ऑफिस के वॉशरूम का इस्तेमाल कर सकती हूं. जब कभी उनका ऑफिस बंद होता था, तो मैं मेल टॉयलेट्स में नॉक करती थी, पुरुष अधिकारी जो अंदर होते थे, वो निकल आते थे. मैं अंदर जाकर उसे अंदर से बंद करके उसका इस्तेमाल कर लेती थी. स्टाफ सहयोग करता था. कोई शक नहीं है. बहुत कम ऐसे लोग थे, इक्का-दुक्का, जिन्हें इस चीज़ के साथ एडजस्ट करने में मुश्किल हुई. दूसरी ये बात थी कि जो यंग लोग फौज में आए हैं, उनसे अनुशासन का पालन करवाना था, उन्हें तौर-तरीका सिखाना था. और ये केवल लड़कियों के साथ नहीं था, जिन नए लड़कों ने भी हमारे बाद या मेरे साथ जॉइन किया था, उनसे भी कड़ाई से पेश आते थे. ताकि फौज की ज़रूरत के साथ पूरी तरह ढल जाएं.”

क्या कभी सॉर्टी कैंसिल हुई?

(सॉर्टी यानी ट्रेनिंग की उड़ानें) कविता कहती हैं कि वो आगे रह-रहकर काम करती थीं, सीखती थीं, इन वजहों से वो काफी जल्दी अपनी यूनिट का हिस्सा बन गईं. हालांकि उन्होंने आगे ये कहा कि कुछ सीनियर अधिकारियों को थोड़ी दिक्कत थी. कविता कहती हैं,

“हम थोड़े छोटे थे उम्र में. 22 साल की थी जब मैं गई थी. थोड़े जो सीनियर अधिकारी थे, पुराने वक्त के थे, उनको थोड़ी सी मुश्किल हुई. मेरे से दो-चार पोस्ट सीनियर थे. मेरे नेविगेटर थे. वो मुझे कन्या बुलाते थे. मुझे नहीं पता था शुरू में कि उन्होंने मेरे साथ फ्लाइंग करने के लिए मना किया है. एक-दो बार ऐसा हुआ कि जब वो फ्लाइंग के लिए प्लान्ड थे, तो मुझे बोला गया कि इसमें नहीं जा सकती मैं. जब मैंने कहा कि मुझे भी जाना है, मुझे फ्लाइंग नहीं मिल रही, तो उन्होंने कहा कि इस फ्लाइट में नहीं जा सकते, लेकिन कारण नहीं बताया गया. कुछ हफ्तों के बाद ऐसा हुआ कि वो (सीनियर नेविगेटर) सॉर्टी के लिए प्लान्ड थे, जिन्हें उनके साथ जाना था वो बीमार हो गए. तो CO ने कहा कि जल्दी ओवरऑल्स डालो और चलो, लंबी सॉर्टी है. हम सॉर्टी में गए. काफी खराब मौसम था. उस सॉर्टी के बाद सर ने मुझे कहा कि ‘मैं तुम्हारे साथ, कभी भी, कहीं भी, किसी भी फ्लाइट में बोलेंगे, तो मैं तुम्हारे साथ चलने को तैयार हूं’. वो हरियाणा से थे, जो उन्होंने अपने बचपन में देखा था, तो हो सकता है कि उनके दिमाग में ये रहा हो कि भई पता नहीं लड़कियों को कितनी ट्रेनिंग मिली है, कितनी अच्छी हैं, या क्या कर सकती हैं.”

‘सबका एक्सपीरियंस अलग है’

कविता का कहना है कि उन्हें लड़की होने की वजह से एयर फोर्स में ज्यादा दिक्कत नहीं हुई, लेकिन वो ये बात भी मानती हैं कि सबके साथ ऐसा नहीं था. वो कहती हैं,

“मुझे उतनी मुश्किल नहीं हुई, लेकिन मैं मानती हूं कि ऐसा सबके साथ नहीं था. हर एक लड़की का एक जैसा अनुभव नहीं था अपनी यूनिट में. क्योंकि मैं एयर फोर्स परिवार से थी, फिर मैंने NCC भी कर रखी थी. मुझे ऐसा कुछ बड़ा अंतर अपने में और मेरे साथ के नए जो मेल अधिकारी थे, उनकी जॉइनिंग में दिखाई नहीं दिया. हां ये है कि शुरू-शुरू में, मेस में जब हम जाते थे, तो हम जहां बैठते थे, लड़के दो सीट छोड़कर बैठते थे हमसे, लेकिन मैं अपनी कोर्समेट के साथ जाती थी, इसलिए मैंने इस पर ध्यान नहीं दिया था.”

लड़की होने की वजह से हैरेसमेंट हुआ या नहीं?

आगे कविता ने कहा कि उनके साथ कभी ऐसा कुछ नहीं हुआ, जिससे उन्हें ये महसूस हो कि लड़की होने की वजह से उनका हैरेसमेंट हो रहा है. उन्होंने कहा,

“अधिकारियों का एक सेगमेंट बहुत खुश था, इस बात से कि हम भी आए हैं. मेरी यूनिट में भी पोस्टर हटा दिए गए थे. तीन-चार महीनों के बाद जब सब कम्फर्टेबल हो गए थे मेरे साथ, तो उन्होंने खुद कहा था कि देखो तुम्हारी वजह से वो पोस्टर हमने हटा दिया था. मैंने कहा कि ‘सर निकालिए सारे पोस्टर, लगाते हैं. मैं भी अपने पोस्टर्स लेकर आऊंगी. मुझे कोई दिक्कत नहीं…’ लेकिन मैं ये बता रही हूं कि हो सकता है कि मैं जिस परिवार से आई थी, मैं इस चीज़ को अनदेखा कर देती थी. मेरा इस तरह का कोई एक्सपीरियंस नहीं रहा है. हां, ये है कि कुछ लोग ऐसे थे जिनकी सोच उतनी खुली नहीं थी, वो थोड़ा हिचकिचाते थे.”

कविता का ये कहना है कि उन्हें उनकी यूनिट में सपोर्ट करने वाले भी कई अधिकारी मिले थे, जिन्होंने उन्हें गाइड किया और काम भी सिखाया.

# विंग कमांडर नम्रिता चांदी

कौन हैं?

वायुसेना में हेलीकॉप्टर पायलट थीं. दूसरे हेलीकॉप्टर पायलट कोर्स के तहत वायुसेना में शामिल हुई थीं. गुंजन सक्सेना की कोर्समेट थीं. 15 साल तक वायुसेना में रहीं.

Namrita Chandi Af
विंग कमांडर नम्रिता चांदी (रिटायर्ड). इन्होंने एक मैगज़ीन में भी फिल्म को लेकर आर्टिकल लिखा है. (फोटो- स्पेशल अरैंजमेंट)

फिल्म पर क्या कहा?

नम्रिता ने बताया कि वो फिल्म पर ज्यादा नहीं बोलना चाहतीं, क्योंकि डिस्क्लेमर फिल्म की शुरुआत में ही है, कि उसे कहानी के तौर पर ढालने के लिए डेवलप किया गया है. आगे कहती हैं,

“उसमें बहुत सी ऐसी चीज़ें दिखाई गई है. जो वास्तविक नहीं है. आपको उसे फिल्म बनाना है, इसलिए आपने वो सब उस तरह से दिखाया. जो असल में हुआ था, और जो फिल्म है उसमें बहुत अंतर है. मुझे लगा कि फिल्म महिलाओं को एयर फोर्स में आने के लिए प्रेरित करने के लिए अच्छा एक्सपीरियंस होगा. मुझे उत्साह था देखने का. लेकिन फिल्म देखकर मुझे हैरानी हुई. गुंजन के कैरेक्टर को अहमियत देने के लिए, उन्होंने एयर फोर्स ऑर्गेनाइज़ेशन को ट्विस्ट कर दिया है. काफी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा इसका उन महिलाओं पर जो वायुसेना में आना चाहती हैं.”

एयरफोर्स में एक्सपीरियंस कैसा रहा?

इसके जवाब में नम्रिता ने कहा,

“ये भी फैक्ट है कि हमने भी कई दिक्कतों का सामना किया था. अलग टॉयलेट नहीं थे, चेंजिंग रूम नहीं थे, लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि जो मूवी में दिखाया गया है, जैसे आपकी सॉर्टी कैंसिल हो रही हैं, आपको महिला होने की वजह से टारगेट किया जा रहा है, या आपके साथी आपसे बात नहीं करना चाह रहे, या आपको सोशली एलिमिनेट (दूरी बनाना) किया जा रहा है, ऐसा बिल्कुल भी नहीं था.”

आगे नम्रिता ने कहा कि ये भी सच है कि महिलाओं को खुद को साबित करना पड़ता था, ये बताना पड़ता था कि जो काम पुरुष अधिकारी कर सकते हैं, वो महिला अधिकारी भी कर सकती हैं, लेकिन एक बार अगर उन्होंने खुद को साबित कर दिया, तो कोई अंतर नहीं होता था दूसरों से. नम्रिता कहती हैं कि सच्चाई और फिल्म की तुलना अगर की जाए, तो 70 फीसद बातें फिल्म के अंदर की मनगढ़ंत निकलेंगी.

मेल स्टाफ का बर्ताव कैसा था?

नम्रिता का कहना है कि जिस तरह से फिल्म में पुरुष अधिकारियों का बर्ताव दिखाया गया है, वैसा उनके साथ कभी नहीं हुआ. उन्होंने कहा,

“बहुत कुछ खुद पर भी डिपेंड करता है. कि आप कैसे एडजस्ट होते हो, आप कितनी मेहनत और लगन से काम करते हो, इस पर निर्भर करता है. मेरी भी जो पहली पोस्टिंग हुई थी, वहां मैं अकेली महिला पायलट थी, बाकी 23 कलीग्स मेरे मेल थे. लेकिन फिल्म में जो दिखाया वैसा बर्ताव मेरे साथ कभी नहीं हुआ. फिर अगर मेरे कलीग्स की बात करूं, तो ऐसा बर्ताव तो नहीं हुआ, जो फिल्म में दिखाया गया. जैसे कि सॉर्टी कैंसिल कर देना या मुझसे बात नहीं कर रहे हों, ऐसा नहीं था.”

‘फिल्म में ज्यादा दिखा दिया गया’

नम्रिता ने आगे कहा कि दिक्कतें थीं, थोड़ी तो थीं, लेकिन फिल्म में जितना ज्यादा दिखाया गया, वैसा नहीं था. उनका कहना है कि फिल्म में वायुसेना की इमेज को ही बदल दिया गया है. वो आगे कहती हैं,

“अगर हम लैंगिक असमानता की बात करें, तो बड़े स्तर पर वो है. जैसे कि मुझे अपना परमानेंट कमिशन लेने के लिए कोर्ट जाना पड़ा. तो इस असमानता को मैं खारिज नहीं करती. लेकिन दिन-प्रतिदिन के कामकाज में जो असमानता की बात फिल्म में दिखाई गई है, वो पूरी तरह से गलत है. जो कुछ भी फिल्म में डाला है, वो कहानी में मसाला डालने के लिए डाला है, इसके अलावा कुछ नहीं है.”

# एयरफोर्स ऑफिसर श्रीविद्या राजन (रिटायर्ड)

कौन थीं?

एयरफोर्स में हेलीकॉप्टर पायलट थीं. गुंजन सक्सेना की कोर्समेट थीं. उधमपुर में गुंजन के साथ ही पोस्टिंग हुई थी. कारगिल युद्ध में इन्होंने भी अपनी सेवाएं दी थीं.

Sreevidya Rajan
बाएं से दाएं: श्रीविद्या राजन की अभी की तस्वीर (फोटो- फेसबुक). उधमपुर में गुंजन सक्सेना के साथ श्रीविद्या. (फोटो- ट्विटर)

मूवी पर क्या कहा?

श्रीविद्या ने फिल्म को लेकर फेसबुक के ज़रिए अपनी बात रखी. उन्होंने कहा,

“धर्मा प्रोडक्शन्स की नई फिल्म ‘गुंजन सक्सेना: दी कारगिल गर्ल’ को मेरे साथी अधिकारियों और दोस्तों से मिले-जुले व्यूज़ मिल रहे हैं. उधमपुर में मैं गुंजन के साथ पोस्ट होने वाली इकलौती महिला अधिकारी थी, और इस सफर में हमने कई तरह के उतार-चढ़ाव देखे. अब मैं अपना नज़रिया भी रखना चाहती हूं.”

इसके आगे श्रीविद्या ने उधमपुर में अपनी पोस्टिंग के शुरुआती दिनों पर बात की. उन्होंने कहा,

“हम कोर्समेट थे. AFA (एयरफोर्स एकेडमी) और HTS में साथ में हमने ट्रेनिंग ली थी. हम साथ में 1996 में उधमपुर में पोस्टेड हुए थे, लेकिन फिल्म में ये दिखाया गया है कि वो यूनिट में पोस्टेड अकेली महिला अधिकारी थीं. चूंकि हम दोनों हेलीकॉप्टर यूनिट में पोस्ट होने वाली पहली महिला पायलट्स थीं, तो उड़ान के पुरुष प्रधान क्षेत्र में हमें अपनी स्वीकृति को लेकर संदेह था. हमें कुछ साथियों ने सामान्य पूर्व धारणाओं और पूर्वाग्रहों के साथ रिसीव किया था. हालांकि वहां काफी अधिकारी ऐसे थे, जो हमारे सपोर्ट में थे. हम कड़ी निगरानी में थे और हमारी कुछ ऐसी गलतियों पर बेहद कड़ा एक्शन लिया गया जो हमारे पुरुष साथी करते तो उन्हें शायद नज़रअंदाज़ कर दिया जाता. हमें अपने समकक्षों को ये बताने के लिए कि हम भी उनका हिस्सा हैं, उनकी तुलना में कड़ी मेहनत से काम करना पड़ता था. कुछ प्रोफेशनल स्पेस को हमसे शेयर करने पर खुश नहीं थे, लेकिन ज्यादातर अधिकारियों ने इसे एक्सेप्ट किया और एक सांझा लक्ष्य पाने के मकसद से हमें अपने साथी अधिकारियों की तरह ही ट्रीट किया.”

फिल्म की तरह कभी सॉर्टी कैंसिल हुई?

श्रीविद्या ने आगे अपने सॉर्टी के एक्सपीरियंस को शेयर किया. कहा,

“हमारे पहुंचने के कुछ दिन के अंदर ही हमारी उड़ानें शुरू हो गईं. और कोई भी छोटे कारणों से वो कभी बाधित या रद्द नहीं हुईं. फिल्म में जो दिखाया गया है, वो गलत है. स्क्वाड्रन कमांडर पूरे प्रोफेशनल थे. वो एक बहुत ही सख्त अधिकारी थे, जब भी हमारी तरफ से कोई गलती होती थी, वो हमें टास्क देते थे, फिर वो गलती चाहे महिला से हो या पुरुष से. फिल्म में शारीरिक ताकत के आधार पर जो अपमान होना दिखाया गया है, वैसा हमारे साथ कभी नहीं हुआ था. हमारे साथी अधिकारियों ने कभी हमसे बुरा बर्ताव नहीं किया और न ही कभी हमारा अपमान किया.”

टॉयलेट्स के मुद्दे पर क्या कहा?

श्रीविद्या ने आगे बात की यूनिट में महिला टॉयलेट्स के मुद्दे पर. उन्होंने कहा,

“जैसा फिल्म में दिखाया गया है, यूनिट में महिलाओं के लिए कोई अलग से टॉयलेट्स या फिर चेंजिंग रूम्स नहीं थे. शुरुआती मुश्किलों के बाद, हमने अपने साथी अधिकारियों के साथ सीमित साधनों को शेयर किया. जब भी हमें ज़रूरत हुई, उन्होंने हमेशा हमारी मदद की.”

फिल्म के फैक्ट पर भी बात की

श्रीविद्या ने कहा कि फिल्म में ये दिखाया गया है कि गुंजन कारगिल ऑपरेशन में जाने वाली अकेली महिला पायलट थीं, जो कि असल में गलत है. उन्होंने कहा,

“हम साथ में उधमपुर में पोस्टेड थे और जब कारगिल युद्ध शुरू हुआ, तब हमारे यूनिट से सेना की जो पहली टुकड़ी श्रीनगर गई थी, तब जिन पुरुष अधिकारियों को भेजा गया था, उनके साथ जाने वाली मैं पहली महिला पायलट थी. गुंजन के श्रीनगर आने से पहले मैं युद्ध क्षेत्र के कई फ्लाइंग मिशन कर चुकी थी. ऑपरेशन के कुछ दिन बाद, गुंजन क्रू के अगले सेट के साथ श्रीनगर आईं. हमें जो भी ऑपरेशन दिए गए, उनमें हमने एक्टिव होकर पार्ट लिया. इन ऑपरेशन्स में हताहतों को लाना, ज़रूरी सामान का सप्लाई करना, कम्यूनिकेशन सॉर्टी, SAR वगैरह शामिल थे. क्लाइमेक्स में जो नायक के वीरतापूर्ण एक्ट्स दिखाए गए हैं, वो असल में कभी हुआ ही नहीं था और जिसे हो सकता है कि सिनेमाई लाइसेंस के हिस्से के तौर पर दिखाया गया हो.”

फिल्म-मेकर्स ने फैक्ट्स को ट्विस्ट कर दिया

श्रीविद्या ने आगे लिखा कि उन्हें लगता है कि फिल्म-मेकर्स ने तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया है. उन्होंने कहा,

“गंजन और मैं दो स्टेशन्स में साथ में पोस्टेड थे. उनकी कोर्समेट और अच्छी दोस्त होने के नाते, मुझे ऐसा लगता है कि गुंजन ने जो फैक्ट्स बताए होंगे, फिल्म-मेकर्स को ने उन्हें पब्लिसिटी के लिए ट्विस्ट करके पेश किया है. वो एक शानदार ऑफिसर हैं और बहुत प्रोफेशनल हैं. उन्होंने अपने करियर में कई सारी उपलब्धियां हासिल की, जिन्हें फिल्म में युवा पीढ़ी को प्रेरित करने के लिए दिखाया जाना चाहिए था, लेकिन इसकी जगह उन्हें कई सीन्स में एक कमज़ोर और दबे हुए विक्टिम की तरह दिखाया गया. महिला पायलट्स के पायोनियर (अगुआ) होने के नाते, हमारे साथ बहुत सम्मानपूर्वक बर्ताव किया जाता था. और ये हमारी ज़िम्मेदारी थी कि हम उम्मीदों पर खरा उतरें और आने वाली पीढ़ियों को रास्ता दिखाएं. ये फिल्म देश के एक प्रतिष्ठित ऑर्गेनाइजेशन का अपमान करते हुए इंडियन एयरफोर्स की महिला अधिकारियों के बारे में गलत संदेश दे रही है.

मैं केवल इतना चाहती हूं, कि चूंकि ये फिल्म एक बायोपिक है, गुंजन को फिल्म को अप्रूवल देने से पहले ये सुनिश्चित कर लेना था कि इसमें सही फैक्ट्स जाएं और IAF को एक सकारात्मक तरीके से दिखाया जाए.”

फिर बताया क्यों कारगिल की पहली महिला पायलट होने का दावा नहीं किया?

इस फेसबुक पोस्ट के आखिर में श्रीविद्या ने कहा कि कारगिल में उड़ान भरने वाली पहली महिला पायलट वो थीं, लेकिन उन्होंने कभी भी किसी भी फोरम में इसका दावा नहीं किया. उन्होंने कहा,

“लैंगिक समानता पर मजबूत भरोसे की वजह से मैंने पहले कभी किसी फोरम में ये दावा नहीं किया. कारगिल ऑपरेशन्स में, पुरुष पायलट्स ने बड़े पैमाने पर उड़ान भरी थीं और हमसे कहीं ज्यादा कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था. लेकिन उन्हें कभी कोई पब्लिसिटी नहीं मिली, न उन्होंने चाही. हमें ये संभवत हमारे जेंडर की वजह से मिली है, जिसे मैं सपोर्ट नहीं करती. डिफेंस सर्विस में, पुरुष और महिला के बीच कोई असमानता नहीं है. हम सभी वर्दी में अधिकारी हैं.”

# विंग कमांडर अनुमा आचार्य (रिटायर्ड)

कौन हैं?

वायुसेना में महिलाओं की एंट्री के दूसरे बैच में शामिल थीं. 2 जनवरी 1993 में एयरफोर्स एकेडमी जॉइन की थी, 18 दिसंबर 1993 में पास आउट हुई थीं. वायुसेना की लॉजिस्टिक ब्रांच में ग्राउंड ड्यूटी पर थीं.

Anuma Acharya
विंग कमांडर अनुमा आचार्य (रिटायर्ड). अनुमा ग्राउंड ड्यूटी के लिए जब महिलाओं को एयरफोर्स में लिया गया, उसके दूसरे बैच से हैं.

शुरुआती एक्सपीरियंस कैसा था?

अनुमा कहती हैं जब वो एयरफोर्स में शामिल हुईं, तब जो कंडीशन पुरुष अधिकारियों के लिए थीं, वही महिला अधिकारियों के लिए भी थीं. वो कहती हैं,

“हमें केवल आधा मिनट या चालीस सेकंड्स की छूट मिलती थी, दौड़ में. क्योंकि पुरुषों की तुलना में महिला अधिकारियों की हाइट कम होती है. फिर हमारी ट्रेनिंग जो हुई, उसमें भी हमें पुरुष अधिकारियों की तरह सारे काम दौड़कर करने होते थे. कहीं कोई शॉर्ट कट्स नहीं थे. जो हमारी क्लास रूम स्टडीज़ थीं, उसमें भी मेरिट पर काम होता था, उसमें फिर चाहे पुरुष अधिकारी हो या महिला, परफॉर्मेंस पर ही नंबर मिलेंगे.”

जब यूनिट में पहुंची थीं, तब क्या हुआ था?

अनुमा कहती हैं कि ट्रेनिंग के बाद जब वो अपनी यूनिट में पहुंची थीं, तब करीब 25-30 अधिकारी इंतज़ार में बैठे थे. वो कहती हैं,

“25-30 अधिकारी तैयार थे, हमारा इंतज़ार कर रहे थे. कुछ खुशी से, कुछ जिज्ञासा में, कुछ खुशी से और कुछ अच्छा देखें कौन हैं. इस तरह से थे. तो तीनों तरह के लोग थे. ये बहुत साफ तरह से पता था कि हम जहां पर रास्ता बना रहे हैं, वहां पर रास्ता था नहीं. हमको ही बनाते हुए अंदर जाना है. कहीं भी कोई नई चीज़ शुरू होती है तो रास्ते बनाने पड़ते हैं. कलीग ऑफिसर्स से दिक्कत नहीं आई. हमारे आस-पास के या एक-दो साल बड़े अधिकारी गाइड की तरह काम करते थे. हमें लोग बहुत अच्छे ही मिले. प्रॉब्लम कहां हुई, हमारे अंडर में काम करने वाले जो लोग थे, जिन्हें हमारे यहां एयर मैन कहते हैं, तो उस एयर मैन का सीनियर लॉट, जो उस समय 45 से लेकर 55 के बीच होते हैं, उनको ये दिक्कत थी कि ये तो हमारी बेटी के बराबर है, इसको अब मैम-मैम बोलना पड़ेगा. तो हमें सिखाया गया कि उनके नाम के आगे मिस्टर लगाएं. जैसे किसी का अग्रवाल सरनेम है, तो हम बोलेंगे मिस्टर अग्रवाल. या वारंट ऑफिसर अग्रवाल. जबकि सार्जेंट और कॉर्पोरल्स 24, 25, 30 साल के थे, तो उन्हें हम नाम से बुला लेते थे.”

अनुमा ने ये कहा कि ये सच है कि शुरुआत में महिलाओं के लिए अलग से टॉयलेट्स नहीं थे, लेकिन हर आर्म्ड फोर्सेज़ के स्क्वाड्रन में या हेडक्वार्टर में कभी न कभी कोई महिला आती ही हैं, बरसों से आती हैं, ऑफिसर्स की पत्नियां आती थीं, तो एक न एक टॉयलेट ऐसा ज़रूर होता था, जिसे महिलाएं इस्तेमाल कर सकती थीं. इसके अलावा अनुमा ने ये भी कहा कि ज़रूरत पड़ने पर पुरुषों के टॉयलेट्स भी इस्तेमाल कर लेती थीं, इसमें कभी कोई दिक्कत नहीं हुई.

फिल्म पर क्या कहना है?

अनुमा कहती हैं कि जब उनका बैच एयरफोर्स में शामिल हुआ, तो पुरुष अधिकारी दुश्मनों की तरह नहीं खड़े थे. उन्होंने कहा,

“फिल्म को लेकर एयरफोर्स ने जो आपत्ति जताई है वो अपनी जगह पर बिल्कुल सही है, क्योंकि मैंने जैसे बताया कि पुरुष अधिकारी दुश्मन बनकर नहीं खड़े थे. हम जब आए थे, तो उनके मन में हमारे लिए उत्सुकता भी थी, दूसरे कुछ लोग तो उस बैरियर से आगे आकर फ्रेंडली भी थे और तीसरी चीज़ ये भी थी कि उन वरिष्ठ अधिकारियों को ये भी ध्यान रखना था कि इतना ज्यादा अच्छा बर्ताव भी न हो कि नए लोग चढ़ जाएं, उन्हें उसी तरह से बर्ताव करना था, जैसा बाकी अधिकारियों के साथ होता है.”

अनुमा ने आगे बताया कि वो लॉजिस्टिक ऑफिसर थीं, उन्हें जो भी काम दिए जाते थे वो करती थीं. उन्होंने आगे कहा,

“हमारे बॉस ने हमें ज़रा भी आराम नहीं दिया कि आप आकर ऑफिस में बैठिए, अच्छा काम करिए और चलते बनिए. जो एक नए अधिकारी का रगड़ा लगना चाहिए, वो उन्होंने हमारा लगाया. उन्होंने कोई ज्यादा प्यार से बात करने की कोशिश नहीं की. उनके ऊपर दोहरी ज़िम्मेदारी थी. एक कि वो लैंगिक पक्षपाती भी न दिखें, दूसरा इतना ज्यादा भी वो हमारे साथ अच्छे न हो जाएं कि जो हमारे सीखने का समय है उसको आप दूसरे ऑफिसर्स की तरह न सिखाएं. ये ज़िम्मेदारी सीनियर्स पर थी उस समय. इसे उन्होंने बखूबी निभाया. बिल्कुल उन्होंने बराबरी देने की कोशिश की.”

‘बाकी लोगों का क्रेडिट नहीं खाना था’

अनुमा ने फिल्म को लेकर कहा कि अगर कहानी में एक असल महिला अधिकारी के नाम का इस्तेमाल किया गया है, तो बाकियों के क्रेडिट को नहीं हटाना चाहिए था. उन्होंने कहा,

“गुंजन सक्सेना की कहानी पर मैं ये कहूंगी कि उन्होंने एक असल महिला का नाम इस्तेमाल किया है, तो फिर दूसरो के क्रेडिट उन्हें नहीं हटाने चाहिए थे. क्योंकि क्रेडिट श्रीविद्या का भी होता है. वो गुंजन के साथ ही पोस्टेड थीं. तो अकेले गुंजन को पूरा क्रेडिट ले लेना. फिर एक और चीज़ उसमें बोली है कि पहला महिला पायलट कोर्स, तो वो भी गलत बात है, क्योंकि पहला पायलट कोर्स तो प्रिया वगैरह का था. गुंजन चौथे बैच से थीं. पायलट के चौथे बैच से थीं.”

SSB की प्रोसेस पर क्या कहा?

अनुमा का कहना है कि SSB यानी सर्विस सेलेक्शन बोर्ड की प्रोसेस को भी गलत तरीके से दिखाया गया है. उन्होंने कहा,

“SSB की प्रक्रिया पूरी गलत बताई है. एक तो गुंजन सक्सेना के चेहरे में लगातार इस तरह का खौफ रहता है कि ऐसे लोग तो आर्म फोर्सेज़ में लिए ही नहीं जाते हैं.”

अनुमा ने आगे कहा कि फिल्म में दिखाया कि मेडिकल एग्जामिनेशन बगल के कमरे में हो गया, जबकि ऐसा नहीं होता है. टेस्ट पास करने के दो-तीन महीने बाद मेडिकल होता है.

जब कोई देखकर सैल्यूट न करे तो?

फिल्म में एक सीन है, जिसमें ये दिखाया गया है कि गुंजन से जूनियर अधिकारी उन्हें देखकर रास्ता बदल लेते थे, इस डर से कि कहीं सामना हो गया तो सैल्यूट न करना पड़े. इस सीन को अनुमा ने अपने एक्सपीरियंस के आधार पर सही बताया. उन्होंने कहा,

“ये बात सही है कि उन्हें देखकर साइड से निकल जाते हैं, इसलिए निकलते हैं कि कहीं सैल्यूट न करना पड़े. ऐसे में हम खुद उन अधिकारियों को अपने पास बुलाते थे. जब आप उन्हें बुलाएंगे, तो उनके पास आपको सैल्यूट करने के सिवाय कोई ऑप्शन ही नहीं बचेगा. अगर आपको कमांडिंग रिस्पेक्ट नहीं मिल रही है, तो कोई बात नहीं डिमांडिंग रिस्पेक्ट लीजिए. हमने खुद की स्वीकृति करवाने के लिए शुरुआत में डिमांडिंग रिस्पेक्ट भी ली है. और इस पर हमें कोई ऐसा नहीं लगा कि हम इसे एक दिक्कत की तरह प्रोजेक्ट करें.”

क्या कभी पंजा लड़वाया गया?

फिल्म के एक सीन में दिखाया गया है कि गुंजन को एक पुरुष अधिकारी से पंजा लड़वाया जाता है. ये बताने के लिए कि ताकत में वो पुरुष अधिकारियों से कमज़ोर हैं. इस पर अनुमा कहती हैं,

“ऐसा कभी नहीं होता, कभी नहीं होता, कभी होता ही नहीं है. एक महिला अधिकारी और पुरुष अधिकारी एक-दूसरे को टच भी नहीं कर सकते. इस तरह का कुछ होता ही नहीं है. हमारे यहां एक इवेंट होता है, जिसमें एक अधिकारी को बाकी अधिकारी हवा में उछालते हैं. पीछे गाना चलता ‘ही इज़ अ जॉली गुड फेलो’. तो जब महिला अधिकारी होती हैं, तो करते तो मेल ऑफिसर्स ही हैं. लेकिन वो उन्हें उठाते नहीं हैं, कुर्सी पर बैठा देते हैं. तो जब फेयरवेल की हमारी परम्परा में थोड़ा सा चेंज ले आए हैं, कि भई लेडी ऑफिसर को कुर्सी में बैठाकर उछालेंगे, जब वो चीज़ बदली है तो कहां पंजा लड़ाने की बात कर रहे हो.”

क्या ब्रीफ के बीच किसी महिला अधिकारी को हटाया गया?

फिल्म के एक सीन में ये दिखाया गया है कि गुंजन ब्रीफ दे रही होती हैं, तभी उनके सीनियर उन्हें हटा देते हैं और एक पुरुष अधिकारी को ब्रीफ देने का आदेश देते हैं. इस पर अनुमा ने कहा,

“ऐसा कभी होता ही नहीं है. क्योंकि मैंने हर महीने में, क्योंकि मैं फाइटर बेस में थी, तो मिराज 2000 की पहली महिला अधिकारी थी, लॉजिस्टिक ऑफिसर थी. इसके पहले कोई डॉक्टर कभी पोस्ट हुई हों, तो हुई होंगी, लेकिन मैं ऑन-रिकॉर्ड पहली महिला ऑफिसर थी, तो हमें महीने में एक बार फ्लाइंग वाली ब्रीफिंग में जाना होता था, तो वहां पर महिला ATC ऑफिसर, तब तक आ गई थीं, वो ब्रीफ करती थीं, कोई महिला ऑफिसर की ब्रीफिंग को रोका नहीं जाता था. हां अगर किसी को डाउट है, तो सवाल पूछ लेते थे. कोई कितना भी गलत बोल रहा हो, उसे पब्लिक फोरम में कुछ नहीं कहा जाता. अगर कोई दिक्कत भी है तो ऑफिसर उसे अलग से रूम में बुलाकर बताते हैं. पब्लिक ह्यूमिलियेशन एयरफोर्स में बहुत ही कभी होता है.”

एयरफोर्स की इमेज पर क्या असर होगा?

अनुमा कहती हैं कि फिल्म ने एयरफोर्स की खराब छवि सामने रखी. उन्होंने कहा,

“अगर ये नॉर्मल स्टोरी होती, तो इसमें सबकुछ है. इमोशन है, ड्रामा है, एक क्रिएटेड लक्ष्य भी है, और एक सिचुएशन भी है और उस सिचुएशन से पार पाने का तरीका भी है. लेकिन इसमें असली नाम का और असली ऑर्गेनाइजेशन का प्रयोग किया गया है, इसलिए मैं समझती हूं कि इस फिल्म ने शायद किसी को इन्स्पायर किया होता उसके उलट इस फिल्म ने एयरफोर्स को एक ऐसा ऑर्गेनाइजेशन बताया है, जहां महिला अधिकारी बहुत मुश्किल से पनप सकती हैं. जबकि एयरफोर्स तीनों सर्विसेज़ से बेस्ट है. और एयरफोर्स ने ही बहुत सारे रास्ते खोले हैं. बाकी ऊपर जाकर हायरार्कियल पिरामिड की बात हम नहीं करेंगे, लेकिन फिल्म से जो मैसेज आता है, वो बहुत अच्छा नहीं है. एक व्यक्ति को ग्लोरिफाई करने के लिए, बाकी बहुतों का क्रेडिट इस फिल्म में खा लिया गया है. और ये सही नहीं है.”

# स्क्वाड्रन लीडर नेहा (बदला हुआ नाम) (रिटायर्ड)

कौन थीं?

एयरफोर्स में महिला पायलट के पहले बैच में शामिल थीं. ट्रांसपोर्ट पायलट थीं. करीब 10 साल तक एयरफोर्स को अपनी सेवाएं दीं.

एयरफोर्स में शुरुआती एक्सपीरियंस क्या रहा?

नेहा कहती हैं कि एक ऑर्गेनाइज़ेशन के तौर पर एयरफोर्स में कुछ भी निगेटिव नहीं था. वो कहती हैं,

“जब हम लोग पहली बारी गए थे, तो थोड़ी दिक्कत हुई. लोगों को भी एक्सेप्ट करने में मुश्किल होती है. जैसे आप किसी कॉलेज को देखो. वो पहले मेल कॉलेज है और उसे अचानक से को-एड बना दिया जाए, तो शुरुआती दिक्कत तो होती है. तो ऐसी ही दिक्कतें यहां भी थीं. लेकिन एक ऑर्गेनाइज़ेशन के तौर पर एयरफोर्स में कुछ भी निगेटिव नहीं था. बहुत लोग ऐसे थे जो काफी सपोर्ट करते थे. कुछ ऐसे भी थे, जो ये सोचते थे कि ये फोर्स महिलाओं के लिए नहीं है. तो हर तरह के लोग थे. लेकिन वही बात, एक ऑर्गेनाइज़ेशन के तौर पर एयरफोर्स ने हमें एक जैसे मौके दिए.”

नेहा ने भी कहा कि शुरुआत में महिलाओं के लिए अलग से टॉयलेट्स नहीं थे, लेकिन पुरुषों के टॉयलेट्स इस्तेमाल करने के लिए कोई रोक नहीं थी. वो कहती हैं,

“अगर पुरुषों का टॉयलेट है, तो हम नॉक करके चले जाते थे. अंदर जाकर दरवाज़ा भी बंद कर लेते थे. ऐसी कोई दिक्कत नहीं थी. लेकिन हां कुछ लोग मुश्किल थे. उनके दिमाग में यही बात थी कि ये जगह महिलाओं के लिए नहीं है. कुछ ऐसी दिक्कत थीं. कुछ लोग फ्रेंडली थे, तो कुछ लोग फ्रेंडली नहीं थे, अच्छे नहीं थे. यानी अच्छा और बुरा दोनों तरह का एक्सपीरियंस था. लेकिन ऐसा हर जगह पर होता है, केवल एयरफोर्स में नहीं. आप कहीं भी जाते हैं, तो ऐसा होता है. केवल उन जगहों पर नहीं होता, जहां पर पहले से महिलाएं रही हों, और सब लोग इसे लेकर सहज हो गए हों. तो हम लोग जब गए, उसके दस साल बाद मैंने जब एयरफोर्स छोड़ा, तब तक भी बहुत फर्क आ गया था.”

क्या सॉर्टी कैंसिल हुईं?

फिल्म में दिखाया गया है कि गुंजन की कई सारी सॉर्टी कैंसिल कर दी गई थीं, कोई उनके साथ विमान उड़ाने को तैयार नहीं था, क्योंकि वो एक लड़की हैं. इस पर नेहा ने कहा,

“नहीं मेरे साथ ऐसा एक्सपीरियंस बिल्कुल भी नहीं हुआ. क्योंकि भई यूनिट में जब आप ट्रेनिंग लेकर पहुंचते हैं, तो तब आप बाकी दूसरे पायलट्स की तरह हो जाते हो. ऐसा कोई कष्ट नहीं था.”

क्या ब्रीफ कभी कैंसिल हुई?

गुंजन की ब्रीफ कैंसिल होने और पंजा लड़ाने वाले सीन पर नेहा ने कहा,

“फैक्ट ये है कि फौज में हम लोग जब आए तो पायलट्स की ज़रूरत थी, पहलवानों की नहीं. किसमें कितनी फिजिकल स्ट्रेन्थ है, ये कोई मुद्दा नहीं था, क्योंकि हर किसी को उतनी दूरी कवर करनी होती है, उतने वक्त में दौड़ना होता है. ये तो एकेडमी में ही ट्रेनिंग दी जाती है. तो ये कभी मापदंड नहीं रहा कि कोई किसी से पंजा लड़ा सकता है कि नहीं लड़ा सकता. ऐसा नहीं था. क्योंकि मैंने भी एक यूनिट को कमांड किया है, तो ऐसा तो नहीं हुआ. हां ये ज़रूर है कि कई बार आदमियों को आपकी अथॉरिटी स्वीकार करने में उनके चेहरे में हिचक तो दिखती है. लेकिन वो है. क्योंकि जो रैंक्स में कम होते हैं, उनका उतना एक्सपोज़र नहीं होता है. पढ़ाई-लिखाई भी कम होती है, तो मानसिक तौर पर उतने खुलापन नहीं होता है. ऐसे में उनके लिए शुरुआत में एक महिला अधिकारी को स्वीकार करना मुश्किल होता है. लेकिन फौज में ये ज़रूरी नहीं कि यूनिफॉर्म कौन पहन रहा है, एक महिला या एक पुरुष, जब तक आपके पास वो यूनफॉर्म है, वो रैंक है, आपको वो लोग रिस्पेक्ट देंगे.”

फिल्म को लेकर क्या कहा?

नेहा ने हमसे बात करते वक्त तक फिल्म नहीं देखी थी, लेकिन उन्होंने बाकी अधिकारियों से फिल्म के बारे में सुना ज़रूर था. फिल्म में लड़की होने की वजह से गुंजन को किस तरह की दिक्कत आई, इसके बारे में नेहा को जानकारी थी. वो कहती हैं,

“फिल्म में अगर ये दिखाया है, तो फिर गुंजन अकेली तो महिला नहीं थीं, उस समय गुंजन जी के साथ और भी लड़कियां पास आउट हुई थीं. तो फिर सबका लेना चाहिए था. क्या वाकई सबके साथ ऐसा बर्ताव हुआ था? अगर सबके साथ ये बर्ताव नहीं था, सिर्फ गुंजन जी के साथ ऐसा व्यवहार हुआ है, तो इसे पूरे ऑर्गेनाइज़ेशन के तौर पर नहीं लेना चाहिए. ये फिर व्यक्तिगत एप्रोच है. ये आप जानते हो कि फिल्म की दुनिया कैसी है. क्या चलता है, आप क्या दिखाते हो, उस हिसाब से कहानी को ट्विस्ट किया जाता है. ज़रूरी नहीं है कि गुंजन ने यही सब बताया होगा. क्योंकि वो खुद भी एयरफोर्स की एक ज़िम्मेदार महिला अधिकारी हैं. लेकिन कई बार क्या होता है कि आप बताते कुछ हैं और बन कुछ और जाता है, जिसमें आपका कुछ हाथ नहीं होता है. और आरोप किन पर आता है, कि इन्होंने बताया था. हो सकता है कि उन्होंने ये सब न कहा हो.”

नेहा का कहना है कि अगर आज भी उन्हें दोबारा एयरफोर्स में जाने को कहा जाए, तो वो ज़रूर जाएंगी.

‘गुंजन सक्सेना’ फिल्म को लेकर महिला अफसरों की प्रतिक्रिया अलग-अलग हैं. जहां सभी अफसर ये मानती हैं कि टॉयलेट न होना और पुरुषों के बीच खुद को अकेला पाने जैसी दिक्कतें हुईं. वहीं ये भी कहती हैं कि फिल्म इसके चित्रण को लेकर काफ़ी लिबर्टी लेती है. आपको ये फिल्म कैसी लगी, हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं.

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