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क्या है पारंपरिक तलाक, जिसे गुजरात हाईकोर्ट ने महिला अधिकारों के खिलाफ़ बताया?

गुजरात हाई कोर्ट ने अपने आदेश एक आदेश में कोर्ट ने कस्टमरी यानी पारंपरिक तलाक को एक कुप्रथा बताया है. कोर्ट का यह भी कहना है कि पारंपरिक तलाक मर्दवादी मानसिकता का परिणाम है और औरतों के हितों के खिलाफ होता है. यह आदेश जारी करते हुए कोर्ट ने उस शादी को रद्द घोषित से मना कर दिया, जिसके लिए पारंपरिक तलाक के आधार पर याचिका डाली गई थी.

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, यह आदेश गुजरात हाई कोर्ट की जस्टिस जेबी परड़ीवाला और जस्टिस वैभवी डी नानावती की बेंच ने सुनाया. शादी को पारंपरिक तलाक के आधार पर रद्द मानने की याचिका एक महिला की तरफ से डाली गई थी. बेंच ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में असफल रहीं कि उनके समुदाय में इस तरह के तलाक की परंपरा रही है. बेंच ने हालांकि, यह भी कहा कि तलाक लेने के लिए दोनों पक्ष आपसी सहमति के आधार पर हिंदू मैरिज एक्ट के तहत आवेदन कर सकते हैं.

बेंच ने कहा कि पारंपरिक तलाक का फैसला कुछ चुनिंदा लोग लेते हैं, जिन्हें सामाजिक समीकरणों और संवैधानिक दृष्टिकोण का अंदाजा नहीं होता. इस तरह के तलाक एक सक्षम संस्था के सामने अपनी बात रखने और फैसला करने के महिला के मूल अधिकार और व्यक्तिगत आजादी को छीन लेते हैं. संवैधानिक प्रावधानों के मौजूद होने के बाद भी कई कोर्ट इस तरह के तलाकों को मंजूरी दे रहे हैं. इसे बिल्कुल भी स्वीकार नहीं किया जा सकता.

एक्सपर्ट क्या कहते हैं-

Customary Divorce के कानूनी पहलू और यह किस तरह से महिलाओं के हितों के खिलाफ, यह जानने के लिए हमारे साथी नीरज ने बात की देविका गौड़ से. देविका पेशे से वकील हैं. उन्होंने कहा-

हालांकि, पारंपरिक तलाक बहुत कॉमन नहीं है, पर अभी भी कुछ समुदाय हैं जो पारंपरिक तलाक का हवाला देते हुए कोर्ट से वैधता लेने जाते हैं. जब तक कोर्ट इसे वैधता नहीं देता, तब तक यह मान्य नहीं है. कोर्ट की वैधता के लिए आपको यह साबित करना पड़ता है कि आपके समुदाय विशेष में यह परंपरा सालों से चली आ रही है. पारंपरिक कानून को कोर्ट में सिद्ध करने के लिए पहले परंपरा को सिद्ध करना पड़ता है. इसके लिए आपको ये बताना पड़ता है कि इस परंपरा के शुरू होने की तारीख किसी भी प्रकार से पता नहीं की जा सकती है, बस साल दर साल, पीढ़ी दर पीढ़ी ये परंपरा चली आ रही है.

पारंपरिक तलाक कई महिलाओं के लिए बहुत खराब साबित होता है. तलाक न्याय की नज़रों में मान्य तो हो जाता है, लेकिन कई समुदाय यह नहीं बताता कि तलाक के बाद महिला के अधिकार क्या होंगे. उसके जीवन यापन के, एडॉप्शन और कस्टडी के क्या अधिकार होंगे यह पता नहीं चलता.

उन्होंने आगे कहा,

Customary Divorce से आने वाली मुसीबतों से निपटने के लिए 1970 के बाद हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 13 में संशोधन किया गया था. इस संशोधन के तहत आपसी सहमति से किए गए तलाक (म्यूच्यूअल डिवोर्स) की अवधारणा को शुरू किया गया, जिसमें पति और पत्नी दोनों आपसी सहमति से कोर्ट में तलाक की याचिका डाल सकते हैं. इसके बाद कोर्ट उन्हें 6 महीने का कूलिंग पीरियड देता है. कूलिंग पीरियड के बाद कोर्ट आपको एक तारीख मुक़र्रर करता है. दी हुई तारीख को पति और पत्नी को बुलाया जाता है. उनसे पूछा जाता है कि क्या यह तलाक आपकी मर्जी और विवेक से हो रहा है; कहीं यह तलाक किसी तरह के दबाव में आकर तो नहीं किया जा रहा! इसके बाद, जब कोर्ट इस बात को लेकर संतुष्ट हो जाता है कि यह तलाक दोनों पार्टियों की साझी सहमति से हो रहा है, तब तलाक ग्रांट किया जाता है.

जिस महिला ने इस मामले में याचिका डाली है, उसकी शादी साल 2010 में हुई थी. महिला और उसका पति दोनों पटेल समुदाय के हैं. शादी के कुछ समय के बाद दोनों के बीच अनबन रहने लगी. तमाम प्रयासों के बाद भी बात नहीं बनी, तो दोनों के परिवारों ने तलाक का फैसला लिया. जिसके बाद पारंपरिक तलाक के तहत दोनों अलग हो गए.

बाद में महिला ने विदेश में सेटल होने का फैसला किया. अपने अविवाहित होने के स्टेटस को प्रशासन के सामने रखने के उद्देश्य से उसने फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की. जिसमें कहा गया कि पारंपरिक तलाक के तहत वो अपने पूर्व पति से अलग हो चुकी है. फैमिली कोर्ट ने इस याचिका को रद्द कर दिया और कहा कि महिला और पुरुष जिस तरह के समुदाय से आते हैं, उसमें पारंपरिक तलाक की कोई प्रथा नहीं है. जिसके बाद याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट का रुख किया. जहां हाई कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई कि जिला स्तर की अदालतें पारंपरिक तलाक को मंजूरी दे रही हैं.

कोर्ट ने यह भी माना कि हिंदू मैरिज एक्ट इस तरह के पारंपरिक तलाक को मंजूरी देता है. लेकिन अब 64 साल बाद इस तरह के तलाक को मंजूरी नहीं दी जा सकती क्योंकि इस तरह के तलाक किसी समुदाय के कुछ लोगों या फिर पति और पत्नी के चुनिंदा रिश्तेदारों द्वारा लिए जाते हैं. कोर्ट की तरफ से कहा गया कि अगर इस तरह की कुप्रथा को बढ़ावा दिया जाता रहा, तो एक समाज के तौर पर हम पीछे लौटने लगेंगे.


एक्टिविस्ट कृति भारती, जो 1400 बाल विवाह रद्द करा चुकी हैं –

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