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दिल्ली में पुरुषों जितनी महिलाएं क्यों नहीं लगवा रही हैं कोरोना वैक्सीन?

कोरोना वायरस की दूसरी लहर के बीच एक तरफ जहां पर्याप्त मात्रा में वैक्सीन ना उपलब्ध होने की खबरें आ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ वैक्सीनेशन (Vaccination) ड्राइव में जेंडर गैप की बात भी सामने आई है. जेंडर गैप से यहां मतलब है कि पुरुषों की तुलना में कम महिलाओं का टीकाकरण हुआ है. कोविन पोर्टल के सरकारी आंकड़ो के मुताबिक राष्ट्रीय स्तर पर यह गैप लगभग चार फीसद का है.

इन आंकड़ों की अगर गहराई में जाएं तो पता चलता है कि दिल्ली और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में, जहां कोरोना वायरस के बहुत अधिक मामले सामने आए हैं, वहां वैक्सीनेशन जेंडर गैप राष्ट्रीय औसत से बहुत अधिक लगभग दस फीसदी पर है. सिर्फ चार राज्यों केरल, कर्नाटक, छत्तीसगढ़ और हिमाचल प्रदेश में ही पुरुषों के मुकाबले अधिक महिलाओं का कोविड टीकाकरण किया गया है. इन चार राज्यों में से केरल और कर्नाटक में कोविड केस लोड बहुत अधिक है.

नगालैंड और जम्मू-कश्मीर में वैक्सीनेशन जेंडर गैप का औसत लगभग 14 फीसदी है. नगालैंड के साथ-साथ मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश जैसे पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में यह गैप 10 से 13 फीसदी तक है. पंजाब में भी लगभग 10 फीसदी का गैप है. चंडीगढ़ में लगभग 11 फीसदी का.

डेटा के मुताबिक अभी तक देश में कुल 17.78 करोड़ लोगों को कोविड का टीका लग चुका है. इनमें से 7.3 करोड़ लाभार्थी पुरुष और 6.3 करोड़ महिलाएं हैं.

वजह क्या है?

इस डेटा को देखने के बाद हमने यह जानना चाहा कि आखिर क्या कारण है कि पुरुषों के मुकाबले कम महिलाओं को वैक्सीन लग रही है. इसके लिए हमने दिल्ली, गुरुग्राम और प्रयागराज में वैक्सिनेशन ड्राइव से जुड़े अलग-अलग लोगों को फोन किया. लेकिन हमें कोई ठोस जवाब नहीं मिला. डेटा होने के बाद भी अधिकतर लोगों ने इस बात से इनकार कर दिया कि वैक्सीन लगने में एक भारी जेंडर गैप है.

अब क्योंकि आंकड़े हमारे सामने हैं. वो भी सरकारी आंकड़े. ऐसे में वैक्सीनेशन जेंडर गैप के तीन मुख्य कारण हमारी समझ में आए. पहला, भारत का जो समाज है, उसमें महिलाएं पब्लिक प्लेस में नहीं होतीं. दूसरा, उनके पास सूचनाओं की उतनी एक्सेस नहीं है, वो खुद भी अवेयर नहीं हैं. ऐसे में ये दोनों कारण मिलकर उन्हें खुद के दम पर बाहर जाकर अपना वैक्सिनेशन कराने से रोकते हैं. इन सब कामों के लिए महिलाएं अपने घर के किसी सीनियर या दूसरे किसी पुरुष सदस्य की हेल्प लेने के लिए मजबूर होती हैं. जो उन्हें बाहर ले जा सके. उनके लिए लिखा-पढ़ी कर सके.

Vaccination के लिए अपनी बारी का इंतजार करते लोग. (फोटो: PTI)
Vaccination के लिए अपनी बारी का इंतजार करते लोग. (फोटो: PTI)

तीसरा और एक बहुत महत्वपूर्ण कारण प्रेगनेंट और स्तनपान करा रही महिलाओं को वैक्सिनेशन की अनुमति ना मिलना है. इस संबंध में दिल्ली बाल अधिकार सुरक्षा आयोग के प्रमुख अनुराग कुंडू ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को पत्र भी लिखा है. उन्होंने कहा कि गर्भवती और स्तनपान करा रहीं महिलाओं को वैक्सीनेशन ड्राइव में शामिल किया जाना चाहिए. अपने पत्र में उन्होंने आगे लिखा-

“साल भर में लगभग 2.6 करोड़ महिलाएं बच्चों को जन्म देती हैं. इतनी ही महिलाएं स्तनपान कराती हैं. मतलब कुल मिलाकर 5.2 करोड़ महिलाओं को वैक्सिनेशन ड्राइव से बाहर कर दिया गया है. जबकि इन महिलाओं को कोविड टीकाकरण मिशन की प्राथमिकता वाली लिस्ट में होना चाहिए. उनके ऊपर ज्यादा खतरा है. दुनिया भर में कोविड के कारण ऐसी महिलाओं की मृत्यु हो रही है. जो बहुत चिंताजनक है.”

कुंडू ने सरकार को प्रेगनेंट और स्तनपान करा रहीं महिलाओं को हाई रिस्क ग्रुप में  रखने की सलाह दी है. यह भी सलाह दी है कि एक टास्क फोर्स बनाई जाए, जो ऐसी महिलाओं को ऑब्जर्व करे और फिर उसके अनुसार गाइडलाइन विकसित करे.

कुंडू के पत्र पर सरकार की तरफ से अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. प्रेगनेंट और स्तनपान करा रही महिलाओं के वैक्सिनेशन के लिए सरकार ने अभी तक कुछ साफ नहीं किया है. विदेशों में ऐसी महिलाओं को वैक्सिनेशन की अनुमति मिल चुकी है. लेकिन हमारी सरकार औरतों के प्रति उदासीन रवैया अपनाकर बैठी हुई है. जैसे उसे कोई मतलब ही नहीं है.

आखिर में कुछ और आंकड़ों की अगर बात करें तो अभी तक देश में 18 से 44 साल के बीच के 39,14,688 लोगों को कोविड वैक्सीन लग चुकी है. इनके अलावा 45 से 60 साल के बीच के पांच करोड़ पैंसठ लाख लोगों को वैक्सीन का पहला और लगभग 85 लाख लोगों को दूसरा डोज लग चुका है. 60 साल के ऊपर के लोगों की अगर बात करें तो लगभह पांच करोड़ 42 लाख लोगों को पहला और एक करोड़ 72 लाख लोगों को दूसरा डोज लग चुका है.


 

वीडियो- सेहत: वैक्सीन लगवाने के बाद ये गलती न करें वरना हो जाएगा कोरोना

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