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अश्लील क्या है, कक्षा 1 की किताब में छपी 'आम की टोकरी' कविता या लोगों का दिमाग?

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद यानी NCERT की एक कविता को लेकर खासा विवाद छिड़ा हुआ है. जिस कविता को लेकर विवाद है, वो कक्षा एक की ‘रिमझिम’ नाम की किताब में पढ़ाई जाती है. तीसरे चैप्टर में छपी इस कविता का शीर्षक ‘आम की टोकरी’ है. एक पक्ष को यह कविता इसमें प्रयोग हुए शब्दों जैसे ‘छोकरी’, ‘चूसना’, ‘दाम’ इत्यादि के कारण द्विअर्थी और बाल मजदूरी को बढ़ावा देने वाली नजर आ रही है, वहीं दूसरे पक्ष को इसमें कुछ भी गलत नजर नहीं आ रहा.

पहले कविता पढ़िए-

छह साल की छोकरी,
भरकर लाई टोकरी.

टोकरी में आम हैं,
नहीं बताती दाम है.

दिखा-दिखाकर टोकरी,
हमें बुलाती छोकरी।

हमको देती आम है,
नहीं बुलाती नाम है.

नाम नहीं अब पूछना,
हमें है आम चूसना.

इस कविता के नीचे कुछ और बातें भी लिखी हैं. मसलन, लिखा गया है कि बच्चों से बात करें और पूछें कि वो ऐसे किसी बच्चे को जानते हैं, जो स्कूल जाने की जगह बाल मजदूरी कर रहा हो. अगर हां, तो उन्हें बताएं कि वो कैसे इन बच्चों की मदद कर उन्हें स्कूल में दाखिला लेने के लिए प्रेरित कर सकते हैं.

NCERT की किताब में छपी जिस कविता को लेकर विवाद हो रहा है, उसके नीचे एक टिप्पणी भी लिखी है. जिसमें बाल मजदूरी के लिए मजबूर बच्चों को स्कूल भेजने के रास्ते तलाशने की बात कही गई है. (फोटो: सोशल मीडिया)
NCERT की किताब में छपी जिस कविता को लेकर विवाद हो रहा है, उसके नीचे एक टिप्पणी भी लिखी है. जिसमें बाल मजदूरी के लिए मजबूर बच्चों को स्कूल भेजने के रास्ते तलाशने की बात कही गई है. (फोटो: सोशल मीडिया)

साथ ही यह भी कहा गया है कि जिस प्रकार से इस कविता में बच्ची लोगों के बीच आम बेचने का अभिनय कर रही है, उसी तरह बच्चों से अलग-अलग चीजें खाने का अभिनय कराया जाए.

क्या-क्या आरोप लगे?

छत्तीसगढ़ कैडर के 2009 बैच के IAS ऑफिसर अवनीश शरण ने इस कविता पर कड़ी आपत्ति जताई. उन्होंने लिखा- “यह किस सड़कछाप कवि की रचना है? कृपया इसे पाठ्यपुस्तक से बाहर करें.”

इस कविता पर जाने माने अभिनेता आशुतोष राणा ने भी सवाल उठाए. अपनी फेसबुक पोस्ट में उन्होंने लिखा- “एक तरफ हम हिंदी भाषा के गिरते स्तर और हो रही उपेक्षा पर हाय तौबा मचाते हैं और दूसरी ओर इतने निम्न स्तर की रचना को पाठ्यक्रम का हिस्सा बना देते हैं? ऐसी रचना को निश्चित ही पाठ्क्रम में नहीं रखा जाना चाहिए क्योंकि मनुष्य की भाषा उसकी पहचान होती है. “ राणा ने यह भी लिखा कि हमें यह याद रखना चाहिए कि बच्चे राष्ट्र की आत्मा होते हैं. यही हैं जिनके मस्तिष्क में अतीत सोया हुआ है. यही हैं, जिनके पहलुओं में वर्तमना करवटें ले रहा है और यही हैं जिनके कदमों के नीचे भविष्य के अदृश्य बीज बोए जाते हैं. सजल नाम के यूजर ने लिखा कि इस तरह की पाठ्य सामग्री बहुत से राज्य स्कूल बोर्ड की किताबों में मिल जाएगी. हमें यह करने की जरूरत है कि इस तरह की सामग्री को खोजें और उसे हटवा दें.

बिनय नाम के यूजर ने लिखा कि यह कविता बाल मजदूरी को बढ़ावा देती है-

इस कविता को लेकर लोगों ने NCERT से लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री तक को टैग किया. मांग की कि ना केवल यह कविता हटाई जाए, बल्कि उसे भी हटाया जाए, जिसने इसे पाठ्यक्रम में शामिल किया. लोगों ने कहा कि यह कविता द्विअर्थी और बच्चों को बिगाड़ने वाली है. मसलन, आज वे छोकरी शब्द सीखेंगे, फिर बड़े होकर युवा लड़कियों को छोकरी कहकर छेड़ेंगे.

दूसरा पक्ष क्या कहता है?

इस कविता पर हुए विवाद का एक दूसरा पक्ष भी है. जो इसे एकदम सहज और बच्चों के लिए उपयुक्त कविता मानता है. इस पक्ष के जानने के लिए हमने आलोक मिश्र से बात की. आलोक मिश्र दिल्ली के सरकारी स्कूल में पढ़ाते हैं. कवि हैं. बच्चों के लिए भी कविताएं लिखते हैं. हाल ही में उनका एक कविता संग्रह भी आया है. ‘मैं सीखता हूं बच्चों से जीवन की भाषा’ नाम से. आलोक ने हमें बताया कि इस कविता को लेकर जो आलोचना की जा रही है, वो बेवजह की है. उन्होंने बताया-

“हिंदी के लोगों पर शुद्धतावाद का नशा चढ़ा हुआ है. इसके चक्कर में इन्हें लगता है कि खड़ी बोली ही सबकुछ है और बाकी बोलियों के शब्द कमतर हैं. अब इस कविता को देखा जाए, तो बहुत ही आसान सी नजर आती है. ‘छोकरी’ और ‘चूसना’ शब्द पर आपत्ति जताई जा रही है. हो सकता है कि छोकरी शब्द का प्रयोग कहीं अपमानजनक तरीके से किया जाता हो. लेकिन गांव-देहात में ऐसा नहीं होता है. छोकरी शब्द के मूल अर्थ में अपमान नहीं है. अगर कुछ लोग इसका प्रयोग अपमानजनक शब्द के तौर पर करने लगें, तो क्या हमें यह शब्द छोड़ देना चाहिए? मुझे तो ऐसा नहीं लगता.”

इसी तरह ‘चूसना’ शब्द के बारे में भी आलोक ने कहा कि यह भी सामान्य और शहज शब्द है. आम तो चूसा ही जाएगा. गन्ना भी चूसा जाता है. आम और गन्ने खाए नहीं जाते. जिन लोगों को इस कविता में ‘चूसना’ शब्द अश्लीलता का पर्याय लग रहा है, दरअसल वह उनका नजरिया है, जो कविता पर थोप दिया गया है. अपना नजरिया कविता पर थोपकर कहा जा रहा है कि कविता अश्लील है. कविता में बाल मजदूरी को बढ़ावा देने के आरोपों पर आलोक मिश्र कहते हैं-

“कविता का एक कथ्य है. वो कथ्य बालमन का है. अगर इसमें बाल मजदूरी देखी जा रही है, तो दिक्कत हमारी बाजारवादी सोच की है. हम यह मानकर चल रहे हैं कि कोई किसी को कोई चीज देगा, तो पैसे तो लेगा ही लेगा. ग्रामीण इलाकों के बच्चे हाथ बंटाते हैं. उनसे कोई बहुत मजदूरी का काम नहीं कराया जाता है. कभी अपने खेत से सब्जियां ले आए. कभी बाग से फल बीन लाए. इस दौरान उनका स्कूल भी चालू रहता है. इसको आप बाल श्रम नहीं कह सकते.”

आलोक मिश्र ने कहा कि उनके संपर्क में जितने भी बाल साहित्यकार हैं, उन्हें यह कविता काफी सहज लग रही है. कविता की अगर कोई ऐसी आलोचना हो जो शिक्षणशास्त्र या बाल मनोविज्ञान के दृष्टिकोण से की गई हो, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए. लेकिन यहां आलोचना महज एक शुद्धतावाती नजरिए से की जा रही है. जिसमें खड़ी हिंदी को ही मानक मान लिया गया है और उससे इतर दूसरी बोलियों के शब्द और सहजता कमतर है.

NCERT ने क्या कहा?

यह कविता रामकृष्ण खादर नाम के कवि की लिखी हुई है और साल 2006 में NCERT की किताब का हिस्सा बनी थी. हमें पहले लगा कि शायद जिस कविता पर विवाद हो रहा है, उसे पहले ही हटाया जा चुका है. ऐसे में हमने NCERT की किताब का सबसे नवीनतम संस्करण देखा. कक्षा एक की रिमझिम किताब के सबसे नए संस्करण में भी यह कविता जस की तस छपी हुई है. ऐसे में इस पूरे विवाद के बारे में हमने NCERT के एक वरिष्ठ अधिकारी से बात की. उन्होंने नाम ना बताने की शर्त पर हमें बताया कि यह पहली बार नहीं है कि इस कविता को लेकर विवाद खड़ा हुआ. कुछ साल पहले भी ऐसा हो चुका है. तब NCERT की तरफ से इस कविता का रिव्यू किया गया था. किसी भी प्रकार दिक्कत इस कविता में नजर नहीं आई थी.  और बच्चों के लिए यह बहुत ही सहज और सरल कविता है.

इस पूरे मुद्दे पर NCERT ने ट्वीट कर भी अपनी प्रतिक्रिया दी है. ट्वीट में कहा गया है- “पाठ्यपुस्तक में जो भी कविताएं हैं, वे NCF-2005 के परिप्रेक्ष्य में स्थानीय भाषाओं की शब्दावली को बच्चों तक पहुंचाने के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए शामिल की गई हैं, ताकि सीखना रुचिपूर्ण हो सके.”

संस्थान ने अपने ट्वीट में आगे कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के परिप्रेक्ष्य में  नई राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा के निर्माण की प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है. इसी पाठ्यचर्या की रूपरेखा के आधार पर भविष्य में पाठ्यपुस्तकों का निर्माण किया जाएगा.


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