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पैगंबर मोहम्मद का अपमान करने वाली इस लड़की को क्यों बचा रही है फ्रांस की सरकार?

तारीख 18 जनवरी, 2020. फ्रांस की राजधानी पेरिस. खुद को लेस्बियन बताने वाली एक 16 साल की लड़की इंस्टाग्राम लाइव करती है. इस लड़की का नाम मिला है. उस समय मिला के इंस्टाग्राम पर दस हजार से भी अधिक फॉलोवर थे. अपने लाइव में मिला इस्लाम के खिलाफ भड़काऊ बातें कहती है. वो कहती है,

“कुरान एक घृणा सिखाने वाले धर्म की किताब है. इसमें सिर्फ और सिर्फ घृणा भरी हुई है. इस्लाम एक घटिया धर्म है. तुम्हारा धर्म घटिया है.”

देखते ही देखते यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो जाता है. मिला को ऑनलाइन धमकियां मिलती हैं. घृणा भरे कमेंट मिलते हैं. अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, मिला को ऐसे लगभग एक लाख मेसेज मिलते हैं. जल्द ही यह पूरा मामला फ्रांस की मीडिया, न्यायपालिका और सरकार की नजर में आ जाता है.

सरकार ने किया मिला का समर्थन

मिला का मामला सामने आते ही एक बार फिर से फ्रांस में अभिव्यक्ति की आजादी के आधिकार पर बहस होने लगी. फ्रांस में ईशनिंदा, धर्मों की आलोचना और उनके ऊपर व्यंग करने को कानूनी तौर पर मंजूरी मिली हुई है. फ्रांस की सरकार और सिविल सोसाइटी के लोग इसे फ्रांस की संस्कृति का अभिन्न हिंसा मानते हैं, देश की धर्मनिरपेक्षता जिसे फ्रांस में लसाइट कहा जाता है, से जोड़कर देखते हैं. ऐसे में फ्रांस के कई नेताओं ने मिला का समर्थन किया. ठीक उसी तरह से, जिस तरह से पहले कई बार पैगंबर मोहम्मद का कार्टून छापने वाली पत्रिका शार्ली एब्दो का किया था.

हालांकि, शार्ली एब्दो ने इस तरह के व्यंगात्मक कार्टून लगभग हर धर्म के संबंध में छापे हैं. लेकिन पैगंबर मोहम्मद का कार्टून छापने पर उनके ऑफिस पर आतंकी हमला हुआ था. जिसमें कई लोगों की मृत्यु हो गई थी. पिछले साल जब उस आतंकी हमले के आरोपियों को सजा मिली, तो इस मौके पर शार्ली एब्दो ने फिर से पैगंबर मोहम्मद पर एक और कार्टून छापा.

इस कार्टून को लेकर एक तरफ मुस्लिम जगत में फ्रांस के बहिष्कार की बात कही गई, तो दूसरी तरफ फ्रांस में भी अभिव्यक्ति की आजादी पर बहस शुरू हो गई. इसी बहस के हिस्से तौर पर पिछले साल पेरिस के एक स्कूल में एक शिक्षक ने क्लासरूम में पैगंबर मोहम्मद के कार्टून दिखाए थे. जिसके बाद एक मुस्लिम छात्र ने बर्बरता से उनकी हत्या कर दी.

फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रां ने मिला का समर्थन किया. उन्होंने कहा कि फ्रांस का कानून धर्मों के ऊपर व्यंगात्मक टिप्पणियों की इजाजत देता है. इससे पहले उन्होंने शार्ली हेब्दो के कार्टून बनाने के अधिकार का भी समर्थन किया था. (तस्वीर: एपी)
फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने मिला का समर्थन किया. उन्होंने कहा कि फ्रांस का कानून धर्मों के ऊपर व्यंगात्मक टिप्पणियों की इजाजत देता है. इससे पहले उन्होंने शार्ली एब्दो के कार्टून बनाने के अधिकार का भी समर्थन किया था. (तस्वीर: एपी)

इस बीच मिला को मिलने वाली धमकियां बढ़ती गईं. उन्हें बलात्कार और हत्या की भी धमकियां दी गईं. अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, मिला को अपना स्कूल छोड़ना पड़ा क्योंकि उनके स्कूल का एड्रेस वायरल हो गया था. मिला ने भी धमकी देने वालों के खिलाफ केस कर दिया. वकील चुना रिचर्ड मल्का को. रिचर्ड मल्का 1990 से ही शार्ली एब्दो की पैरवी करते आए हैं.

इधर फ्रांस की धुर दक्षिणपंथी नेता मरीन ला पेन भी मिला के समर्थन में उतर आईं. उन्होंने कहा,

“इस युवा लड़की की बातें और कुछ नहीं बल्कि शार्ली एब्दो के कार्टून को मौखिक तौर पर प्रदर्शित कर रही हैं. हो सकता है हमें यह आपत्तिजनक लगे. लेकिन हम यह स्वीकार नहीं कर सकते कि इन बातों के लिए उस लड़की को मारने की धमकी दी जाए. वो भी 21वीं सदी के फ्रांस में.”

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भी मिला का बचाव किया. उन्होंने अखबार ला डौफाइन लिबर्टी से कहा,

“हमारा कानून हमें ईशनिंदा करने का अधिकार देता है. धर्मों की आलोचना और उनके ऊपर व्यंगात्मक कार्टून बनाने का भी अधिकार देता है. यह जो बहस चल रही है, उसमें शायद हम भूल गए हैं कि मिला एक टीनेजर है. हमारे ऊपर उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी है. फिर वो चाहे स्कूल में हो या कहीं और किसी सार्वजनिक स्थान पर.”

मैंने वही कहा, जो सही लगा

इस सब विवाद के बीच मिला लगातार अपनी बातों पर टिकी रहीं. उन्होंने लगातार टीवी इंटरव्यू दिए. मिला ने बार-बार दोहराया कि उन्होंने वही कहा, जो उन्हें सही लगा. इस बीच फ्रांस की अदालत ने मिला को ऑनलाइन धमकी देने के आरोप में 13 लोगों को सजा सुनाई. इसके लिए कोर्ट ने साल 2018 में बने एक कानून का हवाला दिया, जो फ्रांस में इस तरह की ऑनलाइन बुलिंग को रोकने के उद्देश्य से बनाया गया था. जिन लोगों को सजा सुनाई गई, वो 18 से 29 साल के हैं. इनमें से एक आरोपी की पैरवी करने वाले वकील का मानना है कि इस पूरे मामले को एक प्रतीक के तौर पर पेश किया गया और फ्रांस में रहने वाले मुसलमानों को एक संदेश दिया गया.

इस वकील का नाम जुआन ब्रैंको है. ब्रैंको ने फ्रांस में येल्लो वेस्ट प्रोटेस्ट के दौरान कई प्रदर्शनकारियों की पैरवी की. उन्होंने अलजजीरा को बताया,

“मिला को लगातार न्यूज चैनल्स पर बुलाया गया. उन्हें विक्टिम के तौर पर पेश किया गया. जबकि उनकी इस्लाम विरोधी बातों से आहत होने वालों को कोई जगह नहीं दी गई. सिस्टम ने 13 लोगों को बलि का बकरा बनाया है.”

दूसरी तरफ फ्रांस की धर्मनिरपेक्ष संस्कृति और अभिव्यक्ति की आजादी का समर्थन करने वालों ने इस फैसले पर खुशी जताई है. उनका कहना है कि इससे फ्रांस में साइबर बुलिंग करने वालों को कड़ा संदेश जाएगा. एसोसिएशन ई-इनफांस की रिपोर्ट के मुताबिक, फ्रांस में 10 में से एक किशोर ने खुद के साइबर बुलिंग का शिकार होने का दावा किया है. इनमें से लगभग 60 फीसदी हिस्सा 10 से 19 साल की लड़कियों का है.

पैगंबर का अपमान करना लाइमलाइट पाने का तरीका?

अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल नवंबर में ही मिला ने एक और वीडियो बनाया था. इस बार यह वीडियो टिकटॉक पर बनाया गया. इस वीडियो में भी उन्होंने पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ आपत्तिजनक बातें कहीं. उन्हें फिर से पहले की ही तरह धमकियां मिलीं. इस बीच कोर्ट में मुकदमा चलता रहा.

फिर आई तारीख 23 जून, 2021. मिला ने एक किताब रिलीज की. इसका खूब प्रचार भी हुआ. किताब का नाम है- ‘आई एम द प्राइस ऑफ योर लिबर्टी’. इसके बाद 8 जुलाई को मिला पेरिस की एक मशहूर मस्जिद चेम्स एडीन हफीज के सामने गईं. उनके हाथ में कुरान थी. वहां उन्होंने फोटो खिंचाई और अपनी किताब का प्रचार किया.

इस साल जुलाई में मिला पेरिस की एक मशहूर मस्जिद के सामने गईं. उन्होंने वहां फोटो खिंचाई और अपनी किताब का प्रचार किया. (फोटो: ट्विटर एएफपी)
इस साल जुलाई में मिला पेरिस की एक मशहूर मस्जिद के सामने गईं. उन्होंने वहां फोटो खिंचाई और अपनी किताब का प्रचार किया. (फोटो: ट्विटर एएफपी)

मिला के इस पूरे कार्यक्रम को लाइमलाइट पाने और अपनी किताब बेचने की कवायद की तरह देखा गया. इमेन नेफाटी नाम के एक मुस्लिम स्कॉलर ने अल जजीरा को बताया,

“इस्लाम की आलोचना, खासकर फ्रांस में, ज्यादातर समय नस्लवादी तरीके से की जाती है. इसके तहत मुसलमानों के खिलाफ घटिया बयान दिए जाते हैं. धर्म को बुरा-भला कहा जाता है.”

दरअसल, 1789 में फ्रांस में क्रांति हुई थी. इस क्रांति से तीन महत्वपूर्ण सिद्धांत निकले. समानता, आजादी और सौहार्द. इतिहासकार इन सिद्धांतों को आधुनिक लोकतांत्रिक समाजों की आधारशिला मानते हैं. इनमें से एक दार्शनिक वॉल्तेयर ने अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर एक बेहद जरूरी बात कही थी. उन्होंने कहा था,

“मैं भले ही तुम्हारी बात से सहमति न रखूं, लेकिन अपनी बात रखने के तुम्हारे अधिकार का मैं अंतिम सांस तक समर्थन करूंगा.”

दूसरी तरफ, फ्रांस यूरोप का ऐसा देश है, जहां इस महाद्वीप की सबसे बड़ी मुस्लिम जनसंख्या रहती है. फ्रांसीसी संसद के निलचे सदन ने हाल में ही ‘एंटी- सेपेरेटिज्म’ बिल को पास किया है. कथित तौर पर इस बिल का उद्देश्य फ्रांस की मुस्लिम जनसंख्या को देश की संस्कृति के अनुरूप बनाना है. जब इस बिल को लेकर निचले सदन में बहस चल रही थी, तो कई वामपंथी और दक्षिणपंथी नेताओं ने विरोध किया.

फ्रांसीसी संसद की निचले सदन में एंटी सेपरेटिज्म बिल पास हो चुका है. कथित तौर यह बिल मुस्लिम जनसंख्या को फ्रांस की संस्कृति के अनुरूप ढालने के लिए लाया गया है. विरोध करने वाले सांसदों ने कहा था कि यह बिल मूल तौर पर Islamophobia को बढ़ावा देने वाला है. (प्रतीकात्मक फोटो: एपी)
फ्रांसीसी संसद की निचले सदन में एंटी सेपरेटिज्म बिल पास हो चुका है. कथित तौर यह बिल मुस्लिम जनसंख्या को फ्रांस की संस्कृति के अनुरूप ढालने के लिए लाया गया है. विरोध करने वाले सांसदों ने कहा था कि यह बिल मूल तौर पर Islamophobia को बढ़ावा देने वाला है. (प्रतीकात्मक फोटो: एपी)

न्यूज वेबसाइट फ्रांस 24 की रिपोर्ट के मुताबिक, इन नेताओं का कहना था कि इस बिल का समर्थन करने वाले धर्मनिरपेक्षता की बात तो कर रहे हैं, लेकिन समानता, आजादी और सौहार्द को नजरंदाज कर रहे हैं. उनका कहना था कि पिछले कुछ समय में फ्रांस में ऐसा इस्लामोफोबिक माहौल बना दिया गया है, जिसके कारण लगभग हर दिन मुस्लिम स्कॉलरों को टीवी डिबेट्स में यह साबित करने के लिए मजबूर किया जा रहा है कि इस्लाम हिंसा का समर्थन नहीं करता और यह धर्म फ्रांसीसी समाज के मूल्यों के अनुरूप है.

अंत में तो यही कहा जाना चाहिए कि आलोचना करना एक लोकतांत्रिक अधिकार है. लेकिन आलोचना और भड़काऊ बयानबाजी में अंतर है. एक तार्किक व्यक्ति को यह अंतर पता होता है. दूसरी तरफ, अगर किसी ने भड़काऊ बयानबाजी भी की है, तो उसे जान से मारने से लेकर बलात्कार की धमकी देना भी उतना ही गलत होगा, जितनी भड़काऊ बयानबाजी.

ये फ्रांस की बात थी. भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी है. लेकिन धर्म विशेष के खिलाफ भड़काऊ बातें कहना गैर कानूनी है. आपकी अभिव्यक्ति की आज़ादी का दायरा ये है कि उससे किसी व्यक्ति या समुदाय कि भावनाएं आहत न हों.


 

वीडियो- मुस्लिम देशों ने फ्रांस के खिलाफ क्यों छेड़ दी मुहिम जिसमें अकेला पड़ गया है फ्रांस?

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