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क्या है फाउलर्स सिंड्रोम जिसमें चाहकर भी लड़कियां टॉयलेट नहीं जा पाती हैं?

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23 साल की एक लड़की. एक ऐसी कंडीशन से जूझ रही है, जिसके बारे में हम और आप सोचें भी तो कांप जाएं. यकीन नहीं होता? सोचिए आप बस में सफर कर रही हैं. सात-आठ घंटे की जर्नी है. उसके बीच आपको टॉयलेट जाना हो. लेकिन आप उतर न पाएं. बस कहीं रुके नहीं. पांच घंटों से भी ज्यादा समय तक आपको पेशाब रोकनी पड़ जाए.

क्या हालत होगी आपकी? पेट फटने को हो जाएगा. सांस लेना भी मुश्किल. थोड़ा-सा भी झटका लगेगा तो दर्द से हाल-बेहाल हो जाएगा.

अब सोचिए एक ऐसी लड़की के बारे में जिसने 18 साल तक अपनी ज़िन्दगी इसी तरह गुजारी. इसलिए नहीं कि उसे जबरन अपना पेशाब रोकना पड़ता था. बल्कि इसलिए कि उसका अपना शरीर ही उसे ऐसी तकलीफ दे रहा था.

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पॉलीयाना जब चार या पांच साल की थीं, तब भी उन्हें यूरिन पास करने में दिक्कत होती थी, लेकिन 16 साल की उम्र के बाद थोड़ा बहुत यूरिन पास होना भी बंद होता गया. (तस्वीर साभार: PA Real Life)

डर्बीशायर की पॉलीयाना फाउलर्स सिंड्रोम से जूझ रही हैं. इस वजह से उनका यूरिनरी ब्लैडर (शरीर का वो अंग जिसमें पेशाब जमा होता है) पेशाब रिलीज नहीं होने देता. बचपन से ही इस कंडीशन की वजह से पॉलीयाना कभी भी बेफिक्र होकर रिलैक्स नहीं कर सकीं. आखिरकार 18 की उम्र में उन्हें ऑपरेशन करके अपना ब्लैडर हटवाना पड़ा.

क्या होता है फाउलर्स सिंड्रोम?

ये एक मेडिकल कंडीशन है. इसमें जिसमें यूरिन (पेशाब) पास करने में दिक्कत होती है. बहुत कॉमन नहीं है ये. लेकिन जिनको होता है, उनकी लाइफ बेहद मुश्किल हो जाती है. इस कंडीशन में क्या होता है, कैसे होता है. पहले ये समझ लीजिए.

किडनियां जब उस तक पहुंचने वाले लिक्विड को फ़िल्टर करने के बाद पेशाब बनाती हैं, तो उसे यूरिनरी ब्लैडर में भेज देती हैं. दो ट्यूब्स के ज़रिए, जिनको यूरेटर कहते हैं. इनकी लम्बाई पांच से आठ इंच होती है. ब्लैडर में ये पेशाब इकठ्ठा होता रहता है. जब ये भर जाता है तो दिमाग सिग्नल भेजता है कि अब यूरिन पास करने का समय आ गया है. एक आम ब्लैडर आधा लीटर यूरिन भरकर रख सकता है.

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किडनियों से जुड़े यूरेटर हर 10 से 15 सेकण्ड में पम्प करके पेशाब निकालते हैं और ब्लैडर में ले जाते हैं. (तस्वीर साभार: nih)

जब ब्लैडर भर जाता है तो यूरिन पास करने के लिए यूरेथ्रा का रास्ता खुल जाता है. यूरेथ्रा यानी वो रास्ता जिससे पेशाब बाहर निकलती है. ब्लैडर और इसके बीच एक मसल मौजूद होती है. उसे स्फिन्क्टर मसल कहते हैं. ये ब्लैडर से पेशाब को निकलने से रोके रखती है. जब हम वॉशरूम जाते हैं और यूरिन पास करने  के लिए तैयार होते हैं तब स्फिन्क्टर मसल को सिग्नल मिलता है, वह रिलैक्स होती है और यूरिन पास होती है. यूरेथ्रा पुरुषों में उनके लिंग से होकर जाता है. महिलाओं में उनकी क्लिटोरिस और वजाइना के बीच होता है.

फाउलर सिंड्रोम में ये जो स्फिन्क्टर मसल है, उस पर कंट्रोल नहीं रहता. और उसके रिलैक्स होने में बहुत दिक्कत होती है. आसान भाषाा में कहें तो ये मसल जाम हो जाती है. इसका ये मतलब कि ब्लैडर में यूरिन इकठ्ठा तो होगा. लेकिन वो निकल नहीं पाएगा.

फाउलर्स सिंड्रोम क्यों कहते हैं इसे?

प्रफेसर क्लेयर जे फाउलर ने 1985 में इस सिंड्रोम की जानकारी दी थी.  इसके सिम्प्टम (लक्षण) बताए थे. उन्हीं के नाम पर इसे फाउलर्स सिंड्रोम कहा जाता है.

किसे होता है?

इसके जेनेटिक (आनुवंशिक) होने की कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है. लेकिन आमतौर पर 30 साल से कम या उसके आस-पास की उम्र की लड़कियों में ही इसे देखा गया है.

क्यों होता है?

इस पर स्टडी चल रही है. कुछ मामलों में देखा गया है कि फाउलर्स सिंड्रोम के साथ कुछ औरतों को हॉर्मोन्स में गड़बड़ी भी रही. लेकिन इन दोनों का एक-दूसरे पर असर कितना है, ये जानने के लिए अभी और गहरी रिसर्च की ज़रूरत है.

क्या इलाज है?

पॉलीयाना के केस में उनका ब्लैडर इतना भर जाता था कि फटने-फटने को हो जाता था. आर्टिफिशियल कैथेटर लगाकर बार-बार उनका ब्लैडर खाली करना मुश्किल था. उनकी मांसपेशियां कैथेटर के इर्द-गिर्द जकड़कर बंद हो जाती थीं. उससे उनका दर्द और भी बढ़ जाता था.  बार-बार इन्फेक्शन होता रहता था. 2015  में डॉक्टर्स ने उनके यूरिन के लिए नया रास्ता बनाया और वहां स्टोमा बैग लगा दिया. लेकिन सिर्फ इतने से फायदा नहीं हुआ. रह-रह कर उन्हें दर्द होता रहा. फिर 2018 में आखिरकार उनका यूरिनरी ब्लैडर निकालना पड़ गया. अब पॉलीयाना का यूरिन सीधे उनकी कमर से बंधे स्टोमा बैग में इकठ्ठा होता रहता है. पूरी ज़िन्दगी उन्हें ऐसे ही निकालनी होगी.

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अभी भी पॉलीयाना कॉन्शियस हो जाती हैं अगर उनका स्टोमा बैग (वो बैग जिसमें यूरिन इकठ्ठा होता रहता है) लीक होता है, या उनके कपड़ों के ऊपर से दिखाई देता है. (तस्वीर साभार: PA Real Life)

लेकिन ज़रूरी नहीं है कि सभी मामलों में ऐसा ही हो. कुछ मामले ऐसे भी होते हैं, जिनमें महिलाएं यूरिन पास कर सकती हैं, और थोड़ा यूरिन ही उनके ब्लैडर में बच जाता है. ऐसे मामलों में कोई मेडिकल दखल देने की ज़रूरत नहीं होती, ऐसा bladderhealthuk.org पर छपी रिपोर्ट कहती है. लेकिन जिन औरतों का ब्लैडर पूरी तरह भर जाता है और उसके बाद भी यूरिन पास नहीं होता, उन्हें मेडिकल हेल्प की जरूरत पड़ सकती है, बीच-बीच में कैथेटर लगाकर उनका यूरिन खाली करवाया जा सकता है.  कुछ केसेज में नसों को उत्तेजित किया जाता है. वो नसें जो रीढ़ की हड्डी से जुड़ी होती हैं और ब्लैडर तक जाती हैं. इसके लिए एक डिवाइस आता है, जिसे इंटरस्टिम कहते हैं. अगर डॉक्टर टेस्ट करके ये कंफर्म कर सकें कि आपकी बॉडी के लिए ये डिवाइस ठीक है, तो इसे आपके शरीर में इम्प्लांट किया जा सकता है, इससे यूरिन पास करने में आसानी होगी.


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