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इंटरनेट पर फेमिनिज्म की क्लास लगाने वाले लोग ये आर्टिकल पढ़ लें

सोशल मीडिया पर पिछले कुछ दिनों से एक नया शिगूफ़ा चला है. वो ये कि ‘आजकल का फेमिनिज्म’ किसी काम का नहीं. इस पर धड़ाधड़ वीडियो अपलोड होते हैं. कुछ की रीच तो लाखों में जाती है. इन वीडियोज़ में क्या होता है, किस तरह के पॉइंट्स उठाए जाते हैं, वो समझने के लिए ये वीडियो देख लीजिए, जो पिछले कुछ दिनों में काफी वायरल हो रहा है.


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इस वीडियो को बनाने वाली हैं दिव्यांगना त्रिवेदी. स्टूडेंट हैं. कुछ दिनों में इनकी कोई किताब भी आने वाली है. इस वीडियो में दिव्यांगना ने फेमिनिज्म के बारे में कई बातें कही हैं. कि कैसे ये किसी काम का नहीं है. आजकल इसके नाम पर गलत फायदा उठाया जा रहा है. लेकिन मुद्दे की बात ये है कि उन्होंने इस वीडियो में जो कुछ भी कहा है, वो नया नहीं है. ये सब कुछ पहले भी कहा जा चुका है. पिछले कई सालों में. इस वीडियो को लेकर सोशल मीडिया पर ही कई लोगों ने अपनी बात रखी.

नानकी रंधावा नाम की यूजर अपने ट्विटर अकाउंट पर लिखती हैं,

दिव्यांगना का कहना है कि मॉडर्न फेमिनिज्म का मतलब है पुरुषों से नफरत. दिव्यांगना कहती हैं कि पहले का फेमिनिज्म अच्छा था. क्योंकि उसमें बराबरी की बात थी. आज कल के फेमिनिज्म में ऐसा नहीं है.

लेकिन पहले के मुकाबले आज की दिक्कतें भी नई हैं. हमारी राह में नए रोड़े हैं. पहले के फेमिनिस्ट मूवमेंट का लक्ष्य था बराबरी का दर्जा हासिल करने के लिए जमीन तैयार करना. कानूनी बराबरी पाना. काम करने का हक़ हासिल करना. उसके बाद ये हमारे अपने शरीर पर हमारे अधिकार की मांग को लेकर आगे बढ़ा. और अब फेमिनिस्ट मूवमेंट रेप कल्चर के खिलाफ लड़ रहा है. ज़हरीले मर्दवाद के खिलाफ आवाज़ उठा रहा है. समान काम के लिए समान सैलरी की मांग उठा रहा है. पुरुषों को लेकर नफरत यानी मिसएंड्री एक असल दिक्कत है, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता. लेकिन वो सिर्फ महिलाओं तक सीमित नहीं है. फेमिनिज्म तो कहता है कि आप ऐसी नफरत मत करिए.

Suffragette Anti Feminism
जो लोग कहते हैं कि पहले का फेमिनिज्म अच्छा था, उनको ये नहीं भूलना चाहिए कि वोटिंग का अधिकार मांगने वाली महिलाओं के लिए उस समय भी बेहद अपमानजनक और भद्दे कार्टून बनाए जाते थे. उन्हें पुरुषों से नफरत करने वाली, बदसूरत, और गुस्सैल औरतों के रूप में दिखाया जाता था, जो घर चलाने के लायक नहीं. स्त्री कहलाने के लायक नहीं. तब में और अब में कितना फर्क आया है, वो आप सोशल मीडिया का एक चक्कर लगा आएं तो पता चल जाएगा.

बात दिव्यांगना त्रिवेदी की नहीं है. बात उनके इस एक वीडियो की भी नहीं है. बात उन सभी चीज़ों की है जो इस वीडियो के जरिए ‘नॉर्मल’ बनाई जा रही हैं. कहीं पर भी अगर महिलाओं के हक़ की बात हो, तो यही चंद तर्क उठाकर पेश कर दिए जाते हैं. फेमिनिज्म को ‘आउट ऑफ डेट’ बता दिया जाता है. उसकी जगह ‘ह्यूमनिज्म’ की बात की जाती है.

F Ended
लो मान लिया हमने, अब?

शब्द हैं शब्दों का क्या

क्या है ह्यूमनिज्म? या एगैलीटेरियनिज्म (egalitarianism)जिसका इस्तेमाल करने को कहा जाता है. फेमिनिज्म की जगह.

लिन कैवेनॉ (Lynn Cavanaugh). वुमन्स ओन और अमेरिकन वुमन मैगजीन की एडिटर इन चीफ हैं. अपने एक ऑनलाइन ब्लॉग में वो लिखती हैं,

फेमिनिज्म को ये नाम इसलिए दिया गया क्योंकि ये जेंडर (लिंग) के उन मुद्दों पर बात करता है जो महिलाओं पर असर डालते हैं.ये एक नागरिक अधिकार का मुद्दा है. और बाकी के नागरिक अधिकार मुद्दों से कुछ छीन नहीं लेता. इसका इस्तेमाल करने का मतलब है कि आप दिखाना चाहते हैं कि आप महिलाओं के लिए बराबरी की वकालत करते हैं. और महिलाओं को अपने लिंग की वजह से जो परेशानियां झेलनी पड़ती हैं, आप उसके बारे में बात कर उन्हें सुलझाना चाहते हैं. इसे ह्यूमनिज्म या एगैलीटेरियनिज्म इसलिए नहीं कहते, क्योंकि ये तीनों अलग-अलग चीज़ें हैं.

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फेमिनिज्म का विरोध करने वाले कुछ लोग ये भी कहते हैं कि ये पुरुष की ‘मर्दानगी’ कम कर देने की चाल है. (तस्वीर: booktopia)

ह्यूमनिज्म फिलॉसफी (दर्शन) की एक शाखा है जो बराबरी, सहिष्णुता, और धर्म-निरपेक्षता की बात करती है. इसका मानना है कि मनुष्यों को नैतिक होने के लिए किसी धर्म की आवश्यकता नहीं है. इसका ये मानना है कि मनुष्य अपने तर्कों का इस्तेमाल कर के ये निर्णय ले सकते हैं कि नैतिकता क्या है. कोई ऊपरी शक्ति उनके लिए ये डिसाइड नहीं करेगी.

एगैलीटेरियनिज्म एक राजनैतिक फिलॉसफी है. जिसका ये मानना है कि सभी मनुष्य बराबर पैदा हुए हैं. और इस वजह से सभी संसाधनों पर उनका बराबर का हक़ है. लेकिन प्रैक्टिकल बात की जाए, तो इसके लागू होने में कई दिक्कतें हैं. एक सामजिक-राजनैतिक मूवमेंट के तौर पर ये काफी समय से निष्क्रिय हो रखा है.

लिन आगे लिखती हैं,

फेमिनिज्म मूवमेंट इस बात पर ऑपरेट करता है कि आपके लिंग के आधार पर आपके साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए. इसे फेमिनिज्म इसलिए कहते हैं क्योंकि जिस लिंग से उसका व्यक्ति होने का अधिकार छीनकर उसका दमन किया जा रहा है, वो स्त्रीलिंग है. इसका ये मतलब नहीं कि बाकी मूवमेंट से इसे मदद नहीं मिली, या इस पर फर्क नहीं पड़ा. लेकिन ये अपने अपने-आप में एक अलग सामाजिक और राजनैतिक आंदोलन है जो महिलाओं के साथ-साथ पुरुषों के लिए भी बराबरी पाने की बात करता है.

‘शहरी’ और ‘गांव का’ फेमिनिज्म?

अपने ही एक दूसरे वीडियो में दिव्यांगना कहती हैं, कि गांव की औरतों को इन सब चीज़ों से कोई मतलब नहीं. उन्हें तो रोटी-कपड़ा-मकान मिल जाए वो उसी में खुश रहेंगी.

ये एक और पॉपुलर तर्क है. जो इंटरनेट पर आपको अक्सर पढ़ने को मिल जाएगा. जिसमें लोग कहते हैं, कि शहरी, पढ़ी-लिखी लड़कियों को फेमिनिज्म की ज़रूरत नहीं. कई बार इस वजह से भी फेमिनिज्म के बारे में खुलकर लोग बोलते नहीं. लड़कियां नहीं बोलतीं. उनको लगता है, उन्हें जितना मिला, वही बहुत है. इससे बुरा भी तो हो सकता था. इस तर्क को लेकर भी ट्विटर पर जवाब दिए गए.

‘इस बात की चिंता मुझे ज्यादा है कि जितने स्त्रीद्वेषी हैं, वो इसे वैलिडेशन दे रहे हैं.’

‘जो लड़कियां ये कहती हैं कि फेमिनिज्म बेकार है, वो मुझे बड़ी फनी लगती हैं. आज के समय में लड़कियों को ओपिनियन रखने की स्वतंत्रता ही इसलिए है क्योंकि फेमिनिज्म मौजूद है. अगर आप इसे ‘ट्वीट’ कर पा रही हैं तो वो इसलिए क्योंकि फेमिनिस्ट्स ने आपके लिए लड़ी ये लड़ाई. ताकि समाज में आपकी एक आवाज़ हो, जिसे वैलिडेशन मिल सके.’

‘मुझे माफ़ करिए लेकिन दिव्यांगना को खुद को एजुकेट करने की ज़रूरत है. इज्जत के साथ कह रही हूं कि आज भी महिलाओं और पुरुषों को समान अधिकार नहीं मिल पाए हैं. हर महिला प्रिविलेज्ड नहीं है. ‘गरीब से गरीब लड़की IAS बनने का सपना देख सकती है’. हां. लेकिन उसका ये सपना उसकी सच्चाई शायद कभी न बन पाए.’

‘मैं इनके फॉलोअर्स के बीच फंस गई, जहां एक लड़की ने कहा कि ‘आज मैं वो हर चीज़ कर सकती हूं जो एक लड़का कर सकता है इसलिए फेमिनिज्म की कोई ज़रूरत नहीं है’. उससे मैं बस इतना पूछना चाहूंगी कि क्या वो सड़क पर रात को 9 बजे बिना बलात्कार के डर के चल सकती है? क्योंकि लड़के ऐसा कर सकते हैं.’

शौर्या मित्तल पेशे से इंजिनियर हैं. ह्यूमंस ऑफ सेफ प्लेसेज नाम का वेब पोर्टल चलाती हैं. उनका कहना है,

पुरुषों का भी शोषण होता है, लेकिन उनके मामलों में भी रिसर्च दिखाती है कि उनके साथ ऐसा अपराध करने वाले अधिकतर पुरुष होते हैं. इस वीडियो में अल्पसंख्यक समुदायों की महिलाओं और समाज के कथित निचले तबकों से आने वाली महिलाओं के संघर्ष की बात बिलकुल भी नहीं की गई.

कानून में लूपहोल्स हैं, पुरुष विक्टिम्स को सपोर्ट करने के लिए हमारे पास इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी है. सही है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि महिलाओं द्वारा सदियों से झेली जा रही ज्यादती को नकारा जा सकता है, ख़ास तौर पर तब, जब वो आज तक इससे जूझ रही हैं. अलग अलग रूपों में, अलग- अलग तरीकों से.

इससे पहले कि आप ये कहें कि बराबरी हर बात में अचीव कर ली गई है और हम उससे आगे बढ़ सकते हैं. एक बार जाते-जाते ये पढ़ते जाइए.

नेशनल क्राइम रेकॉर्ड्स ब्यूरो के मुताबिक़ हर पंद्रह मिनट में एक महिला का रेप रिपोर्ट किया जाता है. रिपोर्ट न किए जाने वाले मामले कितने होंगे, इसका अंदाजा हम आप पर छोड़ते हैं.

महिलाओं के खिलाफ हिंसा में अभी भी सबसे बड़ा घरेलू हिंसा है.

साल 2018 में कुल 1,05,536 अपहरण के मामले रिपोर्ट हुए. इनमें अस्सी फीसद महिलाएं और लड़कियां थीं.

2017-2018 में भारत के 81 फीसद पुरुष साक्षर पाए गए.
महिलाएं? 64 फीसदी. राजस्थान में ये 50 फीसदी के आस-पास है. यानी वहां हर दूसरी महिला निरक्षर है. ये हम नहीं कह रहे. NSSO (नेशनल सैम्पल सर्वे आर्गेनाईजेशन) की रिसर्च कहती है. आप यहां क्लिक करके पूरी रिपोर्ट देख सकते हैं.

पॉपुलेशन रिसर्च इंस्टिट्यूट के अनुसार 2000 से 2014 के बीच सवा करोड़ से भी ज्यादा एबॉर्शन कराए गए, भारत में. सिर्फ इस वजह से क्योंकि पेट में पल रही भ्रूण लड़की थी. यानी हर रोज़ दो हज़ार से भी ज्यादा लड़कियां गर्भ में ही मार दी गईं.


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