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हर लड़की के पिता को पढ़नी चाहिए ये बात

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दिल्ली का फर्श बाज़ार इलाका. यहां के थाने में एक फोन आया. पुलिस को बताया गया कि विश्वास नगर के एक घर में वारदात हो गई है. एक व्यक्ति ने कथित रूप से खुद को गोली मार ली है.

पुलिस वहां पहुंची. एक आदमी अपने घर के एक कमरे में खून से लथपथ पड़ा था. साठ साल के आस-पास की उम्र. लाश के पास देसी तमंचा पड़ा हुआ था.

पुलिस ने पूछताछ शुरू की. पता चला कि व्यक्ति का अपनी छोटी बेटी से झगड़ा हो रहा था. तकरीबन 20 मिनट तक उनकी बहस हुई. इसके बाद कथित रूप से उस व्यक्ति ने ख़ुद को छाती में गोली मार ली. इस मामले में पुलिस ने आर्म्स एक्ट और CrPC सेक्शन 374 के तहत मामला दर्ज कर लिया है.

अब सवाल ये उठता है कि आखिर पिता और बेटी में ऐसी क्या बहस हुई जो पिता ने अपनी जान दे दी? पुलिस ने जब जांच की तो सामने आया कि छोटी बेटी होमोसेक्सुअल थी. वो किसी लड़की को पसंद करने लगी थी. उसके साथ रिलेशनशिप रखना चाहती थी. खुद को उसकी पार्टनर मानने लगी थी. इस बात से उसके पिता को दिक्कत थी. मामला अभी पुलिस के पास है, जांच चल रही है. और भी जानकारी आएगी. लेकिन इस सच को नहीं बदल पाएगी, कि एक पिता से अपनी बेटी का होमोसेक्सुअल होना बर्दाश्त नहीं हुआ.

सांकेतिक तस्वीर: पिक्साबे
कोई भी गे या लेस्बियन बनता नहीं है, जन्म से होता है. इस पर उनका कोई कंट्रोल नहीं होता.  (सांकेतिक तस्वीर: पिक्साबे)

विवेक तेजूजा मुंबई के एक सिन्धी परिवार से हैं. इस वक़्त एक बड़ी मैगजीन में कल्चरल एडिटर हैं. किताब आई है उनकी हाल में ही. So Now You Know – Growing Up Gay In India नाम से. इसमें उन्होंने बताया कि किस तरह गे होना उनके परिवार के लिए एक बहुत बड़ा झटका था. जब पहली बार उनके ‘लड़कों जैसा न होने’ का अंदेशा उनके परिवार को हुआ, उनके चाचा ने उन्हें थप्पड़ मार दिया था. उनके दोस्त उनसे दूर हो गए थे. उन्हें बुली किया गया था. उनकी तरह ही दूसरे गे लोग, एक दूसरे से छुप-छुप कर क्लबों में मिलते थे. कई तो मजबूरन लड़कियों से शादी कर परिवार बसा लेते थे. अंदर ही अंदर घुटते रहते थे. ये साउथ मुंबई के एक पॉश इलाके की बात है.

होमोसेक्सुएलिटी. यानी समलैंगिकता. समान लिंग के लोगों का एक दूसरे को पसंद करना. हाल में जब सेक्शन 377 से समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से हटा दिया गया था, तो लोग ख़ुशी में सड़कों पर उतर आए थे. ये लोग वही थे जो हमारे और आपके बीच रहते हैं. लेकिन शायद हर बार खुद को एक्सप्रेस नहीं कर पाते.

कितना आसान होता ये सोचना कि कुछ पहचानों को समाज आसानी से अपना लेता है,और जो उससे सहमत नहीं होते उनके लिए जीना दूभर हो जाता है. (सांकेतिक तस्वीर: पिक्साबे)
कुछ पहचानों को समाज आसानी से अपना लेता है,और जो उससे सहमत नहीं होते उनके लिए जीना दूभर हो जाता है. (सांकेतिक तस्वीर: पिक्साबे)

कुछ समय पहले मैं 13 Reasons Why देख रही थी. नेटफ्लिक्स का एक शो है. बहुत पॉपुलर हुआ था. टीनएज बच्चों की दिक्कतों और सुसाइड पर बना शो था. उसे देखते हुए मन खराब हो गया. फेसबुक खोला. जो पहला फ्रेंड ऑनलाइन दिखा, उसे टेक्स्ट कर दिया. कहा कि मन कैसा-कैसा हो रहा. स्कूल में बच्चों की बुलीइंग याद आ रही. घबराहट हो रही. उसने उस मुश्किल वक़्त में बहुत अच्छे से समझाया. बताया कि उसने भी बहुत कुछ झेला हुआ है. बल्कि उसके लिए कुछ ज्यादा ही मुश्किल था सब कुछ. उस समय मैंने कुछ नहीं पूछा. बाद में एक दिन उसका टेक्स्ट आया. उसने पूछा, कुछ बताऊं तो बुरा तो नहीं मानोगी? मैंने कहा नहीं, बताओ. उसने मुझे बताया कि वो गे है. ये बात आजतक वो अपने करीबी दोस्तों से भी नहीं कह पाया था. सुनकर उसकी कातरता समझ आई. उसे गले लगा लेने का मन हुआ.

सांकेतिक तस्वीर: पिक्साबे
अंग्रेजी में एक कहावत है, Everyone is fighting a battle you know nothing about. Be Kind. (सांकेतिक तस्वीर: पिक्साबे)

ये पुरानी बात नहीं है. दिल्ली जैसे शहर की है.

स्वीकृति या वैलिडेशन बहुत मुश्किल और कठिन चीज़ों में से एक है. चाह सबको होती है. मिलती नहीं है. जो लोग अपने जीवन में सब कुछ ‘नॉर्मल’ करते हुए से दिखते हैं, उनको भी इसकी इच्छा होती है. और जो लोग इन ‘नॉर्मल’ चीज़ों से थोड़ा भी हटकर दिखते हैं, उनके लिए ये रास्ता और मुश्किल हो जाता है. लाख इंस्पायरिंग कोट्स पढ़ लें आप इन्टरनेट पर, Sense of Belonging के बिना जिंदगी अधूरी लगती है. उस लड़की के पिता को शायद ये नहीं पता था कि जो उन्होंने किया, वो उनका खुद का चुनाव नहीं था. इंसान के सामाजिक जानवर होने वाली कहावत यहां सच्ची साबित होती है. अकेलेपन से कोई कितना ही जूझे.

जूझ नहीं पाई होगी वो बच्ची. न उसके पिता. एक लेस्बियन बेटी के पिता होने से एक मृत आदमी होना उन्हें बेहतर लगा.


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