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भारत में ट्रांसजेंडर लोगों के चुनावी अधिकार क्या हैं?

हाल में ही बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया. मामला था ग्राम पंचायत से जुड़ा हुआ. ट्रांसजेंडर महिला अंजलि गुरु संजना जान ने अपील की थी. महिलाओं के लिए आरक्षित वॉर्ड से चुनाव लड़ने की. जिसके लिए हाई कोर्ट ने उन्हें इजाज़त दे दी.

मामला क्या था?

अंजलि गुरु संजना जान ने ग्राम पंचायत के चुनाव लड़ने के लिए जहां से फॉर्म भरा था, वहां पर उन्होंने महिला के तौर पर अपनी पहचान बताई थी. इस पर वहां के रिटर्निंग ऑफिसर ने उनकी उम्मीदवारी खारिज कर दी. इस बिना पर कि अंजलि ट्रांसजेंडर हैं, और जिस सीट पर वो चुनाव लड़ना चाह रही हैं, वो जनरल कैटेगरी में महिलाओं के लिए आरक्षित है. इस मामले में हाई कोर्ट ने रिटर्निंग ऑफिसर के निर्णय को पलटते हुए अंजना को चुनाव लड़ने की इजाज़त दे दी.

कोर्ट ने कहा कि इस मामले में याचिकाकर्ता ने फीमेल जेंडर को अपना चुना हुआ जेंडर माना है और गंभीरता से ये स्वीकार किया है कि वो अपनी पूरी जिंदगी में कभी मेल जेंडर को दुबारा नहीं अपनाएंगी. जस्टिस आर वी घुगे की बेंच ने फैसला सुनाते हुए ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) एक्ट 2019 का हवाला दिया. और कहा कि ट्रांसजेंडर लोगों को अपनी पहचान खुद चुनने का अधिकार है.

रिटर्निंग ऑफिसर के निर्णय के संबंध में कोर्ट ने कहा,

कानून की जानकारी को लेकर रिटर्निंग ऑफिसर की सोच सीमित कही जा सकती है, वो भी तब जब वो याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी का भविष्य तय कर रहे थे. किसी भी प्रतिभागी कैंडिडेट ने याचिकाकर्ता के चुनाव में उतरने को लेकर कोई आपत्ति नहीं की थी.

कुछ ऐसा ही मामला साल 2003 में सामने आया था. कमला जान नाम की ट्रांसजेंडर ने कटनी, मध्य प्रदेश की मेयर का चुनाव लड़ा. जीत भी गईं. लेकिन अपोजिशन ने ये आरोप लगाया कि कमला जान ने अपने जेंडर के बारे में झूठ बोला. कटनी वाली जिस सीट पर चुनाव लड़ीं वो महिलाओं के लिए आरक्षित थी. लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक़ कमला जान का नाम वोटर लिस्ट में पुरुष के तौर पर दर्ज था. अपोजिशन ने मामला कोर्ट में घसीटा, और वहां उनकी जीत हुई. कमला जान को पद छोड़ना पड़ा था.

Kamla Bua Mayor
कमला जान उर्फ़ कमला बुआ का साल 2019 में निधन हो गया.

क्या हैं ट्रांसजेंडर्स के चुनावी अधिकार?

साल 2014 में नेशनल लीगल सर्विस अथॉरिटी (NALSA) वर्सेज यूनियन ऑफ इंडिया मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक लैंडमार्क निर्णय सुनाया था. इसमें सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर्स को तीसरे जेंडर के रूप में मान्यता दी थी. कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि थर्ड जेंडर में आने वाले लोगों को संविधान और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत  मौलिक अधिकार प्राप्त हैं. सभी व्यक्तियों को ये अधिकार है कि वो अपना जेंडर खुद डिसाइड कर सकें. इसे सेल्फ-आइडेंटिफ़िकेशन कहा जाता है. कोर्ट ने ये भी कहा कि हिजड़ा /किन्नर भी कानूनी तौर पर थर्ड जेंडर के रूप में आइडेंटिफाई कर सकते हैं.

बात चुनाव की. भारत का कानून 18 वर्ष के ऊपर के सभी नागरिकों को चुनाव में वोट डालने का अधिकार देता है. ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) एक्ट, 2019 के तहत किसी भी ट्रांसजेंडर व्यक्ति को सरकारी या निजी ऑफिस में किसी भी पद पर काम करने से रोकना या उनके जेंडर को लेकर उनके साथ भेदभाव करते हुए उन्हें किसी  भी मौके से दूर रखना गैर कानूनी है.

ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को चुनाव लड़ने का अधिकार है. साल 1998 में शबनम मौसी विधायक का चुनाव लड़कर जीत चुकी हैं. लेकिन लोकसभा/राज्यसभा में आज तक कोई भी ट्रांसजेंडर सांसद नहीं पहुंचा है.

Shabnam Mausi
शबनम मौसी पर साल 2005 में फिल्म भी बन चुकी है.

चुनावी प्रक्रिया में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के आरक्षण को लेकर काफी समय से बहस जारी है. साल 2017 में चुनाव आयोग ने ओडिशा सरकार के रिकमेन्डेशन को नकार दिया था. जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा और नगरपालिका चुनावों में पांच फीसद के आरक्षण की मांग की गई थी.

चुनाव आयोग के अनुसार असेम्बली और संसद की सीटों में सिर्फ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के कैंडिडेट्स के लिए आरक्षण की व्यवस्था है. साल 2020 में कांग्रेस के सांसद रेवंत रेड्डी ने याचिका डाली कि एंग्लो-इंडियन लोगों के लिए अब तक आरक्षित रहने वाली दो सीटें ट्रांसजेंडर समुदाय को ट्रान्सफर कर दी जाएं ताकि उनका सही प्रतिनिधित्व हो सके. एंग्लो इंडियन लोगों के लिए आरक्षित इन सीटों का प्रावधान 2019 में ही खत्म हुआ था.

4 लाख से ज्यादा ट्रांसजेंडर वोटिंग के अधिकार से वंचित

जब चुनावी अधिकारों में सबसे बड़े अधिकार यानी वोटिंग के अधिकार की बात आती है, सबसे बड़ी दिक्कत वहीं सामने खड़ी हो जाती है. 2019 में आई इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, चार लाख से भी ज्यादा ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को वोटर आईडी कार्ड नहीं मिला है. यानि चुनावी डेटाबेस में वो वोटर के तौर पर रजिस्टर नहीं हैं. ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट बिशेष हिरेम ने इस रिपोर्ट में बताया,

‘हमें एक ट्रांसजेंडर के तौर पर खुद को रजिस्टर कराने में एक बहुत लम्बी प्रक्रिया फॉलो करनी पड़ती है. इलेक्टोरल रोल में ट्रांसजेंडर लोगों की कमी के पीछे यह मुख्य वजह है. ओथ कमिश्नर से हमारे क्रेडेंशियल साबित करने वाले कानूनी दस्तावेज लेने के अलावा,  हमें अपने ट्रांसजेंडर होने की खबर दो लोकल अख़बारों में भी देनी होती है. दस्तावेजों में पेरेंट्स या अभिभावकों के साइन लेने होते हैं. ये सभी चीज़ें दिक्कतें पैदा करती हैं.

ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) एक्ट 2019 को लेकर भी देश के कई संगठनों ने प्रोटेस्ट किया था. सरकार पर आरोप लगे थे कि ट्रांसजेंडर लोगों की चिंताओं और उनके मुद्दों को सुने बगैर ही ये कानून पास कर दिया गया.


वीडियो: मैटिनी शो: कौन-कौन से रियल लाइफ ट्रांसजेंडर सिनेमा की अलग-अलग फील्ड में काम कर रहे हैं?

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