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'द्रौपदी' के बलात्कार की कहानी से दिल्ली यूनिवर्सिटी को डर क्यों लग रहा है?

विश्वविद्यालय कोई ऐसी जगह नहीं है, जहां केवल भव्य और विशाल इमारतें हों. विश्वविद्यालय एक विचार है. एक ऐसा विचार, जहां समाज की बेहतरी के लिए दूसरे विचारों पर चर्चा होती है. नए विचार गढ़े जाते हैं और पुराने पीछे छोड़ दिए जाते हैं. विश्वविद्यालय में ऐसे विचारों पर भी चर्चा होती है, जो शायद आमतौर पर आपत्तिजनक माने जाएं. आपत्तिजनक विचारों पर चर्चा इसलिए भी जरूरी होती है, ताकि आधुनिकता के पैमाने पर तौलकर यह तय किया जा सके कि क्या के विचार सच में आपत्तिजनक हैं? मसलन, LGBT समूह के अधिकारों की बात एक जमाने में आपत्तिजनक लगती थी, लेकिन आज ये एक सभ्य समाज की प्रमुख निशानी है.

बात विश्वविद्यालय से शुरू हुई थी, तो हमारे देश में कई सारे विश्वविद्यालय हैं. इनमें ही एक नाम प्रतिष्ठित Delhi University का है. यहां से निकले लोगों ने देश और समाज को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है. फिलहाल यह विश्वविद्यालय कुछ अलग कारणों की वजह से चर्चा में है. दरअसल, यहां के अंग्रेजी ऑनर्स ग्रेजुएशन कोर्स से कुछ लेखिकाओं के काम को हटा दिया गया है. ये लेखिकाएं कोई मामूली लेखिकाएं नहीं हैं. देश ही नहीं बल्कि विदेश में भी इनका नाम है.

इन लेखिकाओं के नाम हैं महाश्वेता देवी, बामा और सुकीर्ता रानी. इनके लेखन को सिलेबस से हटाने के बाद से ही इस फैसले का विरोध और समर्थन दोनों हो रहा है. ताजा अपडेट में करीब ग्यारह सौ टीचर और एकेडेमिक्स ने दिल्ली विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर और राष्ट्रपति को पत्र लिखा है. पत्र लिखने वालों  में रोमिला थापर, जयति घोष, पेरुमल मुरुगन, उर्वशी बुटालिया जैसे स्थापित नाम शामिल हैं. इस पत्र में इन तीन लेखिकाओं के काम को वापस से सिलेबस में शामिल करने की बात कही गई है. पत्र में कहा गया कि तीनों लेखिकाओं का लेखन समाज की अलग-अलग रूपरेखा के बारे में समझ विकसित करने के लिए बहुत जरूरी है.

इससे पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार डॉ. विकास गुप्ता ने कहा था कि लेखिकाओं के काम को हटाने का फैसला सर्वसम्मति और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के पालन के बाद हुआ है. उन्होंने यह भी कहा कि सिलेबस में ऐसे लेखन को जगह नहीं मिलनी चाहिए, जिससे लोगों की भावनाएं आहत होती हों क्योंकि विश्वविद्यालय का काम एक समावेशी समाज का निर्माण करना है. डॉ. विकास गुप्ता ने इन तीनों लेखिकाओं के काम को आपत्तिजनक भी बताया. दूसरी तरफ कई शिक्षकों ने उनके इस बयान का विरोध किया. खासकर इस बात का कि लेखिकाओं के काम को हटाने का फैसला सर्वसम्मति और लोकतांत्रित प्रक्रिया से लिया गया. एक-एक करके इन लेखिकाओं और उनके उस काम के बारे में जानते हैं जिन्हें सिलेबस से हटाया गया है.

महाश्वेता देवी- द्रौपदी

Mahashweta Devi
Mahashweta Devi की रचना द्रौपदी को दिल्ली यूनिवर्सिटी के सिलेबस से हटा दिया गया है.

महाश्वेता देवी किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं. उनका जन्म अविभाजित बंगाल के ढाका में 1926 में हुआ था. 40 के दशक में वे बंगाल के कम्युनिस्ट आंदोलन से प्रभावित हुईं और फिर लगातार अपने लेखन के जरिए दबे-कुचले लोगों की आवाज उठाने लगीं. साहित्य और समाज में उनके योगदान के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा गया. मसलन, साहित्य अकादमी, ज्ञानपीठ, पद्म विभूषण और मैगसेसे पुरस्कार.

महाश्वेता देवी की जिस कहानी को सिलेबस से हटाया गया है, उसका शीर्षक है- द्रौपदी. यह बंगाल की पृष्ठभूमि पर आधारित एक लघुकथा है. यह एक 27 साल की आदिवासी युवती द्रौपदी के दृढ़ निश्चय की कहानी है, जो पैट्रियार्की, बलात्कार और यौन शोषण के खिलाफ लड़ती है और अंत में इस संघर्ष का प्रतीक बन जाती है. द्रौपदी के गांव के जमीदारों ने पानी के स्रोतों पर कब्जा कर रखा होता है. गांव के सभी लोगों को पानी मिले, इसके लिए द्रौपदी उन जमीदारों से लड़ती है. गांव के जमींदार सरकार से मदद लेते हैं. सरकार के आदेश पर काम करने वाले सिपाही द्रौपदी को पकड़ने के मिशन पर भेज दिए जाते हैं. ये सिपाही उसे पकड़ लेते हैं. उसका बलात्कार करते हैं. और फिर उससे कपड़े पहनने को कहते हैं. लेकिन वो कपड़े पहनने से इनकार कर देती है. सभी कपड़ों को फाड़कर फेंक देती है.

वो बिना कपड़े पहने ही अधिकारी के सामने चली जाती है. वो सवाल पूछती है कि आखिर वो कपड़े क्यों पहने और वहां ऐसा कौन सा इंसान मौजूद है, जिससे वो शर्म करे? इस सवाल का जवाब ना तो अधिकारी के पास होता है और ना ही सिपाहियों के पास. सब शांत पड़ जाते हैं. इस तरह से द्रौपदी का शरीर तमाम तरह की यातनाएं सहकर भी हार ना मानने का प्रतीक बन जाता है.

बामा- आत्मकथा करुक्कू और संगति

Bama
लेखिका बामा. इनकी आत्मकथा के दो हिस्से दिल्ली यूनिवर्सिटी के सिलेबस से हटा दिए गए हैं.

इसी तरह तमित दलित लेखिका बामा की आत्मकथा करुक्कू को भी सिलेबस से हटा दिया गया है. 1992 में प्रकाशित हुई इस किताब का कई भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है. इसी किताब का एक अगला भाग है. उसका शीर्षक संगति है. इसे भी सिलेबस से हटा दिया गया है. ये दोनों ही किताबें तमिलनाडु के समाज में एक ईसाई दलित महिला के संघर्ष की कहानी कहती हैं.

बामा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के इस फैसले को सरकार के इशारे पर उठाया गया कदम बताया. उन्होंने कहा कि पिछले दो हजार सालों से दलित समाज और महिलाओं के ऊपर जुल्म किया गया. जब हमने पढ़ना-लिखना सीखा और अपनी बात रखनी सीखी, तो अब हमें फिर से दबाने की कोशिश की जा रही. लेकिन सरकार हमें जितना दबाएगी, हम उतनी ही तीव्रता से प्रतिक्रिया देंगे. सरकार हमारा गला दबाएगी तो हम चिल्लाएंगे. बामा ने कहा कि वो दिल्ली विश्वविद्यालय के फैसले से दुखी नहीं हैं लेकिन गुस्सा हैं और यह गुस्सा उनके आगे के काम में दिखाई देगा.

सुकीर्ता रानी- कैमारू और एन ऊडल

Sukhirtha Rani
लेखिका सुकीर्ता रानी की दो रचनाओं को दिल्ली यूनिवर्सिटी के सिलेबस से हटा दिया गया है.

सुकीर्ता रानी की भी दो रचनाओं कैमारू और एन ऊडल को सिलेबस से हटा दिया गया है. ये दोनों रचानाएं भी कमोबेश दलित महिलाओं के संघर्ष के बारे में हैं. कैमारू में तो मैनुअल स्कैवेंजिंग के दंश का बेहद ही पीड़ादायक चित्रण किया गया है.

अपनी रचनाओं को सिलेबस से हटा देने पर सुकीर्ता रानी की प्रतिक्रिया भी आई है. द हिंदू से हुई बातचीत में सुकीर्ता रानी ने इस कदम को अप्रत्याशित नहीं बताया है. उनका कहना है कि बीजेपी की सरकार के आने के बाद से ही प्रगतिशील लेखकों पर अंकुश लगाए जा रहे हैं. उनकी हत्याएं हो रही हैं और जेल में डाला जा रहा है. ऐसे में ये तो होना ही थी.

क्या कह रहे अलग-अलग पक्ष?

इन लेखिकाओं के काम को सिलेबस से हटाने का फैसला ओवरसाइट कमेटी की अनुशंसा पर लिया गया. दिल्ली विश्विविद्यालय में इस तरह की कमेटी पहले नहीं होती थी. दिल्ली यूनीवर्सिटी के पूर्व वाइस चांसलर योगेश त्यागी ने अपने विशेषाधिकारों का इस्तेमाल करते हुए यह कमेटी बनाई थी. इस कमेटी पर जब मनमाने तरीके से काम करने के आरोप लगे, तो इसके अध्यक्ष एमके पंडित की प्रतिक्रिया आई. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक पंडित ने कहा कि अलग-अलग लेखकों के लेखन को सिलेबस से हटाना और शामिल करना बना रहता है, ऐसे में इस फैसले पर हंगामा खड़ा करना सही नहीं है.

इस फैसले का विरोध करने वालों ने यह भी आरोप लगाया कि इंग्लिश डिपार्टमेंट के HOD पर सिलेबस में बदलाव पर सहमति देने का दबाव बनाया गया. बाद में HOD ने भी बताया कि उन्होंने बदलाव को इसलिए मंजूरी दी क्योंकि सिलेबस को रोक लिया गया गया था. दूसरी तरफ, दक्षिणपंथी विचारधारा से वास्ता रखने वाले शिक्षकों का समूह नेशनल डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट यानी NDTF इस फैसले का समर्थन कर रहा है. इस समूह और दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन की भाषा एक जैसी है. ऐसे में हमने NDTF की एक सदस्य और राम लाल आनंद कॉलेज की प्रोफेसर प्रेरणा मल्होत्रा से कुछ जरूरी सवाल पूछे. हमने उनसे पूछा कि जिन कहानियों और किताबों को सिलेबस से हटाया गया है, उन्हें लेकर आपत्ति क्या है और क्या यह छात्रों के ऊपर नहीं छोड़ देना चाहिए कि वो सही गलत का फैसला खुद करें. उन्होंने हमें बताया,

“द्रौपदी कहानी के जरिए हिंदू धर्म को बदनाम किया गया है. इसके जरिए माओवाद को सही ठहराया गया है. यह पूरा थीम ही आपत्तिजनक है कि सैनिक किसी आदिवासी महिला का रेप करते हैं. दूसरी लेखिकाओं ने भी अपने लेखन के जरिए हिंदू धर्म को बदनाम किया है. एक खास विचारधारा के लोगों ने इन कहानियों और किताबों को सिलेबस में जगह दी. बदलाव के बाद मुस्लिम औरतों के हक की कहानियां सिलेबस में बनी हुई हैं. इसे लेकर तो कोई नहीं कहता कि यह प्रशंसनीय कदम है. इस बात से सहमत हूं कि सही और गलत तय करने का फैसला छात्रों के ऊपर छोड़ दिया जाना चाहिए. लेकिन जो भी बदलाव हुए हैं वो पूरे लोकतांत्रिक ढंग से छात्रों के सामने हुए हैं.”

हमने प्रोफेसर प्रेरणा मल्होत्रा से कुछ और सवाल भी पूछे. मसलन, इस देश का संविधान हाशिए के लोगों को मुख्य धारा में जगह देने की बात कहता है. ऐसे में जिन लेखिकाओं ने इस समाज के लोगों को अपने लेखन का केंद्रीय हिस्सा बनाया, आखिर उनका विरोध करने का औचित्य क्या है. हमने प्रेरणा मल्होत्रा से कैंपस और सिलेबस के भगवाकरण के आरोपों पर भी जवाब मांगा. उन्होंने हमें बताया,

“हम पूरी तरह से संविधान में विश्वास रखते हैं और जो ये नया सिलेबस आया है उसमें हाशिए के लोगों का पूरा ध्यान रखा गया है. हम लिंग और जाति पर पूरे के पूरे पेपर पढ़ा रहे हैं. समलैंगिक समुदाय के लोगों को सिलेबस में जगह दे रहे हैं. इन पेपर्स में कॉन्टेंट किस तरह का है, उसके ऊपर चर्चा हो सकती है. रही बात भगवाकरण के आरोपों की तो इस शब्द का प्रयोग एक खास तरह की विचारधारा रखने वाले लोग अपने विरोधियों को चुप कराने के लिए करते हैं. कहीं कोई भगवाकरण नहीं हो रहा है. इस तरह के आरोप बौद्धिक आतंकवाद का परिणाम हैं.”

इस फैसले का विरोध करने वालों के विचार जानने के लिए हमने दिल्ली यूनीवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन की सदस्य और मिरांडा हाउस कॉलेज की एसोसिएट प्रोफेसर आभा देव हबीब से बात की. हमने उनसे भी कुछ जरूरी सवाल पूछे. हमने उनसे पूछा कि इन लेखिकाओं के काम को सिलेबस से हटाने पर उनकी प्रतिक्रिया क्या है और सिलेबस के वामपंथीकरण के जो आरोप लगते आए हैं, उनके ऊपर उनका क्या कहना है? उन्होंने कहा,

“जिस तरीके से यह पूरा फैसला लिया गया, वो एक खास विचारधारा से प्रेरित होकर लिया गया. इस फैसले से यूनीवर्सिटी की स्वायत्ता पर भी हमला किया गया जो सीधे तौर पर संसद से मिली हुई है. इंग्लिश डिपार्टमेंट ने जो सिलेबस तैयार किया था, वो समाज और छात्रों की बेहतरी को ध्यान में रखकर तैयार किया था. इस सिलेबस को तैयार करने वाले शिक्षकों को धमकियां दी गईं. रही बात सिलेबस के वामपंथीकरण के आरोपों की, तो क्या समाज की सच्चाई दिखाना और समानता की बात करना वामपंथ है. जो लोग इन कहानियों और किताबों का विरोध कर रहे हैं, वो एक खास तरह की सामाजिक व्यवस्था के समर्थक हैं. वो जाति व्यवस्था के समर्थक हैं. वो औरतों के दमन के समर्थक हैं. उनके हिसाब से जाति व्यवस्था ठीक है. लेकिन अगर कोई दलित अपने साथ हुए शोषण की बात करे तो वो उनकी नजर में समाज तोड़ने वाला बन जाता है. यूनीवर्सिटी एक मंच है, जहां तार्किक सोच को विकसित किया जाता है. इस मंच पर लगातार हमले किए जा रहे हैं और साल 2019 के बाद से ये हमले बहुत तेज हो गए हैं.”

हमने आभा देव हबीब से यह भी पूछा कि आखिर इस सिलेबस के बदलाव से छात्रों के ऊपर क्या असर पड़ेगा. उन्होंने हमें बताया.

“छात्र समझ गए हैं कि इस सिलेबस से उनका कोई फायदा नहीं होने वाला. ना तो इससे उनकी तार्किक सोच विकसित होगी और ना ही वो आगे बढ़कर कुछ हासिल कर पाएंगे. क्योंकि भावनाओं का बहाना बनाकर उन्हें जरूरी बातों से दूर रखा जा रहा है. आज का दौर तो वैश्विक स्पर्धा का दौर है. ऐसे में उन्हें उसी सिलेबस की जरूरत है, जो इंग्लिश डिपार्टमेंट ने पहले तैयार किया था. इस बदलाव के बाद से छात्र अब यूनीवर्सिटी पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं. यही वजह है इस फैसले के खिलाफ कई छात्रों ने सिग्नेचर कैंपेन भी चलाया है.”

आपने इस मुद्दे से जुड़े सभी पक्ष सुने. अब आखिर में एक बात हम भी कहना चाहते हैं. सबसे पहले तो ये कि शिक्षण संस्थानों को राजनीतिक लड़ाई का अखाड़ा नहीं बनाना चाहिए. राजनीति जरूरी है, लेकिन ऐसी राजनीति जरूरी है, जिसमें विरोधियों को भी सम्मान दिया जाए. एक बाग में केवल एक ही तरह के फूल हों, तो वो बाग सुंदर नहीं लगता. बाग की सुंदरता अलग-अलग तरह के रंग-बिरंगे फूलों से आती है. यही बात समाज के लिए भी सच है. हमें इस तरह के कदम उठाने चाहिए, जिससे अलग-अलग धर्म, जाति, संस्कृति के लोगों के बीच सांमजस्य बैठ सके और वो सब एक साथ मिलकर रह सकें.

हमारा साफ मानना है कि विश्वविद्यालयों में किसी भी तरह के विचार और किताब पर रोक नहीं लगनी चाहिए. फिर वे चाहे किसी भी विचारधारा की ही क्यों ना हों. और यह मामला तो साहित्य से जुड़ा है. अच्छा साहित्य लोगों के पूर्वाग्रहों को तोड़ता है. समझ पर जमी हुई काई को हटाता है. अच्छे साहित्य का उद्देश्य समाज की बेहतरी और उसे उत्तरोत्तर उदार और समावेशी बनाना होता है. यह हमें समाज की सच्चाइयों को समझने के लिए एक साफ नजरिया देता है. यह शोषितों का सशक्तिकरण करता है. दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रशासन को इस तरह के फैसले नहीं लेने चाहिए. उसे यह समझना होगा कि रेप पीड़िता की पीड़ा से समाज को अवगत कराना शर्मनाक नहीं है, बल्कि उसका रेप होना शर्मनाक है. इसी तरह यह भी समझना होगा कि पिछली सदी में इंसानों को अंतरिक्ष भेज देने के बाद भी मैनुअल स्कैवेंजिंग जैसी प्रथा हमारे समाज पर धब्बा है और इसके बारे में छात्रों को पढ़ाया जाने से समाज टूट नहीं जाएगा. दिल्ली विश्वविद्यालय को यह भी समझना होगा कि देश, समाज और मुख्य धारा किसी एक प्रभावशाली वर्ग की बपौती नहीं है. भारत में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को उसमें हिस्सा है. उन्हें इस हिस्से से वंचित रखकर किसी तरह का राष्ट्र निर्माण नहीं किया जा सकता.


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