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क्या पिता के घर पर घरेलू हिंसा एक्ट के सहारे बेटा-बहू अपना हक जता सकते हैं?

दिल्ली के रामा गार्डन में एक परिवार रहता था, कुल तीन लोग थे. बेटा-बहू और पिता. जिस मकान में ये लोग रहते थे, वो मकान लड़के के पिता के नाम पर है. आए दिन पिता का बेटा-बहू से झगड़ा होता था. इस पर पिता ने दिल्ली के कड़कड़डूमा कोर्ट में एक आवेदन डाला. मांग की कि परमानेंट या मेंडेटरी इनजंक्शन दिया जाए, ताकि उनके बेटा-बहू घर को लेकर झगड़ा न करें और घर खाली कर दें. आगे बढ़ने से पहले परमानेंट या मेंडेटरी इनजंक्शन समझ लीजिए. ये एक तरह से कोर्ट का आदेश होता है, जिसमें किसी व्यक्ति को कोई काम करने से रोका जाता है. जैसे इस केस में पिता ने बेटा-बहू के खिलाफ इनजंक्शन देने की अपील की थी, माने वो चाहते थे कि उनके बेटा-बहू के खिलाफ कोर्ट एक आदेश दे, जिसके बाद घर को लेकर वो दोनों आवेदनकर्ता से झगड़ा न करें और घर खाली कर दें.

सुनवाई में क्या सामने आया?

सुनवाई शुरू हुई. कड़कड़डूमा कोर्ट में बेटा-बहू ने अपना बयान दर्ज करवाया. कहा कि जिस मकान को लेकर झगड़ा हो रहा है, वो असल में पुरानी प्रॉपर्टी को बेचकर खरीदा गया था. वो प्रॉपर्टी बेटे की मां के नाम पर थी. जब उनकी मौत हुई तो उसे बेचकर दूसरा घर खरीदा गया. बेटे ने दावा किया कि पहली प्रॉपर्टी में उसका भी हक था और जब दूसरा घर खरीदा गया तो उसने अपनी तरफ से भी उसमें कुछ पैसे लगाए थे. बचाव पक्ष ने ये भी कहा कि वो घर एक शेयर्ड हाउस-होल्ड है, और डिफेंडेंट नंबर 2, यानी इस केस में बहू को पूरा हक है कि वो उस घर में रहे. सारी दलीलों को सुनने और दस्तावेज़ों को देखने के बाद 18 अप्रैल 2019 में ट्रायल कोर्ट ने फैसला पिता के पक्ष में सुनाया. कोर्ट ने कहा-

“बचावकर्ता नंबर 2, यानी महिला अपने रहने के अधिकार का दावा अपने पति से कर सकती है अपने ससुर से नहीं. उनका कोई फर्ज़ नहीं बनता कि वो बेटे-बहू को रहने की जगह प्रोवाइड कराएं.”

कोर्ट ने सुनवाई में पाया कि बचाव पक्ष ने पहला घर के बिकने से लेकर दूसरा घर पिता के नाम पर खरीदने के मैटर में अब तक कोई आपत्ति नहीं जताई थी. साथ ही सारे दस्तावेज़ यही बता रहे थे कि प्रॉपर्टी पिता के नाम पर ही है और बेटा-बहू महज़ लाइसेंसी के तौर पर रह रहे थे. इसलिए ट्रायल कोर्ट ने माना की प्रॉपर्टी पर पूरा हक पिता का ही है. यानी अगर पिता चाहे तो बेटा-बहू को रख सकते थे और चाहें तो निकाल सकते थे. इस फैसले के खिलाफ कड़कड़डूमा कोर्ट में ही बेटा-बहू ने अपील डाली. जिसका नतीजा 16 नवंबर 2019 के दिन आया. और यहां पर भी फैसला गया पिता के पक्ष में.

इसके बाद बचाव पक्ष ने कड़कड़डूमा कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए 2020 में दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था. यहां बचावपक्ष के वकील ने दो अहम तर्क दिए. पहला- जो प्रॉपर्टी है वो जॉइंट फैमिली प्रॉपर्टी है और जॉइंट फंड से उसे खरीदा गया था. दूसरा- बचावपक्ष में से एक व्यक्ति उस घर की बहू है. यानी इनजंक्शन की मांग करने वाले व्यक्ति की बहू है. ऐसे में वो घर उस महिला का ‘शेयर्ड हाउस-होल्ड’ है. इस तर्क को सपोर्ट करते हुए वकील ने घरेलू हिंसा एक्ट से जुड़े दो अहम मामलों का ज़िक्र किया. पहला- सतीश चंद्र आहूजा बनाम स्नेहा आहूजा केस और दूसरा- एस वनीता बनाम डिप्टी कमिश्नर केस. आगे बढ़ने से पहले ये जान लीजिए कि किसी शादीशुदा महिला के लिए ‘शेयर्ड हाउस-होल्ड’ की बात घरेलू हिंसा एक्ट 2005 में कही गई है. कहा गया है कि अपने ससुराल पक्ष के घर में रहने का महिला का पूरा हक है. इसी एक्ट के इस प्रावधान के आधार पर बचाव पक्ष अपने तर्क रख रहा था.

Delhi High Court 444
दिल्ली हाई कोर्ट की तस्वीर. घरेलू हिंसा एक्ट के सहारे प्रॉपर्टी में हक पाने की कोशिश के मामले में अहम टिप्पणी की है.

खैर, इन तर्कों का विरोध आवेदनकर्ता के वकील ने किया. पहले तर्क के काउंटर में कहा कि वो प्रॉपर्टी जॉइंट फैमिली प्रॉपर्टी नहीं है और आवेदनकर्ता के नाम पर ही है. ‘शेयर्ड हाउस-होल्ड’ के तर्क पर कहा कि सतीश चंद्र आहूजा और एस वनीता का केस इस मामले में अप्लाई नहीं होता. चूंकि इन दोनों मामलों में पति और पत्नी के बीच विवाद था. महिला ने पति पर घरेलू हिंसा के आरोप लगाए थे. और मौजूदा मामले में पति-पत्नी एकसाथ हैं और दोनों मिलकर आवेदनकर्ता के खिलाफ खड़े हैं, यानी बेटा अपने पिता और बहू अपने ससुर के खिलाफ. पति-पत्नी के बीच कोई झगड़ा नहीं है और न ही पत्नी अपने पति के हाथों घरेलू हिंसा की शिकार हो रही है.

इन दलीलों को सुनने के बाद 24 अगस्त को हाई कोर्ट ने कहा-

“डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट एक सामाजिक कल्याण कानून है, जो घरेलू हिंसा का शिकार हुई औरतों को सुरक्षा देता है. परिवार के अंदर होने वाले सभी विवादों को घरेलू हिंसा एक्ट के तहत कंसिडर नहीं किया जा सकता. ऐसा नहीं होने दिया जाना चाहिए, क्योंकि इससे एक्ट के प्रावधानों का गलत इस्तेमाल होगा, परिवारों में उथल-पुथल मच जाएगी, खासतौर पर तब जब पति-पत्नी के बीच कोई वैवाहिक विवाद न हो. इस एक्ट के प्रावधानों का सहारा लेकर, पत्नी के रहने के अधिकार का सहारा लेकर, कोई बेटा अपने पिता की प्रॉपर्टी पर अधिकार नहीं जता सकता. प्रॉपर्टी के मालिकाना हक वाले सिविल मामले इस एक्ट में कन्वर्ट नहीं किए जा सकते. इस केस में बहू द्वारा किसी भी फोरम के सामने घरेलू हिंसा की कोई शिकायत नहीं दर्ज कराई गई. ये केस इससे एकदम उलट है. यहां तो पिता ने पुलिस के पास कई बार बेटा-बहू के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है. उन पर खराब बर्ताव और अब्यूज़ के आरोप लगाए थे. इस केस में पति-पत्नी एक-दूसरे से अलग भी नहीं हुए हैं, साथ ही रह रहे हैं. इसलिए सतीश चंद्र आहूजा और वनीता केस के फैक्ट्स इस केस से बिल्कुल अलग हैं.”

इसके साथ ही हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई भी दखलअंदाज़ी करने से मना कर दिया. और बचावपक्ष की अपील को खारिज कर दिया. हाई कोर्ट ने माना कि प्रॉपर्टी के मालिकाना हक को लेकर कोई विवाद नहीं होना चाहिए.

क्या है ‘शेयर्ड हाउस-होल्ड”?

ये था पूरा केस. लेकिन हमारी नज़र अटकी घरेलू हिंसा एक्ट 2005 के ‘शेयर्ड हाउस-होल्ड” वाले प्रावधान पर. क्या है ये प्रावधान, और मौजूदा केस में ये क्यों फिट नहीं बैठता. और एक शादीशुदा महिला को रेसिडेंस के लिए क्या अधिकार मिले हुए हैं? इसे ठीक से जानने के लिए हमारे साथी नीरज ने बात की एडवोकेट देविका गौर से. उन्होंने कहा-

“एस आर बत्रा वर्सेज तरुणा बत्रा के 2006 के जजमेंट की वजह से कई सारी ऐसी महिलाएं हैं, जिनको शेयर हाउस-होल्ड में रेसिडेंस का अधिकार नहीं मिलता था. इसी जजमेंट को 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने सतीश चंद्र आहूजा बनाम नेहा आहूजा में ओवररूल किया. और शेयर हाउस-होल्ड की परिभाषा को वाइड किया गया. वाइडर इसको करते हुए कहा गया कि शेयर हाउस होल्ड की परिभाषा में वो प्रॉपर्टी को कवर्ड होगी ही, जहां महिला कभी भी अपने डोमेस्टिक रिलेशनशिप के दौरान रिस्पॉन्डेंट के साथ या उसके बिना रही हो. उसके साथ-साथ वो प्रॉपर्टी या तो जॉइंट फैमिली प्रॉपर्टी हो, उसकी टेनेटिव परमिसेस हो, इससे फर्क नहीं पड़ता कि जॉइंट फैमिली प्रॉपर्टी में उस महिला का कोई हिस्सा है या नहीं है. या फिर वो प्रॉपर्टी किसी के भी नाम पर क्यों न हो, वो सारी प्रॉपर्टी शेयर्ड हाउस-होल्ड के अंदर कवर्ड होती है. डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट का सेक्शन 17 रेसिडेंस ऑर्डर की बात करता है. ये उन महिलाओं को दिया जाता है जिनको घर से बाहर निकाल दिया जाता है या उन्हें घर के अंदर रहने नहीं दिया जाता. ऐसे मामलों में महिला डोमेस्टिक वायलेंस केस के अंदर अपने रेसिडेंस के राइट्स की मांग कर सकती है. कॉन्फ्लिक्ट की सिचुएशन तब आती है, जब एक तरफ महिला के रेसिडेंस के अधिकार की बात की जाती है और वहीं दूसरी तरफ सीनियर सिटिज़न्स के अधिकारों की बात की जाती है. इसी मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट ने 2021 के अपने जजमेंट एस वनीता वर्सेज डिप्टी कमिश्नर में डिस्कस किया था. इसे एड्रेस करते हुए कहा था कि डीवी एक्ट के तहत महिला के रेसिडेंस के अधिकारों की जब भी बात आएगी और दूसरी तरफ जब सीनियर सिटिज़न्स के एक्ट की बात आएगी, तो हमेशा डीवी एक्ट प्रिवेल करेगा. किसी भी सीनियर सिटिज़न्स या किसी भी अदर एक्ट को. कारण ये कहा गया कि सिर्फ एक एविक्शन ऑर्डर बहू के खिलाफ ले लेने से, उसके रेसिडेंस के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता. इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने हार्मोनलाइज़ कंस्ट्रक्शन की भी बात की. कहा कि अगर एक तरफ सीनियर सिटिज़न्स की बात आए, तो उन्हें केवल बच्चों की मर्ज़ी पर छोड़ देना किसी भी तरह से सही नहीं है. इसलिए दोनों एक्ट्स को हार्मोनलाइज़्ड कंस्ट्रक्शन के ज़रिए ही बैलेंस किया जाना चाहिए. बहुत से मामलों में देखा गया है, जहां डीवी एक्ट के रेसिडेंस के अधिकार का मिसयूज़ किया जाता है. बेटा और बहू मिलकर अपने पैरेंट्स से प्रॉपर्टी को हड़पने के चक्कर में कई बार रेसिडेंस का हवाला देते हुए कहते हैं कि हमारा रेसिडेंस राइट है. पैरेंट्स से प्रॉपर्टी लेने के चक्कर में ऐसे केस कर ही देते हैं. तो दिल्ली हाई कोर्ट का हालिया जजमेंट इसी मामले को हाईलाइट करता है. क्योंकि इस केस में ससुर के खिलाफ घरेलू हिंसा का एक भी कानूनी केस नहीं था. इसके अंदर घरेलू हिंसा की कहीं से कोई भी बात नहीं की गई थी. जो ससुर थे, उन्हें बड़ी बुरी हालत में छोड़ दिया गया था. इसलिए सतीश चंद्र आहूजा का केस इस हालत में फिट नहीं बैठता.”

Adoption Process In India (5)
देविका, एडवोकेट

इस केस में एक अहम सवाल उठता है बच्चों के प्रॉपर्टी राइट्स को लेकर. बच्चों को उनके पिता या माता की प्रॉपर्टी में किस तरह के अधिकार मिले हुए हैं? ये जानना भी बेहद ज़रूरी है, इसका जवाब भी हमें दिया देविका ने. वो कहती हैं-

“बच्चों को अपने पैरेंट्स की प्रॉपर्टी में दो तरह से हक मिलता है. पहली बात करते प्रॉपर्टी की. ये दो तरह की होती हैं, पहला एनसेस्टर प्रॉपर्टी. दूसरा- सेल्फ एक्वायर प्रॉपर्टी. एनसेस्टर वो जो आपको पीढ़ी दर पीढ़ी मिलती चली आ रही है. और सेल्फ एक्वायर प्रॉपर्टी होती है इंसान की खुद की कमाई हुई संपत्ति. किसी भी बेटे या बेटी का हक हिंदू सक्सेशन एक्ट के 2005 के संशोधन के बाद एनसेस्टर प्रॉपर्टी में बराबर होता है. एनसेस्टर प्रॉपर्टी अगर बेटा या बेटी चाहे तो वो अपने पिता के लाइफटाइम में भी मांग सकते हैं. ये कानूनी अधिकार जन्म से मिला होता है. वहीं दूसरी तरफ सेल्फ एक्वायर प्रॉपर्टी में अगर पिता ने खुद कमाई की है, तो पिता का अपना हक है कि वो प्रॉपर्टी किसे देता है. वो अपनी विल बनाकर चाहे तो बेटे को या बेटी को बराबरी से दे सकता है. या किसी एक को दे सकता है. या दोनों को ही न देकर किसी तीसरे व्यक्ति को भी दे सकता है.”

इस केस में सतीश चंद्र केस और वनीता मामले का ज़िक्र हुआ था. दोनों बताते हैं. सतीश चंद्र मामले में एक महिला और उसके पति के बीच विवाद चल रहा था. महिला ने अपने पति पर घरेलू हिंसा के आरोप लगाए थे. हिंदू मैरिज एक्ट 1955 के तहत तलाक की याचिका भी डाल रखी थी. महिला के खिलाफ उसके ससुर ने इनजंक्शन की मांग करते हुए आवेदन डाला था. वहीं महिला का कहना था कि ‘शेयर्ड हाउस-होल्ड’ के तौर पर उसे अपने सास-ससुर के घर पर रहने दिया जाए. उसका कहना था कि घरेलू हिंसा एक्ट उसे ये अधिकार देती है. मामला ट्रायल कोर्ट, हाई कोर्ट होता हुआ सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था. अक्टूबर 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा-

“डीवी एक्ट के सेक्शन 2(s) के तहत ‘शेयर्ड हाउस-होल्ड’ की एक संपूर्ण परिभाषा है. शेयर्ड हाउस-होल्ड पति के किसी भी रिश्तेदार का हो सकता है, जिनके साथ महिला कभी न कभी रही हो. डीवी एक्ट के सेक्शन 19 के तहत महिला को जो राइट टू रेसिडेंस मिला है, वो अजेय अधिकार नहीं है, इसलिए कोर्ट को दोनों पक्षों के अधिकारों को बैलेंस रखना है.”

यानी सुप्रीम कोर्ट ने महिला को सास-ससुर के घर पर “शेयर्ड हाउस-होल्ड” प्रावधान के तहत रहने की परमिशन दी थी, हालांकि ये भी कहा था कि ये अधिकार अजेय नहीं है. माने आगे चलकर इस अधिकार को खत्म भी किया जा सकता है.

अब बताते हैं वनीता केस के बारे में. इस केस में एक महिला और उसके सास-ससुर के बीच विवाद था. महिला के सास-ससुर ने सीनियर सिटिज़न एक्ट के तहत एक आवेदन डाला था, और अपनी बहू और पोती से घर खाली करने को कहा था. इस पर अधिकारियों ने भी बहू और पोती से घर खाली करवाया था. मामला कर्नाटक हाई कोर्ट पहुंचा, कोर्ट ने प्रशासन के आदेश को सही माना. फिर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो कोर्ट ने कहा कि सीनियर सिटिज़न के अधिकारों की रक्षा तो ज़रूरी है, लेकिन साथ में घरेलू हिंसा एक्ट के तहत महिला के ‘शेयर्ड हाउस-होल्ड’ के अधिकार को भी इग्नोर नहीं किया जा सकता. इसके बाद कोर्ट ने महिला को घर से निकालने के आदेश पर एक साल के लिए रोक लगा दी थी.


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