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जिन केके शैलजा के दम पर केरल ने पूरी दुनिया में वाहवाही लूटी, उन्हें कैबिनेट से क्यों हटाया?

पिछले साल जब पहली बार कोरोना ने भारत के दरवाज़े पर दस्तक दी थी, तब हमें इस वायरस के बारे में कुछ भी नहीं पता था. केंद्र और राज्य की सरकारें अपने-अपने तरीके से इससे लड़ रही थीं. हर राज्य की हेल्थ मिनिस्ट्री के ऊपर ज़िम्मा था कि किसी भी तरह इस वायरस को फैलने से रोका जाए. इसके बाद सभी हेल्थ मिनिस्टर्स में से एक ऐसा नाम कुछ ही महीनों में निकलकर सामने आया, जिसकी जमकर तारीफ हुई. न केवल भारत में,बल्कि इंटरनेशनल लेवल पर भी. वो नाम था के.के शैलजा, जिन्हें कई लोग शैलजा टीचर भी कहते हैं. ये केरल की हेल्थ मिनिस्टर थीं. अब एक बार फिर ये नाम खबरों में है. क्योंकि केरल की नई सरकार के कैबिनेट में इन्हें जगह नहीं दी गई है. इसके बाद ज़ाहिर है, सवाल उठने ही थे. तो ऐसा ही हो रहा है. लोग पूछ रहे हैं कि ऐसा क्यों किया गया? इसका जवाब हम जानने की कोशिश करेंगे.

पहले चुनाव के नतीजे जानिए

अप्रैल में केरल की 140 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव हुए थे. 2 मई को नतीजे आए. LDF यानी लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट ने शानदार जीत पाई. 99 सीटों पर कब्ज़ा जमा लिया, और UDF यानी युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट 41 सीटों पर ही सिमट कर रह गई. अगर सभी उम्मीदवारों की बात करें तो के.के. शैलजा को सबसे बड़ी जीत मिली. उन्होंने 60 हज़ार से भी ज्यादा वोटों के अंतर से कन्नूर ज़िले की मत्तान्नूर विधानसभा सीट को अपने नाम कर लिया. इतनी बड़ी जीत ने साबित कर दिया कि शैलजा केरल की बहुत ही पॉपुलर लीडर हैं. और इसी के साथ ही केरल में बरसों से चली आ रही प्रथा भी टूटी. होता ये था कि एक बार LDF की सरकार बनती थी, तो अगली बार UDF की. अभी पिछले टर्म में सत्ता में थी LDF, लेकिन इस बार के चुनाव में ये प्रथा टूटी और LDF को ही बहुमत मिला. जीत के बाद सीएम पिनरई विजयन ने कहा-

“ये ऐतिहासिक जीत LDF सरकार के पांच साल के काम का नतीजा है. ये लोगों की जीत है. उन्होंने हम पर भरोसा जताया. उन्होंने सरकार द्वारा लिए गए फैसलों और नीतियों पर भरोसा जताया.”

K K Shailaja 2
शैलजा के काम की दुनियाभर में तारीफ हुई थी.

शैलजा ने क्या काम किया था?

जिन पांच साल के कामकाज की बात विजयन ने की, उस दौरान केरल में बाढ़ आई, सरकार उस दौरान जनता के साथ खड़ी रही. हर तरह की मदद मुहैया कराई, जो कि अच्छी बात है. इसी दौरान केरल ने दो वायरस का जानलेवा हमला भी देखा. पहला निपाह वायरस, दूसरा कोरोना वायरस. निपाह वायरस का कहर साल 2018 में आया था. हेल्थ मिनिस्टर शैलजा ही थीं. उन्होंने फटाफट इससे निपटने की रणनीति बनाई और इस संकट को हराया. फिर आया कोरोना वायरस. इस दौरान शैलजा ने ‘टेस्ट, ट्रैक और ट्रेस’ का फंडा अपनाते हुए इस वायरस से निपटने की भी पुरज़ोर कोशिश की. और पहली वेव के दौरान काफी हद तक उन्हें सफलता भी मिल गई. वो भी तब जब भारत में कोरोना का पहला केस केरल के ही एक व्यक्ति के अंदर मिला था. हफिंगटन पोस्ट में एक इंटरव्यू के दौरान शैलजा ने कहा था-

“मैंने वायरस से निपटने के लिए वैज्ञानिक और एक्सपर्ट्स के बताए रास्ते पर काम किया, उन लोगों के रास्तों पर नहीं जो गाय के गोबर और पेशाब को इलाज बता रहे थे.”

शैलजा की कोरोना के खिलाफ स्ट्रैटजी काफी प्रभावी रही. इतनी कि उन्हें सितंबर 2020 में COVID-19 के समय में दुनिया के टॉप थिंकर्स में पहला नंबर दिया गया. शैलजा ने पब्लिक हेल्थ सेंटर में काफी काम किया. जहां कोरोना की दूसरी वेव के दौरान पूरे देश में ऑक्सीजन की किल्लत हो रही थी, केरल में स्थिति ऐसी नहीं थी. मई 2020 में ही शैलजा ने इंडस्ट्रीज़ मिनिस्ट्री के साथ बात करके पलक्कड़ ज़िले में ऑक्सीजन प्लांट खोलने का फैसला किया था, जो दूसरी वेव के दौरान एक ब्लेसिंग साबित हुआ.

शैलजा का जन्म एक कम्युनिस्ट परिवार में ही हुआ था. कॉलेज की पढ़ाई पूरी करके एक स्कूल में शैलजा फिज़िक्स पढ़ाने लगी. लेकिन साथ ही साथ राजनीति में भी एक्टिव थीं. ‘द न्यूज़ मिनट’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1996 में उन्होंने पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा था, विधायक बनने के बाद उन्होंने स्कूल से छुट्टी ले ली. फिर साल 2004 में पूरी तरह से टीचिंग की फील्ड से रिटायर हो गईं. तब शैलजा ने कहा था कि पार्टी चाहती थी कि वो पूरी तरह से पार्टी के काम में ध्यान दें. 2006 में भी शैलजा ने चुनाव लड़ा, जीत मिली. 2011 में कांग्रेस के उम्मीदवार से हार गईं. 2016 में कुथुपाराम्बा सीट से CPI(M) के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत मिली, उसके बाद उन्हें बनाया गया राज्य का हेल्थ मिनिस्टर. मुख्यमंत्री बने पिनरई विजयन.

जो वादा किया वो भूल ही गए!

अब हेल्थ मिनिस्टर रहते हुए शैलजा ने किस तरह काम किया, ये तो हमने आपको पहले ही बता दिया है. दूसरा, ये भी बता दिया है कि विजयन ने हालिया जीत का क्रेडिट अपनी सरकार और उसके कामकाज को दिया था. तीसरी बात, जो हमने आपको अब तक नहीं बताई है, वो ये कि इस बार LDF ने चुनावी लड़ाई के दौरान अपील की थी कि कन्टिन्युटी के लिए वोट दिया जाए. केरल की जनता ने अपने सीएम की बात मानी, और उनके गठबंधन को भारी मतों से जीत दिलाई. ज़ाहिर है जनता अपने सरकार के कामकाज से खुश थी. शैलजा को भी बड़ी जीत दिलाकर जनता ने साबित कर दिया था कि वो अपने हेल्थ मिनिस्टर से भी संतुष्ट हैं. लोगों को पूरा विश्वास था कि शैलजा ही दोबारा हेल्थ मिनिस्टर बनेंगी. लेकिन बैम… ऐसा नहीं हुआ. CPI(M) ने LDF की सरकार का पूरा नक्शा ही बदल दिया. सारे पुराने मंत्रियों को हटा दिया गया, उनकी जगह नए लोगों को शामिल किया गया. हालांकि सीएम इस बार भी पिनरई विजयन ही बने. अभी कुछ देर पहले ही उन्होंने सीएम पद की शपथ ली.

नई कैबिनेट में हेल्थ मिनिस्टर बनाई गईं वीना जॉर्ज. साथ ही कैबिनेट में DYFI के नेशनल प्रेसिडेंट और विजयन की बेटी के पति मोहम्मद रियास को भी जगह दी गई. पार्टी सचिव की पत्नी आर. बिंदु को भी शामिल किया गया. और शैलजा को कैबिनेट में जगह न देकर पार्टी की चीफ व्हीप बना दिया.

सवाल उठता है कि ऐसा क्यों किया गया? तो इसका जवाब पिनरई विजयन ने दिया, ऐसा जवाब जो कतई हजम नहीं हो रहा. उन्होंने कहा-

“ये पार्टी का फैसला था कि किसी भी मंत्री को लगातार दो टर्म के लिए मंत्री पद न दिया जाए. इसी पॉलिसी के आधार पर शैलजा को कैबिनेट में शामिल नहीं किया गया. एक व्यक्ति के लिए अपवाद कायम नहीं किया जा सकता, क्योंकि और भी मंत्री हैं, जिन्होंने पिछली सरकार में अच्छा काम किया था.”

पार्टी के फैसले पर ‘द हिंदू’ से पार्टी के जनरल सेक्रेटरी सीताराम येचुरी ने कहा-

“CPI(M) के विधायक औऱ कैबिनेट को बनाने को लेकर जो फैसले होते हैं वो पार्टी की स्टेट कमिटी करती है. स्टेट कमिटी ने ही ये फैसला किया है.”

CPI(M) की बड़ी नेता बृंदा करात से भी हमने इस फैसले पर बात करने की कोशिश की. हमने पूछा कि शैलजा को दोबारा कैबिनेट में न लेने का फैसला क्यों लिया गया? इस पर बृंदा करात ने कहा-

“मैं इस टॉपिक पर कुछ नहीं कहना चाहती.”

हालांकि ‘द हिंदू’ को दिए एक स्टेटमेंट में उन्होंने कहा था-

“हमारी पार्टी में मंत्री चुनने का विशेषाधिकार स्टेट कमिटी के पास होता है. और उनके फैसले पर जो सवाल उठ रहे हैं, उसके जवाब वो ही देंगे.”

हमने CPI(M) नेता सुभाषिनी अली से भी बात करनी चाही. उन्होंने भी यही जवाब दिया कि ये फैसला पार्टी स्टेट कमिटी का है, और वो इस पर कुछ नहीं कह सकतीं. यानी CPI(M) के जितने भी बड़े नेता हैं, वो सारा ज़िम्मा पार्टी स्टेट कमिटी पर डाल दे रहे हैं.

लेफ्ट की दूसरी पार्टी के नेता क्या कहते हैं?

लेकिन लेफ्ट की दूसरी पार्टी के कुछ नेता ऐसे हैं, जिन्हें ये फैसला सही नहीं लग रहा है. हमने बात की CPI लीडर एनी राजा से. उन्होंने कहा-

“मैं चाहती थी कि शैलजा को हेल्थ मिनिस्टर न बनाकर होम मिनिस्टर बनाया जाए. कोई और बड़ा विभाग दिया जाए. क्योंकि उन्होंने पिछले टर्म में अपनी ज़िम्मेदारी बखूबी निभाई थी. लेकिन CPM के फैसले से मैं बहुत हैरान हूं.”

CPI(ML) पार्टी की नेता कविता कृष्णन ने भी इस फैसले से हैरानी जताई है. उन्होंने कहा-

“बड़ा सवाल ये बनता है कि जब इतनी बड़ी महामारी है, उस दौरान किसी ने इतना कुशल काम किया है हेल्थ मिनिस्टर रहते हुए, तो जब महामारी खत्म नहीं हुई तो बीच रास्ते में उन्हें बदलना क्या सही है? वो भी तब जब आपकी सरकार ही कन्टिन्यू कर रही है. आपने तो चुनाव में वोट मांगते हुए कन्टिन्युटी का नारा भी दिया था. ये कि आप दोबारा हमारी सरकार को चुनकर लाइए. तो केरल की जो पब्लिक वोट दे रही थी, क्या उसे नहीं लगा कि चीफ मिनिस्टर वही मिलेगा, शैलजा जैसी हेल्थ मिनिस्टर मिलेगी. हम इन्हें चुन रहे हैं. तो एक तरह से उस जनादेश के साथ भी मेल नहीं खाता है. लोगों के वोट, उनकी उम्मीद के साथ ये फैसला मेल नहीं खाता. और ये शायद से पब्लिक हेल्थ के लिहाज़ से भी अच्छा फैसला नहीं है.”

Kavita

इस पूरी बहस की सबसे ज़रूरी कड़ी हैं शैलजा. उन्होंने इस फैसले को एक्सेप्ट कर लिया है. ‘TOI’ की रिपोर्ट के मुताबिक, वो कहती हैं-

“भावुक होने की कोई ज़रूरत नहीं है. मैं पहले मंत्री बनी थी क्योंकि पार्टी का फैसला था. मैंने जो भी किया उससे मैं पूरी तरह से संतुष्ट हूं. मुझे विश्वास है कि नई टीम मेरे से भी अच्छा प्रदर्शन देगी.”

शैलजा के जाने से सोशल मीडिया पर लोग कई तरह के सवाल उठा रहे हैं. लोग पूछ रहे हैं कि अगर पूरी कैबिनेट ही बदलना था तो पिनरई विजयन को क्यों नहीं बदला गया, वो भी तो कैबिनेट का हिस्सा हैं, और पिछले टर्म में अपनी सेवा दे सकते हैं. तो अगर उन्हें अपवाद बनाया जा सकता है, तो शैलजा को क्यों नहीं. इसके साथ ही पार्टी के ऊपर पितृसत्तात्मक होने के आरोप भी लग रहे हैं. वैसे गाहे-बगाहे लेफ्ट विंग की पॉलिटिकल पार्टी के ऊपर ये एलिगेशन्स लगते ही रहे हैं. लेफ्ट पार्टीज़ लैंगिक समानता की बात करती तो दिखती है, लेकिन उनकी पार्टी के अंदर ही ये समानता नज़र नहीं आती. पार्टीज़ के टॉप लेवल के नेताओं में महिलाओं की संख्या बेहद कम है. दूसरा, चुनाव में महिलाओं को टिकट देने की ही दर काफी कम है. CPI(M), जो एक बड़ी लेफ्ट पार्टी है, उसके पोलिट ब्यूरो में पहली महिला सदस्य 2005 में बनी थी. पोलिट ब्यूरो पार्टी का सबसे ऊंची एग्जिक्यूटिव बॉडी होती है. ये सदस्य थीं बृंदा करात. इन आरोपों पर हमने बात की कविता कृष्णन ने, उन्होंने कहा-

“भारत में कोई भी राजनीतिक फॉर्मेशन ऐसा नहीं है, जहां पर पितृसत्ता न हो. सवाल ये है कि उस पितृसत्ता के खिलाफ आप लड़ रहे हैं या नहीं? वहां पर एक वामपंथी होने के नाते मेरा कहना है कि मैं वामपंथी पार्टियों से ज्यादा उम्मीद करूंगी, कम नहीं. मैं ये नहीं कहूंगी कि देखिए दूसरी पार्टियों की स्थिति ऐसी है, इसलिए मेरी पार्टी में भी ऐसा हो तो चलेगा. अगर मेरी ही पार्टी में महिला नेता कम हैं, कहीं पर हमारे विधायक बने हैं 12, तो उन विधायकों में कोई महिला नहीं है, तो मैं तो सबसे पहली व्यक्ति होंगी कहने वाली कि ये बदले. मैं चाहती हूं कि ये बदले. मैं इससे संतुष्ट नहीं हूं. मैं चाहती हूं कि स्थितियां बदले.”

इस मुद्दे पर एनी राजा कहती हैं कि सभी पार्टियों को इस दिशा की तरफ काम करने की ज़रूरत है. ज्यादा से ज्यादा औरतों को शीर्ष स्थान दिया जाए. चुनाव में भी ज्यादा से ज्यादा औरतों को उतारा जाएं. हालांकि एनी ये भी कहती हैं कि लेफ्ट की पार्टियां इस दिशा की तरफ काम कर रही हैं. जैसे शुरुआत में केरल में केवल एक महिला मंत्री थीं, पिछली सरकार में ये संख्या दो रही और अब तीन महिलाओं को मंत्री पद दिया जा रहा है. इसी मुद्दे पर हमने बात की सीनियर जर्नलिस्ट विकास पाठक से. उन्होंने कहा-

“ये ऐसा समाज है कि पेट्रियार्की एक सिस्टमिक प्रॉब्लम है. कोई व्यक्ति अगर बहुत ज्यादा कोशिश करे तो शायद पेट्रियार्कल न रहे. लेकिन ऐसी कोई गाड़ी नहीं है, जिस पर बैठकर पेट्रियार्की आपकी कैंसिल हो जाएगी. तो अगर किसी को लगता है कि CPM वो वाहन है, जिस पर आप बैठ जाएंगे तो पेट्रियार्की खत्म हो जाएगी, तो ऐसा संभव नहीं है. लेफ्ट के विज़िबल लोगों का बौद्धिक स्तर काफी अच्छा है. लेकिन पेट्रियार्की रेशनल माइंड की प्रॉब्लम नहीं है. सिस्टमिक प्रॉब्लम है, जो इमोशन से आती है. तर्क करके आप इसकी आलोचना कर सकते हैं, लेकिन उसे खत्म कर देंगे, उसकी गारंटी नहीं है. CPM दावा करती है कि वो कम पेट्रियार्कल है, तो वो दावा आपके एक्शन में दिखने चाहिए, केवल बयानों में नहीं.”

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पितृसत्तात्मकता हमारे देश के अंदर बहुत गहरी जड़ बनाकर बैठा हुआ है. लेफ्ट विंग की पार्टियां दावा करती हैं कि वो प्रोग्रेसिव हैं, इसलिए उनसे उम्मीद भी की जाती है कि वहां तो कम से कम महिलाओं के साथ समान बर्ताव होगा. लेकिन आंकड़े दुखी करते हैं. ये जान लीजिए कि केरल लेफ्ट का गढ़ है. और वहां इस बार पहली बार महिला विधायकों की संख्या डबल डिजिट में आई है. इस बार केरल में 11 औरतें विधायक चुनी गई हैं. और जब से राज्य बना है, वहां से केवल 9 औरतों ने संसद के दोनों सदनों में चुनकर गई हैं.

शैलजा को पार्टी ने हटाने का फैसला क्यों लिया, ये तो पार्टी ही जाने और उसके आलाकमान जानें. लेकिन जनता ये कह रही है कि शैलजा के साथ वही हुआ जो के.आर. गौरी अम्मा के साथ हुआ था. गौरी अम्मा लेफ्ट की एक बड़ी महिला नेता थीं. ‘द क्विंट’ की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 1987 में लेफ्ट ने उन्हें सीएम के उम्मीदवार के तौर पर प्रोजेक्ट करते हुए चुनाव लड़ा था. लेफ्ट ने चुनाव जीत लिया. लेकिन गौरी को सीएम नहीं बनाया गया, बल्कि उन्हें तो पार्टी से बाहर ही कर दिया गया. उन्हें आज भी ‘वो बेस्ट सीएम, जिसे केरल कभी नहीं पा सका’ कहा जाता है. शैलजा को भी उनसे कम्पेयर किया जा रहा है.


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