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कोरोना ड्यूटी करने वाली महिला पुलिसकर्मियों का ये रूप कभी ना देखा होगा!

कोरोना वायरस से जंग में एक तरफ जहां आम लोग घरों में रहकर अपना योगदान दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग ऐसे हैं जो बाहर जाकर अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं. इन लोगों को फ्रंटलाइन वर्कर्स कहा जाता है. इनमें पुलिसकर्मी भी शामिल हैं. महिला पुलिसकर्मी भी इस जंग में कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हैं. लेकिन पुरुषों के मुकाबले उनकी समस्याएं अधिक हैं. क्या हैं ये समस्याएं? उन्हें किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है? कोरोना काल में महिला पुलिसकर्मी खुद को किस तरह से मोटिवेट रखती हैं? ऐसे कौन से लम्हे रहे, जो उनके लिए काफी इमोशनल साबित हुए. ऐसे कौन से मंजर रहे, जो शायद वे ताउम्र ना भूल पाएं. इन सभी पहलुओं पर बात करेंगे इस आलेख में.

कोरोना वायरस का बढ़ता हुआ खतरा

कोरोना वायरस ने देश की जो दुर्गति कर रखी है, उसके बारे में तो आप सबको पता ही है. रोज लाखों मामले आ रहे हैं. हजारों लोग मारे जा रहे हैं. यह कहना अमानवीय होगा, लेकिन सच्चाई यही है कि लोग कीड़े-मकौड़ों की तरह मर रहे हैं. नदियों में लाशें बहाई जा रही हैं. और फिर उन लाशों पर प्रशासनिक विवाद हो रहा है कि लाशें इस जिले की नहीं, उस जिले की हैं. कुल मिलाकर इन परिस्थितियों पर ज्यादा कुछ कहने सुनने को बचा नहीं है.

संकट का दौर है. सरकारों और प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिए हैं. लोग बस इंतजार कर रहे हैं कि कैसे भी करके ये दूसरी लहर खत्म हो जाए. टीकाकरण ने रफ्तार नहीं पकड़ी है. ऐसे में खुद की सावधानी ही सबसे बड़ा बचाव है. इस सावधानी में एक पहलू घर पर भी रहना है. देश में ज्यादातर जगहों पर लॉकडाउन लगा हुआ है. आम लोग घर पर सुरक्षित रहें, इसलिए कई लोग बाहर हैं. बाहर रहकर ड्यूटी करने में एक बड़ा खतरा है. बीमार होने के खतरे के साथ-साथ मानसिक तनाव का भी. और इसमें भी अगर आपके पास अपनी ड्यूटी के अलावा घर के कामकाज का भी बोझ हो, तो तनाव का अंदाजा लगाया जा सकता है. खासकर महिला पुलिसकर्मियों के संबंध में.

महिला पुलिसकर्मियों के सामने चुनौतियां

एक महिला पुलिसकर्मी को किन-किन चुनौतियों और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. इसे समझने के लिए हमने ग्वालियर की एडिशनल SP सुमन गुर्जर से बात की. उन्होंने हमें बताया-

“महिलाओं के ऊपर परिवार की जिम्मेदारी होती है. ड्यूटी के बाद इन जिम्मेदारियों को निभाना पड़ता है. एक ऑफिसर के तौर पर इस समय काफी सावधानी बरतनी पड़ रही है. घर में अलग रहना पड़ता है. बच्चों को अपने साथ तक नहीं सुला पाती. बहुत सावधानी बरतनी पड़ती है.”

एक महिला पुलिसकर्मी सबसे पहले एक इंसान है. उसके अंदर भी भावनाएं हैं. और कोविड के दौरान लोगों को रोता-बिलखता देख वे भी दुखी हो जाती हैं. किसी की मदद करने के बाद उन्हें भी आत्मसंतुष्टि होती है. इमोशनल महसूस होता है. ऐसे की अनुभवों के बारे भी सुमन गुर्जर ने हमें बताया-

“हर दिन ऐसी घटनाएं होती हैं, जिन्हें हम भूल नहीं पाते. कई बार लॉकडाउन का पालन कराने के लिए ठेले वालों और ऑटो वालों को हटाना पड़ता है. वो बड़े मजबूर होकर बताते हैं कि आज कोई कमाई नहीं हुई. तब बुरा लगता है. मैं तो शाम में अपने बच्चों से मिल लेती हूं. लेकिन कुछ ऐसी भी मांएं हैं, जो बीमार पड़ गईं और कई-कई हफ्तों तक अपने बच्चों से नहीं मिल पाईं. उनके बारे में सोचकर भी दुख होता है.”

सुमन गुर्जर ने यह भी बताया कि लॉकडाउन का पालन कराने में काफी कठिनाई का सामना करना पड़ता है. उन्होंने उस लम्हे के बारे में भी बताया, जिसे वे ताउम्र भूल नहीं पाएंगी. सुमन ने बताया कि पिछले दिनों ऑक्सीजन की किल्लत हो गई थी. मरीज और डॉक्टर हमसे ऑक्सीजन की मांग करते थे. ऐसे में उन्होंने अपनी टीम के साथ मिलकर ऑक्सीजन का इंतजाम किया. मरीजों और डॉक्टरों ने उन्हें बार-बार धन्यवाद दिया. यह सब देखकर उनकी आंखों में आंसू आ गए. इस घटना को वे अपनी जिंदगी में कभी नहीं भूल पाएंगी.

सुमन गुर्जर, एडिशनल एसपी ग्वालियर.
सुमन गुर्जर, एडिशनल एसपी ग्वालियर.

एक ऐसे वक्त में जब शारीरिक तनाव के साथ-साथ मानसिक तनाव भी बहुत ज्यादा बढ़ गया है, महिला पुलिसकर्मी खुद को किस तरह से मोटिवेट रखती हैं? इस सवाल का जवाब भी हमें सुमन गुर्जर ने दिया. उन्होंने कहा कि वे पुलिस में भर्ती ही इसलिए हुई हैं ताकि लोगों की सेवा कर सकें. पुलिस की नौकरी में तो हमेशा से रिस्क फैक्टर होता है. कभी हम एनकाउंटर में जाते हैं तो अब महामारी में अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं. इस दौरान लोग हमें प्रोत्साहित भी कर रहे हैं. आम लोगों के मुकाबले भी हमारे पास ज्यादा सुरक्षा है. इन्हीं सब बातों से मोटिवेशन मिलती है.

इन्हीं सवालों के जवाब हमने इंदौर की एडिशनल एसपी मनीषा पाठक सोनी से मांगे. उन्होंने हमें बताया-

“सबसे बड़ी चुनौती तो लोगों को संभालने की है. लगभग हर आदमी इस समय तनाव में है. किसी की नौकरी चली गई है. किसी के परिजन की डेथ हो गई है. ऐसे में लोगों को लॉकडाउन का पालन करने के लिए समझाना काफी चुनौतीपूर्ण होता है. बाकी रही मोटिवेशन की बात तो वो अपने सीनियर और जूनियर अधिकारियों को काम करते हुए देखने से मिलता है. कुछ संस्थाएं ऐसी भी हैं, जिनके लोग बिना किसी मेहनताने के ड्यूटी कर रहे हैं. उन्हें देखकर भी लगता है कि हां मेरी भी एक जिम्मेदारी है और उसे अच्छे से निभाना है.”

मनीषा पाठक सोनी ने अपनी जूनियर कर्मियों की मुश्किलों के बारे में भी बताया. यह भी बताया कि वे किस तरह से समाधान करती हैं.

“इंदौर की ज्यादातर जूनियर महिला पुलिसकर्मी मेरे ही पास आती हैं. कोरोना काल में उन्हें समस्या तो होती है. ड्यूटी कई बार लंबी हो जाती है. उनके बच्चों को संभालने वाला कोई नहीं होता. ऐसे में इन समस्याओं के समाधान के लिए बीच का रास्ता निकाला जाता है. यह नहीं कि सबको छुट्टी दे दी जाए. किसी की पोस्टिंग उसके घर के पास कर दी. या कभी किसी को जल्दी छुट्टी दे दी. इस तरह से समाधान निकल आता है.”

इसी तरह की कुछ बातें हमें दंतेवाड़ा की डीएसपी शिल्पा साहू ने भी बताईं. उन्होंने बताया कि महिलाओं को परिवार की जिम्मेदारी भी निभानी पड़ती हैं. ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती खुद सुरक्षित रहना है. क्योंकि घर पर बाकी के लोग भी हैं. उन्होंने यह भी बताया कि ड्यूटी के दौरान वे कई बार इमोशनल हुईं. खासकर जब कोई व्यक्ति इलाज के अभाव में मर गया या उनके स्टाफ में किसी की मृत्यु हो गई.

इन सभी महिला पुलिस अधिकारियों ने लोगों से सावधानी बरतने के लिए भी कहा. खासकर मास्क पहनने और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने को लेकर. आखिर में यही कि इस महामारी के खिलाफ लड़ाई में हम सभी को अपना रोल अदा करना है. हममें से ज्यादातर लोग कर भी रहे हैं. कुछ लोग एकदम फ्रंटलाइन पर हैं. हमें कोशिश करनी चाहिए कि अपने व्यवहार से हम उनकी मदद कर सकें. बेवजह घर से बाहर ना निकलें. उनके लिए और परेशानियां ना खड़ी करें.


 

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