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कोरोना वायरस से बचने के लिए औरतों को बुर्के और घूंघट नहीं, दिमाग का इस्तेमाल करना है

नॉवेल कोरोना वायरस यानी COVID -19 को लेकर सोशल मीडिया पर कई पोस्ट्स चल रही हैं. इससे जुड़ी जानकारी के साथ-साथ फेक न्यूज और सलाहें भी चलाई जा रही हैं. इसी लिस्ट में एक पोस्ट ऐसी भी है जिसमें ये दावा किया जा रहा है कि घूंघट और बुर्का एक तरह के एंटी वायरस मास्क ही थे. जिनको त्यागने से इतनी बड़ी महामारी और फ़ैल गई.

कुछ पोस्ट्स आप यहां देख सकते हैं:

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फेसबुक, ट्विटर, और वॉट्सऐप पर इस तरह के फॉरवर्ड्स चल रहे हैं. (तस्वीर: ट्विटर)
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सिर्फ घूंघट ही नहीं, बुर्के को लेकर भी इसी तरह की बातें कही जा रही हैं. (तस्वीर: ट्विटर)

तो क्या घूंघट/बुर्का और मास्क एक चीज़ हैं?

सीधा जवाब. नहीं. स्पेशल मास्क साइंटिफिक तरीके से बनाए जाते हैं. इनमें कई परतें होती हैं, जिनसे छनकर वायरस और बैक्टेरिया मुंह/नाक तक नहीं पहुंच पाते. इसके बजाए घूंघट/बुर्का कपड़े की एक हल्की सी परत होते हैं, जिनसे धूल/धूप से बचाव भले हो जाए, वायरस और बैक्टेरिया से बचाव लगभग नामुमकिन है.

मास्क कई तरह के होते हैं. लेकिन अमूमन सबसे ज्यादा दो तरह के मास्क देखने को मिलते हैं. एक है सर्जिकल मास्क, और एक है N95 मास्क. FDA (फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन, अमेरिका की मुख्य संस्था जो दवाओं और मेडिकल चीज़ों को रेगुलेट करती है) के अनुसार,

सर्जिकल मास्क मुंह पर पड़ने वाले छींटों या बड़ी बूंदों को रोक सकते हैं, लेकिन खांसी, छींक से उड़कर आने वाले बेहद छोटे कण वो नहीं रोक सकते. कीटाणुओं और दूसरे संक्रमण वाले कारकों से भी ये आपको पूरी सुरक्षा नहीं दे सकते. ये पूरी तरह आपके चेहरे पर फिट भी नहीं बैठते. इनका इस्तेमाल अधिकतर डॉक्टर करते हैं, ताकि सर्जरी और दूसरे संवेदनशील प्रक्रियाओं के दौरान वो पेशेंट को इन्फेक्ट न करें, या उससे कोई इन्फेक्शन न पकड़ लें.

Masks Business Insider
बाईं तरफ सर्जिकल मास्क, दाईं तरफ N95 मास्क. (तस्वीर: business insider)

वहीं N95 रेस्पिरेटर हवा में मौजूद 95 फीसद कणों को फ़िल्टर कर देता है. अगर इसे ढंग से पहना जाए तो ये फेस मास्क से बेहतर सुरक्षा देता है. लेकिन बच्चों और दाढ़ी-मूंछ रखने वाले लोगों के लिए ये पूरी तरह काम नहीं करता. इसलिए उनके लिए अलग मास्क आते हैं. इनके अलावा अगर आप दूसरे मास्क्स के बारे में जानकारी चाहते हैं तो यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं.

अब जरूरी बात

आपके पास इस तरह के ट्वीट, पोस्ट या मैसेज आएं तो उनपर सवाल जरूर उठाएं. आप अपनी परम्पराओं और कल्चर से प्रेम करते हैं, इसका फायदा फेक न्यूज़ फैलाने वाले इसी तरह उठाते हैं. परंपरा की आड़ में. जरूरी सवाल जो ऐसी पोस्ट से उठते हैं:

1. औरतें घूंघट/बुर्का करती हैं. पुरुष नहीं. तो क्या परंपरा ने सारी प्रोटेक्शन औरतों के हिस्से दे दी? पुरुषों को खुला छोड़ दिया? कि जाओ लड़ो दुनिया भर के वायरसों और बैक्टेरिया से? जबकि पहले के ज़माने में तो पुरुष ही बाहर निकलते थे. बीमारियां कैच करने का ज्यादा चांस था उन्हें.

2. परम्पराएं तो हमें नहाना-धोना और साफ़ रखना भी सिखाती हैं. फिर बार-बार उसी परंपरा का जिक्र क्यों किया जाता है जिसका बोझ औरत को अपना चेहरा ढंककर झेलना पड़ता है?

3. इतिहास में पहले भी महामारियां आईं, जब बुर्के और घूंघट ज्यादा चलन में थे. ऐसे में क्या औरतें सुरक्षित थीं? क्या इस तरह का कोई डेटा आपको इन संदेशों के साथ उपलब्ध करवाया जाता है?

4. आज घूंघट और बुर्का पहने वाली औरतों को क्या खांसी-जुकाम जैसी आम बीमारियां नहीं होतीं?

 

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इनसे कोई पूछे कि वैज्ञानिकों ऋषियों ने पुरुषों को सेफ्टी का क्या उपाय दिया? (तस्वीर: ट्विटर)

तो अंत में

इनका पोस्ट्स का कोई सिर-पैर नहीं है. इनपर ध्यान न दें. सचमुच में अपना ध्यान रखना है, तो N-95 या इससे ऊपर का मास्क खरीदिए. हाथ सफाई से धोइए. छींकने खांसने के लिए टिशू पेपर या कपड़े से मुंह ढंकने का इस्तेमाल कीजिए. घूंघट/बुर्का आपको वायरस से नहीं बचाएगा. चाहे सोशल मीडिया पर लाख लोग इसके फायदे गिना लें.

बात खटकनी चाहिए. हर बार किसी भी चीज़ को महिलाओं के कपड़ों या रहन-सहन से जब जोड़ा जाए, तो एक बार सोच लीजिए. कि कहीं इसका इस्तेमाल आपको पीछे धकियाने के लिए तो नहीं किया जा रहा.


वीडियो: कोरोना वायरस से बचने के लिए कौन सा मास्क पहनना चाहिए?

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