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वर्ल्ड वॉर-2 में कोरियाई औरतों के रेप की जापान को ये कीमत चुकानी पड़ेगी

दूसरा विश्वयुद्ध चल रहा था. धरती पर आग बरस रही थी. पूरी दुनिया में लोग सहमे हुए थे. हजारों सैनिक और आम लोग मारे जा रहे थे. यूरोप में जर्मनी और एशिया में उसका साथी जापान लगातार दूसरे देशों के रौंद रहे थे. जापान के कब्जे में मंचूरिया और कोरिया थे और वह चीन में युद्ध लड़ रहा था. इस बीच कुछ ऐसा हुआ, जिसे इतिहास की भाषा में युद्ध अपराध कहा जाता है. दरअसल, जापान ने उस दौर में जो कुछ किया, वो यह बताता है कि युद्ध आम नागरिकों के लिए त्रासदी तो लेकर आता ही है, लेकिन इसके सबसे भयानक परिणाम औरतों को भुगतने पड़ते हैं.

इतिहास की किताबें उठाकर देखें तो पता चलेगा कि सदियों तक ऐसे युद्धों में औरतों पर सबसे अधिक अत्याचार हुए. राजा, महाराजा, सुल्तान, बादशाह, एम्परर इत्यादि ने लड़ाइयां छेड़ीं… और इन लड़ाइयों में जो जीता उसके सैनिकों ने पराजित क्षेत्र की स्त्रियों के साथ ज्यादती की. उन्हें दासी बना लिया, उनका बलात्कार किया. जबरन इन औरतों को अपने साथ ले गए.

जापान के जिस युद्ध अपराध की बात हम कर रहे हैं- वो है कोरिया की लाखों महिलाओं का जापानी सैनिकों द्वारा किया गया बलात्कार. जापान ने अपनी इस दरिंदगी को छिपाने के लिए इन औरतों को ‘कम्फर्ट विमेन’ (Comfort Women) का नाम दिया. मतलब वे औरतें जो आराम पहुंचाती हों.

कोर्ट ने जापान से हर्जाना भरने के लिए कहा

लेकिन इस बारे में हम अभी क्यों बता रहे हैं? क्योंकि हाल ही में दक्षिण कोरिया की एक अदालत ने एक फैसला दिया है. इस फैसले में जापान से उन 12 महिलाओं को अलग-अलग लगभग 67 लाख रुपये देने के लिए कहा गया है, जिन्हें जापानी सैनिकों ने सेक्स करने के लिए मजबूर किया था. अदालत में यह मामला 2016 में शुरू हुआ था और तब से 6 पीड़िताओं की तो मौत भी हो चुकी है.

फैसला सुनाते हुए अदालत ने कहा,

“यह मानवता के खिलाफ किया गया अपराध था. जिसे जापान ने जानबूझकर और बहुत बड़े पैमान पर किया. इस तरह के अपराध को भुलाया नहीं जा सकता और न ही जापान को संप्रभु राष्ट्र होने की छूट दी जा सकती है. जापान ने कोरियाई प्रायाद्वीप पर कब्जा करके हमारे लोगों के खिलाफ अपराध किया.”

एक जज किम जियांग गॉन ने जापान के इन अपराधों को अंतरराष्ट्रीय संधियों का भी उल्लंघन बताया.

शेयरिंग हाउस में अन्य पीड़िताओं के साथ 94 साल की ली ओक सियोन. जापानी सैनिक उन्हें 14 साल की उम्र में किडनैप करके चीन ले गए थे.
शेयरिंग हाउस में अन्य पीड़िताओं के साथ 94 साल की ली ओक सियोन. जापानी सैनिक उन्हें 14 साल की उम्र में किडनैप करके चीन ले गए थे.

क्या है Comfort Women की कहानी?

जापानी सैनिकों की हैवानियत की शिकार हुईं पीड़िताएं सरकार द्वारा बनाए गए घरों में रहती हैं. इन्हें दक्षिण कोरिया में ‘हाउस ऑफ शेयरिंग’ कहा जाता है. यहां रहने वालीं 92 वर्ष की कांग चुल न्यूज एजेंसी एपी को बताती हैं,

“मैं 16 साल की थी. मेरा घर शांगजू कस्बे में था. एक दिन जापानी सैनिक आए और मुझे चीन ले गए. जहां मुझे एक छोटे से कमरे में बंद कर दिया गया. करीब 12 से 15 जापानी सैनिक दिन में कई बार मेरा बलात्कार करते थे. उस वक्त मैं बस मर जाना चाहती थी.”

इसी तरह इसी शेयरिंग हाउस में रहने वालीं 94 साल की ली ओक सियोन उस भयावह मंजर को याद करते हुए बताती हैं कि जब जापानी सैनिकों ने उन्हें किडनैप किया, तब वे 14 साल की थीं. जापानी सैनिक उन्हें एक ट्रेन के जरिए चीन ले गए थे. ली ने बताया,

“मुझे एक सेक्स स्लेव बनने के लिए मजबूर किया गया. तीन साल तक मेरे साथ आदमियों ने बलात्कार किया. 1945 में जब जापान की हार हुई, तब मैं रिहा हुई. तब तक मैं भूल चुकी थी कि कितने लोगों ने मेरा बलात्कार किया. मुझे खुद के ऊपर शर्म आने लगी थी. मैं रिहा होने के बाद भी घर नहीं आई. चीन में ही रही.”

कई इतिहासकारों ने अनुमान लगाया है कि कोरिया की करीब दो लाख महिलाओं और लड़कियों को जापान ने सेक्स स्लेव बनाया था. कइयों को जबरन ले जाया गया तो कई औरतों और लड़कियों को कर्ज चुकाने के एवज में सेक्स स्लेव बनने के लिए मजबूर होना पड़ा.

बिगड़ सकते हैं जापान-दक्षिण कोरिया के संबंध

अनुमान लगाया जा रहा है कि इस फैसले से दोनों देशों के बीच पहले से ही खराब संबंध और भी खराब हो सकते हैं. इस फैसले के बाद जापान के चीफ कैबिनेट सेक्रेटरी कतसूनोबू काटो ने कहा कि जापान को यह निर्णय स्वीकार नहीं है. वहीं, जापान के विदेश मंत्रालय ने दक्षिण कोरिया के एंबैसडर को तलब करते हुए इस संबंध में शिकायत भी दर्ज कराई है.

जापान के विदेश मंत्रालय का मानना है कि दक्षिण कोरिया का कोर्ट उसकी संप्रभुता में दखल नहीं दे सकता. और न ही जापान इस फैसले के खिलाफ अपील करेगा. क्योंकि ऐसा करने पर वह अपनी संप्रभुता पर विदेशी दखल को स्वीकार कर लेगा.

दक्षिण कोरिया में जापानी दूतावास के बाहर स्थित कम्फर्ट स्टैच्यू. यहां सामाजिक कार्यकर्ता जापान के खिलाफ प्रदर्शन करने आते हैं.
दक्षिण कोरिया में जापानी दूतावास के बाहर स्थित कम्फर्ट स्टैच्यू. यहां सामाजिक कार्यकर्ता जापान के खिलाफ प्रदर्शन करने आते हैं.

दूसरी तरफ दक्षिण कोरिया की सरकार का रुख नरम है. टोक्यो में दक्षिण कोरिया के एंबैसडर नैम ने कहा कि वे इस दिशा में काम करेंगे कि इस फैसले का कोई प्रतिकूल असर दोनों देशों के संबंधों पर न पड़े. लेकिन दक्षिण कोरिया की जनता इस फैसले को लेकर काफी खुश है. फैसले के तुरंत बाद जापानी दूतावास के बाहर सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एक दूसरे को बधाई दी. इस दूतावास के बाहर ‘कम्फर्ट विमेन’ स्टैच्यू भी स्थित है, जहां प्रदर्शनकारी जापान के खिलाफ प्रदर्शन करने आते रहे हैं. जापान लगातार इस स्टैच्यू को हटाने की मांग करता रहा है.

क्या कहता है इतिहास?

जापान ने कोरिया को 1910 में अपना उपनिवेश बनाया और इसे हर तरह से लूटा. हालांकि, इस लूट और द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान कोरियाई औरतों के ऊपर किए गए अत्याचार को लेकर कई जापानी प्रधानमंत्री माफी भी मांग चुके हैं. लेकिन शिंजो आबे के कार्यकाल के बाद स्थितियां लगातार बिगड़ी ही हैं. शिंजो आबे कई बार जापान की उस यसूकूनी समाधि का दौरा कर चुके हैं, जिसे दूसरे विश्व युद्ध के दौरान मारे गए जापानी सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए स्थापित किया गया था. इनमें वे 14 सैनिक भी शामिल हैं, जिनके ऊपर युद्ध अपराध साबित हो चुके हैं. शिंजो आबे के इन दौरों के लेकर चीन, उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया ने हर बार अपना विरोध दर्ज कराया है.

दूसरी तरफ संबंध तब से और बिगड़े हैं, जब दक्षिण कोरिया की एक अदालत ने 2018 में जापान की निप्पॉन कंपनी को युद्ध के दौरान कोरियाई लोगों से जबरन काम कराने के एवज में जुर्माना देने के लिए कहा था. जापान ने तब भी इस फैसले पर अपना विरोध जताते हुए दोनों देशों के बीच हुई 1965 की संधि का हवाला दिया था. इस संधि के तहत दोनों देशों के बीच यह समझौता हुआ था कि जापान ने कोरिया पर जो अत्याचार किया, उसकी भरपाई कर दी गई है.

इसी तरह 2015 में भी जापान और दक्षिण कोरिया के बीच एक समझौता हुआ था. जिसके तहत जापान ने दक्षिण कोरिया को लगभग 70 करोड़ रुपये दिए थे, ताकि युद्ध पीड़ितों की सहायता की जा सके.

वहीं, दक्षिण कोरिया की पीड़िताएं अदालत के इस फैसले से अभी पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हैं. उनका कहना है कि पैसा हर चीज नहीं है. वे चाहती हैं कि जापान उनसे माफी मांगे.


 

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