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केंद्र ने कोर्ट से कहा- सेना में महिलाओं को कमांड पोस्ट कैसे दें, मैटरनिटी लीव देनी पड़ जाएगी

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि आर्मी की कमांड पोस्ट पर महिलाएं नियुक्त नहीं की जा सकती हैं. इसके पीछे सरकार ने प्रेग्नेंसी, शारीरिक क्षमता और आर्मी के ट्रूप्स की मानसिकता को वजह बताया है. अदालत ने इस केस से संबंधित सभी पक्षों से 7 फरवरी तक और जानकारी दाखिल करने को कहा है.

क्या मामला है? 

आर्मी में कॉम्बैट रोल में अभी भी महिलाएं नियुक्त नहीं की जातीं. अभी उन्हें शॉर्ट सर्विस कमीशन में सपोर्ट रोल/स्टाफ रोल मिलते हैं. यानी जंग के मैदान के अलावा आर्मी के सपोर्ट में जो टुकड़ियां होती हैं, उसमें उन्हें नियुक्त किया जाता है. 14 साल बाद ही उन्हें रिटायर होना पड़ता है. यानी महिला ऑफिसर्स निचली रैंक्स पर ही रह जाती हैं, उन्हें उंची पोस्ट्स (जिन्हें कमांड पोस्ट कहा जाता है) तक पहुंचने का समय नहीं मिलता. फीमेल ऑफिसरों ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया कि उन्हें भी कमांड पोस्ट दी जाए. परमानेंट कमीशन में उन्हें भी ऊंची पोस्ट पर नियुक्ति का मौका मिले. दिल्ली हाई कोर्ट ने 2010 में ये निर्णय सुनाया था कि महिला ऑफिसर्स को भी परमानेंट कमीशन मिलना चाहिए. इसे चैलेन्ज किया था केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में. इसी मामले पर सुनवाई चल रही थी.

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महिलाएं आर्मी में मौजूद तो हैं, लेकिन मेडिकल और सपोर्ट रोल में. युद्ध की सूरत में वो कॉम्बैट में अभी भी नहीं जा सकतीं. (तस्वीर:लेफ्टिनेंट भावना कस्तूरी)

सरकार ने क्या कहा?

सरकार की तरफ से वकील आर बालासुब्रह्मण्यम और नीला गोखले ने सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस डी वाई चंद्रचूड और अजय रस्तोगी की बेंच के सामने दलील पेश की. सरकार ने महिलाओं को कमांड पोस्ट देने के खिलाफ ये दलीलें दीं :

# रैंक और फ़ाइल में मौजूद ट्रूप्स में पुरुष अधिक हैं. उनमें से भी अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं. समाज के जिन तौर-तरीकों के बीच वो बड़े हुए हैं, उनमें वो किसी महिला से कमांड लेने के आदी नहीं हैं.

# महिला ऑफिसर्स के लिए कमांड पोस्ट में होना इसलिए भी मुश्किल है, क्योंकि उन्हें प्रेग्नेंसी के लिए लम्बी छुट्टी लेनी पड़ती है. परिवार की जिम्मेदारियां होती हैं उन पर.

# लड़ाई के दौरान अगर कोई महिला ऑफिसर युद्धबंदी बना ली जाती है, तो ये आर्मी और सरकार के लिए बेहद मुश्किल स्थिति होगी. सीधे-सीधे कॉम्बैट से उन्हें दूर रखना ही बेहतर होगा.

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रक्षा मंत्रालय के इन तर्कों को लेकर सोशल मीडिया पर भी बहस चल रही है. कुछ लोग इसके समर्थन में हैं, तो कुछ विरोध में. (सांकेतिक तस्वीर: PTI)

महिला ऑफिसर्स की तरफ से क्या दलील दी गई?

महिला ऑफिसर्स की तरफ से वकील मीनाक्षी लेखी और ऐश्वर्या भट्टी दलील दे रही थीं. उन्होंने ये तर्क रखे :

# सपोर्ट रोल में भी कई महिला ऑफिसर्स ने काफी बहादुरी का परिचय दिया है.

# मिंटी अग्रवाल नाम की फ्लाइट कंट्रोलर ही थीं, जिन्होंने विंग कमांडर अभिनन्दन को गाइड किया था, जब पाकिस्तान के F-16 को उन्होंने मार गिराया था. इसके लिए मिंटी को युद्ध सेवा मेडल भी दिया गया था.

# जब काबुल में भारतीय दूतावास पर हमला हुआ था, तब वहां तैनात मिताली मधुमिता ने बहादुरी दिखाई थी. उन्हें इसके लिए सेना मेडल भी दिया गया था.

सरकार के वकील बालासुब्रह्मण्यम ने कहा कि सरकार महिला ऑफिसर्स को परमानेंट कमीशन देने को तैयार है. लेकिन अभी जो महिलाएं 14 साल से ज्यादा सर्विस दे चुकी हैं, उन्हें परमानेंट कमीशन के बिना 20 साल तक सर्विस करने की अनुमति होगी. 20 साल से ज्यादा सर्विस देने वाली जो महिला ऑफिसर हैं, उन्हें पेंशन बेनिफिट देकर रिलीज किया जाएगा.

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आर्मी में ही महिलाओं के कॉम्बैट रोल्स के लिए जद्दोजहद चल रही है. एयरफ़ोर्स में कॉम्बैट रोल में महिलाओं की तैनाती शुरू हो चुकी है. (सांकेतिक तस्वीर: joinindianarmy.nic.in)

जजों की बेंच ने क्या कहा?

‘द टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ में छपी रिपोर्ट के अनुसार, जजों की बेंच ने इस तरफ इशारा किया कि कमांड पोस्ट पर महिला ऑफिसर्स को न रखना गलत है. आर्मी को उन्हें इजाज़त देनी चाहिए सर्व करने की. उनकी कुव्वत और सेना की ज़रूरत के अनुसार. बेंच ने कहा कि जब पुलिस फ़ोर्स में महिलाओं की तैनाती हो रही थी, तब भी बहुत विरोध हुआ था. लेकिन अब वे फील्ड में बहुत अच्छा कर रही हैं. बेंच ने कहा कि बदलते समय के साथ मानसिकता भी बदलनी चाहिए. आप महिला ऑफिसर को मौका देंगे, तो वो अपनी क्षमता के हिसाब से परफॉर्म भी करेंगी.

कोर्ट ने इस केस से संबंधित सभी पक्षों को शुक्रवार, 7 फरवरी तक सभी नोट्स और सबमिशन जमा करने का निर्देश दिया गया है.

परमानेंट कमीशन है क्या?

परमानेंट कमीशन यानी रिटायरमेंट की उम्र तक सेना में सेवाएं देना. शॉर्ट सर्विस कमीशन में 14 साल की लिमिट होती है. महिला ऑफिसर सिर्फ शॉर्ट सर्विस कमीशन के ज़रिये आर्मी ज्वाइन करती हैं. 14 साल के बाद उन्हें आर्मी से ऑप्ट आउट करना ही होता है. दूसरी ओर पुरुष परमानेंट कमीशन के लिए अप्लाई कर सकते हैं.

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हाल में ही तान्या शेरगिल ने सेना दिवस पर आर्मी की ऑल मेल टुकड़ी को लीड किया. (तस्वीर: ssbcrack)

जो भी दलीलें सरकार की तरफ से वकीलों ने दीं, वैसी ही कुछ दलीलें पूर्व आर्मी चीफ और वर्तमान चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ बिपिन रावत ने 2018 में दी थीं. तब महिलाओं के कॉम्बैट रोल में आर्मी ज्वाइन करने की बात चली थी. बिपिन रावत ने कहा था कि कॉम्बैट में महिलाएं मरेंगी, तो उनके घरवाले उनके शव देखना बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे. आर्मी महिलाओं को छः महीने की मैटरनिटी लीव नहीं दे पाएगी. और अगर नहीं दी, तो उस पर भी बवाल होगा.

यही नहीं, बिपिन रावत ने ये भी कहा था कि अगर 100 जवानों के बीच कोई महिला ऑफिसर होगी, तो शिकायत करेंगी कि कोई उनके टेंट में झांक रहा है. फिर उनके लिए चारों तरफ चादर लगानी पड़ेगी. बिपिन रावत ने एक इंटरव्यू में ये भी कहा था कि पुरुष सैनिक या ऑफिसर महिला ऑफिसर से कमांड लेने के आदी नहीं हैं.


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