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अगर पति नशेड़ी हो तो क्या पत्नी को मिल जाएगा उसकी प्रॉपर्टी का ज़िम्मा?

राजकुमारी रत्ना सिंह. यूपी के प्रतापगढ़ से तीन बार कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा सांसद रह चुकी हैं. साल 1996, 1999, और 2009 में. साल 2019 में बीजेपी जॉइन कर चुकी हैं. रत्ना सिंह के पिता राजा दिनेश सिंह को इंदिरा गांधी का बेहद करीबी माना जाता था. हाल में ख़बरों में आईं जब उन्होंने अपने पति जय सिंह सिसौदिया की प्रॉपर्टी का कानूनी अभिभावक/संरक्षक होने का अधिकार मांगा. और इस अर्जी के साथ कोर्ट पहुंच गईं. अर्जी के पीछे वजह ये दी गई कि राजा जय सिंह कथित रूप से ड्रग और शराब के आदी हैं. यही नहीं राजा जय सिंह सिसौदिया को कैंसर और डायबिटीज जैसी बीमारियां हैं जिसकी वजह से वो दूसरों पर निर्भर हैं.

हालांकि लेटेस्ट रिपोर्ट्स के मुताबिक़ राजकुमारी रत्ना सिंह ने कोर्ट से अपनी याचिका वापस ले ली है.

क्या होती है लीगल गार्जियनशिप, कौन ले सकता है, क्या नियम होते हैं. ये सब समझेंगे. लेकिन उससे पहले ज़रा राजकुमारी रत्ना सिंह के इस मामले को और करीब से जान लेते हैं.

कोर्ट में दर्ज याचिका के अनुसार राजा जय सिंह सिसौदिया महाराणा प्रताप के वंशज हैं. उनके परिवार की तरफ से उन्हें भारत और विदेश में काफी चल और अचल संपत्ति मिली है. इसके अलावा उन्हें कथित रूप से म्यूचुअल फंड्स, शेयर, गहने, फिक्स्ड डिपॉजिट, पेंटिंग्स इत्यादि भी मिली हैं. याचिका में राजकुमारी रत्ना सिंह ने ये कहा है कि राजा जय सिंह सिसौदिया इन सभी आय के स्रोतों का इस्तेमाल अपनी ड्रग्स की इच्छा को पूरा करने के लिए कर रहे हैं. याचिका में राजकुमारी रत्ना सिंह ने ये मांग रखी थी कि उन्हें अपने पति का कानूनी  अभिभावक बना दिया जाए. ताकि वो उनका ध्यान रखें, साथ ही प्रॉपर्टी को भी सुरक्षित रख सकें. रत्ना सिंह का कहना  था कि अपने पति का इलाज वही करवा रही हैं, साथ ही उन्हें अपने दोनों बच्चों का भी ध्यान रखना है.

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अपने पिता राजा दिनेश सिंह के साथ राजकुमारी रत्ना सिंह. दिनेश सिंह विदेश मंत्री भी रह चुके थे. (तस्वीर: फेसबुक)

कोर्ट का क्या कहना था?

‘इंडिया टुडे’ में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़ मामले में सरकार ने याचिका का विरोध किया था. ये कहते हुए कि ये याचिका मान्य नहीं है. क्योंकि इसमें ‘गार्जियंस एंड वॉर्ड्स एक्ट’ के तहत गार्जियनशिप मांगी गई थी. जबकि ये एक्ट नाबालिग लोगों के लिए ही मान्य होता है. बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी यही सलाह दी कि राजकुमारी रत्ना सिंह आर्टिकल 226 के तहत नई याचिका दायर कर सकती हैं. संविधान का ये अनुच्छेद हाई कोर्ट्स को रिट, यानी एक कानूनी आदेश जारी करने की ताकत देता है. इन सभी बातों के मद्देनज़र राजकुमारी रत्ना सिंह ने याचिका वापस ले ली है.

अब आते हैं गार्जियनशिप पर.

कानून क्या कहता है?

जिस एक्ट की बात ऊपर हुई, यानी गार्जियंस एंड वॉर्ड्स एक्ट, वो सिर्फ नाबालिगों पर लागू होता है. इस कानून के अनुसार पेरेंट्स द्वारा नामित व्यक्ति, या फिर नाबालिग के रिश्तेदार/दोस्त, या फिर जिस क्षेत्र में नाबालिग का स्थायी आवास हो वहां के कलेक्टर उसके अभिभावक के तौर पर नियुक्त किए जा सकते हैं.

अब आते हैं इस सवाल पर. कि क्या पत्नी पति की लीगल गार्जियन हो सकती है?

आपने ऊपर पढ़ा कि बॉम्बे हाई कोर्ट ने अनुच्छेद 226 का हवाला दिया. संविधान का ये अनुच्छेद हाई कोर्ट को रिट यानी कानूनी आदेश जारी करने की ताकत देता है. अगर कोर्ट को लगता है कि अर्जी लगाने वाले के अधिकारों का हनन हुआ है, तो वो अलग-अलग तरह की रिट जारी कर सकते हैं.

सुप्रीम कोर्ट में लॉयर रह चुकीं और फिलहाल लॉ पढ़ा रहीं प्रज्ञा पारिजात सिंह बताती हैं,

“ऐसे मामलों में राज्य हाईकोर्ट के पास याचिका दाखिल कर रिट पेटीशन जारी करने को कहा जा सकता है. उसके बाद कोर्ट सुबूत के अनुसार कार्रवाई करेगा. अगर पत्नी को लगता है कि पति अपनी प्रॉपर्टी को बेसाख्ता बर्बाद कर रहा है, या करने की प्रक्रिया में है, तो वो उसकी प्रॉपर्टी की कानूनी संरक्षक बनने की अपील कर सकती है.”

पहले भी आ चुके हैं केसेज

पत्नी के कानूनी संरक्षक बनाने को लेकर कोर्ट पहले भी निर्णय दे चुके हैं. साल 2020 में ही बॉम्बे हाई कोर्ट के पास ऐसा एक मामला आया था, जिसमें पति दो साल से कोमा की स्थिति में थे. उनके मेडिकल बिल भरना, उनकी देखरेख इत्यादि सब कुछ उनकी पत्नी कर रही थीं. लेकिन पत्नी को खर्चे के लिए पति के बैंक अकाउंट्स इत्यादि से पैसे निकालने की अनुमति नहीं मिल रही थी. क्योंकि वो कानूनी रूप से पति की गार्जियन नहीं थीं. ऐसी किसी स्थिति के लिए कानून में अलग से कोई प्रावधान भी नहीं है. इसलिए पत्नी हाई कोर्ट पहुंची थीं. कोर्ट ने मामले का संज्ञान लेते हुए कहा कि जब पति अक्षम हो, या फिर कोमा जैसी स्थिति में होने के कारण कोई निर्णय लेने के लायक न हो, तो ऐसी स्थिति में पत्नी ही उसकी गार्जियन होने के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति है.

हालांकि कोर्ट ने इस मामले में ये भी कहा कि गार्जियन के तौर पर पत्नी अपनी जिम्मेदारी ढंग से निभा रही हैं या नहीं, इसका ध्यान रखने के लिए किसी अधिकारी की नियुक्ति की जाएगी. भले ही वो थोड़े समय के लिए ही क्यों न हो.

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अपने बेटे भुवन्यु सिंह के साथ राजकुमारी रत्ना सिंह. उन्होंने कोर्ट से ये भी कहा कि उन्हें अपने बच्चों की देखभाल के लिए भी आय के स्रोतों की ज़रूरत है. (तस्वीर: फेसबुक)

इसी तरह के और भी केसेज हैं लेकिन उनमें पत्नी को गार्जियनशिप का अधिकार तब मिला जब उनके पति कोमा की स्थिति में थे. जैसे शोभा गोपालकृष्णन एंड अदर्स वर्सेज स्टेट ऑफ केरल (साल 2019). उमा मित्तल एंड अदर्स वर्सेज यूनियन ऑफ इंडिया एंड अदर्स (2020). इन सभी  मामलों में अनुच्छेद 226 के तहत रिट जारी की हाई कोर्ट ने.

ये रोल स्टेट को भी दिया जा सकता है. अरुणा रामचंद्र शानबाग वर्सेज यूनियन ऑफ इंडिया (2011) मामले में कोर्ट ने कहा था कि अगर किसी नागरिक को ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत हो जो उसके लिए पेरेंट की जिम्मेदारी पूरी कर सके, उसके लिए निर्णय ले सके और दूसरे ज़रूरी कदम उठा सके, तो कई बार इसके लिए स्टेट ही सबसे बेहतर विकल्प होता है.


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