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'मर्दानगी' बचाने के चक्कर में कोविड का टीका लगवाने से भी डर रहे लोग

नहीं हो रही औलाद
तो जीवन है बर्बाद
शादी के पहले
या शादी के बाद
चले आओ फलाने हकीम के पास

रोज़ के अखबार और शहरों के ‘आउटर’ की दीवारें ऐसे इश्तेहारों से पुती रहती हैं. यहां कौन से डॉक्टरों और कौन से हकीमों और किस-किस तरह के दवाखानों का नाम होता है, ये बताना ज़रूरी नहीं. ये इश्तेहार हर रोज़ इस तरह आपकी निगाहों में पड़ते हैं कि कोई दूसरे देश से आया हो तो उसे लगे कि भाई इस देश में असली महामारी तो तथाकथित नपुंसकता की है.

लेकिन सच तो ये है कि देश जिस महामारी से लगातार लड़ रहा है, वो कोरोनावायरस से होने वाला संक्रमण कोविड-19 है. हमारे हेल्थकेयर वर्कर्स दिनरात जुटे हैं कि किसी तरह ज्यादा से ज्यादा लोगों की जान बचा लें. दुनियाभर के साइंटिस्ट जुटे रहे इसकी वैक्सीन बनाने में. इंडिया में भी इसकी वैक्सीन आई, फिर वैक्सीन लगाने का कार्यक्रम शुरू हुआ. जहां सरकारों और प्रशासन का ये लक्ष्य है कि जल्द से जल्द अधिक से अधिक लोग वैक्सीन पा सकें, मगर अफवाहें वैक्सीन से दुगनी तेज़ी से लोगों तक पहुंच रही हैं.

ऐसी ही एक अफवाह है कि वैक्सीन लेने से पुरुषों में नपुंसकता आ जाएगी. ज़ाहिर है, इसने लोगों को डर और डाउट से भर दिया है. इससे पहले कि हम आगे बढ़ें, सबसे पहले तो डॉक्टर से ही जान लीजिए कि आपको क्यों कम से कम नपुंसकता के डर से वैक्सीन लेने से पीछे नहीं हटना है. एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉक्टर रितेश गुप्ता ने कहा-

“ये बिल्कुल निराधार है. ऐसा कुछ भी नहीं है. वैक्सीन का दूर-दूर तक न तो महिलाओं की फर्टिलिटी से या पुरुष की फर्टिलिटी से कोई संबंध है. वैक्सीन लगवाने को लेकर आप बिल्कुल निश्चिंत रहें. इससे फर्टिलिटी पर कोई असर नहीं होगा.”

Dr Ritesh Gupta
डॉक्टर रितेश गुप्ता, एंडोक्राइनोलॉजिस्ट

वैक्सीन एक्सपर्ट डॉक्टर विपिन वशिष्ठ का कहना है-

“हमने देखा कि ओरल पोलियो वैक्सीन जब इस्तेमाल किया गया था तब काफी बड़ी तादाद में लोगों के मन में ये मिथ था कि इससे इम्पोटेंसी हो जाती है. तो बच्चों को नहीं दिलवाते थे. अगर दूसरी तरफ देखें, जो कि स्थापित तथ्य है कि किसी को कोरोना हो जाए तो उसमें इम्पोटेंसी के लक्षण हैं वो ज्यादा हो जाते हैं. अभी तक किसी भी स्टडी में ऐसा नहीं आया कि वैक्सीन के बाद इम्पोटेंसी हो जाए. बल्कि बीमारी की वजह से इरेक्टाइल डिस्फंक्शन देखे गए हैं. इसलिए ये अच्छा होगा कि आप वैक्सीन लगवाएं.”

Dr Vipin
डॉक्टर विपिन वशिष्ठ, वैक्सीन एक्सपर्ट

उम्मीद है कि अब आपके दिमाग का काफी बड़ा डाउट क्लियर हो गया होगा. अगर अभी भी नहीं हुआ है, तब तो फिर आप किसके भरोसे हैं, आप खुद ही तय कर लीजिए. लेकिन अब अगर बात निकली है, तो आपको ये भी बता देते हैं कि नपुंसकता आखिर होती क्या है. अंग्रेज़ी में इस दिक्कत को Erectile dysfunction कहते हैं. शॉर्ट में ED. यानी जब पुरुष का लिंग सेक्स के दौरान ठीक से परफॉर्म नहीं कर पाए, उसमें ज्यादा तनाव न आ पाए, वो इरेक्ट न हो सके, इस कंडिशन को कहते हैं ED. इसके लिए नपुंसकता शब्द का इस्तेमाल बोल-चाल की भाषा में होता है, खासतौर पर किसी को नीचा दिखाने के लिए अपशब्द की तरह इसे बोला जाता है. खैर हम खुद इसमें ज्यादा कुछ नहीं कहेंगे, आप सीधे एक्सपर्ट से ही जानिए कि ED आखिर क्या है, क्यों होता है और इसका इलाज कैसे किया जा सकता है. सायकायट्रिस्ट एंड सेक्शुअल डिसऑर्डर स्पेशलिस्ट, डॉक्टर प्रवीण त्रिपाठी से हमने बात की. उन्होंने बताया-

“इरेक्टाइल डिस्फंक्शन किसी और बीमारी की ही तरह है. इस डिस्फंक्शन में आमतौर पर सेक्शुअल इंटरकोर्स के वक्त लिंग में तनाव नहीं आ पाता है. यंग लोगों में ये आमतौर पर एंग्जायटी की वजह से होता है. मान लो कि कोई व्यक्ति पहली बार सेक्शुअल इंटरकोर्स कर रहा है, तो एक्साइटमेंट के साथ ही उसे इस बात की एंग्जायटी भी होती है कि सब ठीक से हो रहा है या नहीं. इसी वजह से कई बार इरेक्शन नहीं हो पाता है. फिर साइकल सी बन जाती है, और जब भी व्यक्ति सेक्शुअल इंटरकोर्स ट्राई करता है तो डर के मारे इरेक्शन नहीं हो पाता. ओल्डर एज में या फिर जिन लोगों को ब्लड प्रेशर, शुगर की दिक्कत रही हो बहुत समय से, उनमें कई बार वैसल्स में दिक्कत की वजह से, ये समस्या हो सकती है. कई दवाओं के साइड-इफेक्ट की वजह से भी ऐसा होता है. इसका इलाज है. आप डॉक्टर के पास जाएंगे तो वो प्रॉपर टेस्ट करके इलाज करेंगे.”

Dr Praveen
डॉक्टर प्रवीण त्रिपाठी, सायकायट्रिस्ट एंड सेक्शुअल डिसऑर्डर स्पेशलिस्ट

क्यों हो रखा है इतना हउवा?

डॉक्टर ने हमें बताया कि ज्यादातर मामलों में ED सायकोलॉजिकल कारणों से होता है. तब जब सेक्स के दौरान आदमी अपने पार्टनर की तरफ फोकस न करके, ये सोचता है कि उसका पीनस ठीक से इरेक्ट हो रहा है या नहीं. इसे परफॉरमेंस प्रेशर भी कहते हैं. थोड़ा और ठीक से समझने के लिए आप ‘शुभ मंगल सावधान’ फिल्म देख सकते हैं. इसके अलावा कई सारे मेडिकल कारण भी हैं, जैसे डायबिटीज़ होना, या ज्यादा स्मोकिंग करना, या पीनस की नसों में परेशानी, या हॉर्मोन्स के लेवल पर किसी तरह की कोई गड़बड़ होना. ये सारी दिक्कतें ट्रीटेबल हैं. तब जब आप किसी अच्छे और सही डॉक्टर के पास जाएं. वो सही से टेस्ट करके आपको आपकी परेशानी की जड़ बताएगा और इलाज करेगा.

हमने शुरुआत में कहा था कि देश की दीवारें देखकर लगता है कि देश की असल महामारी कथित नपुंसकता ही है. मगर आपने अभी डॉक्टर से जाना कि किस तरह ये इतनी बड़ी समस्या नहीं है जितना बड़ा इसे बनाया जाता है. फिर क्यों है इसकी इतनी चर्चा.

दुनियाभर में लड़कों को इस तरह ट्रेन किया जाता है कि उनका पौरुष उनकी सबसे कीमती चीज़ है. आखिरकार वो इससे सबकुछ कर सकते हैं. महज़ पुरुष होने के नाते ही पुरुष ज्यादा प्रिविलेज वाले हो जाते हैं. उन्हें तमाम तरह के अधिकार मिल जाते हैं. जैसे रात को बिना डर के बाहर निकलने का अधिकार. अपनी मर्ज़ी के कपड़े पहनने का अधिकार. नौकरी करने का अधिकार. सड़क के किनारे पेशाब करने या दुनिया के सामने अपने प्राइवेट पार्ट्स खुजलाने का अधिकार. ये मानने का अधिकार कि दुनिया उन्हीं के इर्द गिर्द घूमती है. कि पिता के बाद अब घर के मुखिया वो होंगे. और तो और, कुछ लड़कों को ये भी लगता है कि पुरुष होना उन्हें महिलाओं और बच्चों का यौन शोषण करने, उनके साथ अभद्र व्यवहार करने, उन्हें पीटने और उनके जीवन को पूरी तरह कंट्रोल करने का अधिकार देता है. शॉर्ट में कहें तो उनका पौरुष ही है जो उन्हें ये विश्वास दिलाता है कि वो सबसे ऊपर हैं- महिलाओं से, बच्चों से, समलैंगिकों से, किन्नरों से.

जिस कल्चर में पौरुष इतना ज़रूरी हो. उसमें नपुंसकता, ज़ाहिर है, एक गाली है. इस तथाकथित नपुंसकता का ख्याल किसी भी आदमी या उसके घर वालों को डर से भर सकता है. उनका बेटा उन्हें नाती-पोते तो दे पाएगा न. उनका पति उन्हें गर्भवती तो कर पाएगा न. वो खुद जीवन के शारीरक सुख तो भोग पाएगा न.

हकीमों के इश्तेहारों की सच्चाई क्या है?

इसी डर का फायदा उठाते हैं आपको बेवकूफ बनाते ये इश्तेहार. इन डॉक्टर-हकीमों की सच्चाई जानने के लिए हमने कुछ समय पहले अखबार में छपे एक नंबर पर फोन लगाया था. वहां से हमारे साथी को बताया गया कि वो छः महीनों का कोर्स कर लें तो उनकी सारी दिक्कतें खतम हो जाएंगी. उन्हें बताया गया कि एक महीने का खर्च 3200 रुपये आएगा. 6 महीने के दाम आप खुद कैलकुलेट कर लें. उन्होंने बताया कि उनके पैकेज में खाने वाला कैप्सूल होगा, पाउडर होगा, एक भस्म एक तेल और सीरप होगा. इसके अलावा एक 4 जीबी का मेमरी कार्ड होगा जिसमें इंग्लिश वाली फ़िल्में होंगी जो उनकी मदद करेंगी. हम और आप इसपर हंस सकते हैं. क्योंकि हमें मालूम है कि इन दवाइयों के बारे में कोई जानकारी नहीं है, कोई प्रूफ नहीं है कि इसमें क्या मिला है, ये तेल या ये चूर्ण किस चीज से बने हैं. ऊपर से पॉर्नोग्राफिक मटीरियल दिखाना इस बात का सबूत है कि इन्हें कथित मरीज से नहीं बल्कि उसके पैसों से मतलब है.

अगर आपको इस तरह की तकलीफ है तो इस तरह के इश्तेहारों के बजाय किसी डॉक्टर के पास जाएं. जो चूर्ण और भस्म नहीं, बल्कि आपको सेफ़ दवाएं दे. और अपने आप को फिर से याद दिलाएं कि इससे आपकी ज़िन्दगी ख़त्म नहीं होती.

आंकड़े क्या कहते हैं?

खैर, लौटते हैं उसी असुरक्षा के भाव पर. पुरुष की इसी तथाकथित मर्दानगी वाली सोच की वजह से अक्सर औरतें सफर करती हैं. हमारे देश में आज भी बर्थ कंट्रोल के लिए अपनाई जाने वाली किसी भी प्रोसेस को ज्यादातर औरतें ही अपनाती हैं. पुरुष अभी भी मना ही करते हैं. ‘स्क्रॉल’ नाम की एक वेबसाइट में सितंबर 2020 में एक रिपोर्ट पब्लिश हुई थी. जिसमें बताया गया था कि पुरुष ये सोचते हैं कि फैमिली प्लानिंग के लिए या बर्थ कंट्रोल करने के लिए मौजूद तरीकों को इस्तेमाल करने का ज़िम्मा औरतों का ही है.

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2015-16 में ये बात पता चली थी कि हर आठ में से तीन पुरुषों का ये मानना है कि गर्भनिरोधक को यूज़ में लाने का काम औरतों का है. और पुरुषों को इसे लेकर चिंता नहीं करनी चाहिए. हेल्थ मैनेजमेंट इन्फॉर्मेशन सिस्टम डाटा के मुताबिक, साल 2016 के पहले बीते आठ सालों में कॉन्डम के इस्तेमाल में 52 फीसद की कमी देखी गई थी. और पुरुष नसबंदी में 73 फीसद की गिरावट पाई गई थी. लेकिन इसी दौरान औरतों में गर्भनिरोधक गोलियां खाने की दर 100 फीसद तक बढ़ी थी. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हमारे देश में 75.4 फीसद शादीशुदा आदमी ऐसे हैं जो गर्भनिरोधक के लिए किसी भी तरीके का इस्तेमाल नहीं करते. वहीं 52.9 फीसद अविवाहित आदमी किसी तरह के गर्भनिरोधक के तरीके को नहीं अपनाते. जानते हैं इसकी वजह क्या है? यही असुरक्षा का भाव कि किसी भी तरह का बर्थ कंट्रोल प्रोसेस उनकी मर्दानगी को चोट पहुंचाएगा. फिर चाहे औरतें बर्थ कंट्रोल के लिए ऑपरेशन करवाएं, रोज़ गोलियां खाते हुए उसके साइड इफेक्ट भुगतें या सुई लगवाने जाती रहें, इससे न पतियों को मतलब होता है, न लड़की के घरवालों को, न उसके ससुराल वालों को.


वीडियो देखें: कोरोना वैक्सीन लगवाने की प्लानिंग कर रही हर महिला ये वीडियो ज़रूर देखे!

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