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रैलियों-प्रदर्शनों में बंटने वाली नफ़रत का मासूम बच्चों के दिमाग पर क्या असर पड़ता है?

नागरिकता संशोधन कानून. CAA. इसे लेकर देशभर में विरोध-प्रदर्शन जारी है. दिल्ली के शाहीन बाग़ में औरतों ने मोर्चा संभाला हुआ है. महीने भर से लोग यहां शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे हैं. यहां नई-नई चीज़ें देखने को भी मिल रही हैं. जो ज़्यादातर प्रदर्शनों के दौरान नहीं देखने को नहीं मिलतीं. जैसे लोग कविताएं पढ़ रहे हैं. गाने गाकर अपनी बात सामने रख रहे हैं. प्रदर्शनकारियों के लिए लंगर लग रहा है. इन सबके अलावा एक चीज़ और बहुत ख़ास है. और वो है प्रोटेस्ट में बच्चों की मौजूदगी. यहां आपको बच्चे नारे लगाते हुए दिख जाएंगे. इनके वीडियो भी सोशल मीडिया पर ख़ूब वायरल हो रहे हैं.

इन वायरल वीडियो में एक सात साल की बच्ची कह रही हैं-

‘हम यहां तब तक रहेंगे जब तक मोदी NRC वापस नहीं ले लेते. चाहे. हमारा सिर फोड़ दें. चाहे पुलिस बुला लें. हम आज़ादी लेकर रहेंगे आज. NRC वो वापस लो आज. वो हमें मारना चाह रहे हैं. हमें कपड़े भी नहीं पहनने नहीं मिलेंगे. हमें खाना भी नहीं मिलेगा.’

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और ये बच्ची अकेले नहीं है जो गुस्से से उबल रही हैं. एक और लड़की है. उम्र में 10 साल की होगी. वो कहती हैं-

‘हम आज़ादी लेकर रहेंगे. मोदी कुछ नहीं कर सकते. आज़ादी नहीं देंगे तो ही हिलेंगे नहीं. मोदी जी को मुसलमानों से प्रॉब्लम है. ये देश हमारा है. न कि मोदीजी के बाप का.’

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वहीं एक तीसरे वीडियो में जब एक बच्चे से पूछा जाता है कि वो प्रदर्शन में क्यों आया है. तो वो कहता है-

‘आज़ादी लेने. मोदी से. मोदी ये सब करवा रहा है. मोदी पूरी दुनिया में आदमियों, बच्चों का गला कटवा रहा है. मरवा रहा है. हमने टीवी पर देखा.’

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#विरोध-प्रदर्शन में बच्चों की हिस्सेदारी

नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ चाइल्ड राइट्स. NCPCR. ये बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाली देश की सबसे बड़ी संस्था है. इसने हाल ही में साउथ-ईस्ट दिल्ली के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को ख़त लिखा है. इस ख़त में चिंता जताई गई है. चिंता प्रदर्शन में बच्चों की मौजूदगी को लेकर है. NCPCR का कहना है कि इससे बच्चों को मानसिक आघात पहुंच रहा है. साथ ही अफ़वाहों और ग़लतफ़हमी के चलते, उनके दिमाग पर बुरा असर पड़ रहा है.

बच्चों का प्रदर्शनों में शामिल होना कितना सही?
  बच्चों का प्रदर्शनों में शामिल होना कितना सही?

NCPCR ने अपने शिकायत पत्र में लिखा-

‘ये बच्चे यही बोल रहे हैं जो उनके बड़ों ने उन्हें सिखाया है. उन्हें लगता है कि प्रधानमंत्री और गृहमंत्री उनसे नागरिकता साबित करने के लिए कागज़ मांगेंगे. अगर वो ऐसा कागज़ नहीं दिखा पाते हैं तो उन्हें देश से निकाल दिया जाएगा. उन्हें डिटेंशन सेंटरों में डाल दिया जाएगा. वहां उन्हें खाना नहीं मिलेगा. इसलिए इन बच्चों और उनके माता-पिता को काउंसिलिंग की ज़रूरत है. ताकि उन्हें मानसिक आघात न पहुंचे.’

छोटे बच्चे जब ऐसे प्रदर्शनों में शामिल हप्ते हैं तो उसका असर उनके दिमाग पर भी पड़ता है.
   छोटे बच्चे जब ऐसे प्रदर्शनों में शामिल हप्ते हैं तो उसका असर उनके दिमाग पर भी पड़ता है.

#बच्चों के ऐसे वीडियो पहली बार वायरल नहीं हो रहे

भले ही शाहीन बाग में बच्चों के नारे लगाते वीडियो अब वायरल हो रहे हों. पर ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब पॉलिटिक्स में बच्चों के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठे हों.

2019 में लोकसभा चुनाव के दौरान कई ऐसे वीडियो वायरल हुए. जिनमें बच्चे बड़ी आतुरता से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी की तारीफ़ करते हुए दिख रहे हैं. जब 8-9 साल के बच्चे ऐसे बात करते हुए दिखते हैं तो अजीब लगता है. नाटकीय लगता है. उनके मुंह से नफ़रत से भरे शब्द सुनकर आपको अपने ही कानों पर यकीन नहीं होता.

इलेक्शन के दौरान ऐसे वीडियो ख़ूब वायरल हुए जिसमें बच्चे देखने को मिलें.
 इलेक्शन के दौरान ऐसे वीडियो ख़ूब वायरल हुए जिसमें बच्चे देखने को मिलें.

कुछ वीडियो काफ़ी परेशान कर देने वाले थे. स्क्रॉल में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, दिसंबर, 2019 में बीजेपी की एक रैली हुई थी. इसमें छोटे-छोटे बच्चे भी शरीक हुए थे. बीजेपी की टोपी पहने वो नारे लगा रहे थे-

‘देश के गद्दारों को, गोली मारो सा** को.’

‘अब हमारा हिंदुस्तान, मुल्ला भागो पाकिस्तान.’

इन बच्चों की उम्र 10 साल भी नहीं है. वो वही दोहरा रहे हैं, जो उनके बड़े कह रहे हैं.

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#ऐसे प्रदर्शनों में शामिल होने से बच्चों के दिमाग पर क्या असर पड़ता है

इस बड़े ही अहम सवाल पर हमने कुछ चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट्स से बात की. डॉक्टर नीलम शर्मा दिल्ली के सर गंगा राम हॉस्पिटल में मनोचिकात्सक हैं. वहीं डॉक्टर कृति दुबे दिल्ली में अपनी खुद की क्लिनिक चलाती हैं.

डॉक्टर नीलम शर्मा कहती हैं-

‘देखिए. चार से 10 साल के बच्चे जब पॉलिटिक्स या धर्म पर अपनी राय रखते हैं तो एक बात ज़ाहिर है. ये देन उनके माता-पिता की है. यानी जो आप सुन रहे हैं या देख रहें हैं वो उनके माता-पिता की सोच की परछाई है. क्योंकि इस उम्र में ऐसे मसलों पर एक पुख्ता राय रखना असंभव है. आप वो बोल रहे हैं जो आपके बड़ों ने आपको बोलने के लिए कहा है. आपको इन चीज़ों की साफ़ जानकारी नहीं है. उसकी ज़्यादा समझ नहीं है. आपके घर में जो बातें हो रही हैं या जो आपको सिखाया जा रहा है आप वो कर रहे हैं. बोल रहे हैं. इसका असर ये होता है कि ये बातें और राय उनके दिमाग पर छप जाती हैं. वो इन्हें सच मान लेते हैं. फिर वो तर्क नहीं समझते. आगे जाकर उन्हें स्ट्रेस और डिप्रेशन की दिक्कत हो सकती है.’

'आपके घर में जो बातें हो रही हैं या जो आपको सिखाया जा रहा है आप वो कर रहे हैं. बोल रहे हैं. '
           ‘आपके घर में जो बातें हो रही हैं या जो आपको सिखाया जा रहा है आप वो कर रहे हैं. बोल रहे हैं. ‘

डॉक्टर कृति दुबे भी यही मानती हैं. उनका कहना है-

‘छोटे बच्चे जब ऐसे वीडियोज़ में दिखाई देते हैं तो अजीब लगता है. आपको पता होता है उन्हें ये सब सिखाया गया है. 12 साल तक की उम्र ऐसी होती है जब आपकी सोच बन रही होती है. आपकी पर्सनालिटी बन रही होती है. इस वक़्त अगर आपके दिमाग में कुछ भर दिया जाए तो आप उसमें रम जाएंगे. प्रदर्शनों में शामिल होने का एक नतीजा ये है कि ऐसा माहौल उनके दिमाग में छप जाता है. आगे जाकर इससे उबर पाना आसान नहीं होता. नतीजा स्ट्रेस और डिप्रेशन. बच्चों को अपनी राय रखने का पूरा हक़ है. पर पॉलिटिक्स की इस उम्र में उनको न जानकारी होती है. न अपनी राय बनाने की छूट.’

ये तो रही डॉक्टर्स की राय. आपको क्या लगता है?


वीडियो

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