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इस बार के बजट में सबसे ज्यादा निराश करने वाली चीज़ ये रही

1 फरवरी. साल 2021 का बजट पेश हुआ. देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया क्या होंगे बही-खाते के खर्चे और उसमें जनता के चर्चे. अब इस बजट में कई बातें हुईं, लेकिन हमने सोचा बात की जाए महिलाओं से. कमासुत औरतें, कॉलेज जाने वाली स्टूडेंट्स, घर पर काम और बच्चे दोनों संभालतीं मम्मियां, हम और आप जैसी महिलाएं. इस बजट से क्या थीं उनकी उम्मीदें, और क्या बदलाव वो चाहती हैं, इन सब पर हमने बातचीत की. आप तक हम उनका नज़रिया पहुंचा रहे हैं.

पूजा स्तंभकार, अनुवादक, लेखक, ऑनलाइन कंटेंट सलाहकार हैं. दो भाषाओं में ब्लॉग लिखती हैं. अवॉर्ड भी मिल चुका है. कई अंतरराष्ट्रीय, भारतीय वेबसाइट और न्यूज़ साइट के लिए लिखती हैं. सिंगल पैरेंट हैं. उन्होंने बताया,

महिलाओं के किए हुए (केयरगिविंग) caregiving और अन्य कार्यों के लिए हमारे यहां सरकार से कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता. उन्हें हमेशा इन्वेस्टमेंट जैसी चीज़ें मुश्किल लगती हैं क्योंकि उन्हें वाकई जटिल बनाया जाता है. ये बजट बहुत जेनरलाइज करता है और महिलाओं और अन्य जेंडर से जुड़े लोगों के लिए अलग से कोई प्रावधान नहीं बनाये गए हैं. चाहे बात खेती की हो या उद्योगों की, महिलाओं के लिए अलग से कोई प्लान नहीं दिखा.

Pooja Priyam
पूजा कई किताबों का अनुवाद भी कर चुकी हैं.

बजट में क्या जोड़ना चाहेंगी इस सवाल पर पूजा ने बताया कि उनकी मांग है कि मेंस्ट्रुअल प्रोडक्ट्स में छूट मिले, मेंटल हेल्थ के लिए फंड हों. स्कूली शिक्षा में इन सब मुद्दों के लिए अलग प्रावाधान बनें जिन पर सरकार खर्चा करे. सिंगल मदर्स, अन्य जेंडर के लोगों को सामजिक सुरक्षा स्कीमों में फायदे दिए जाएं.

स्टूडेंट क्या चाहते हैं?

अनुष्का सिंह. दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ती हैं. इतिहास और कानून की चीज़ें पढ़ना बेहद पसंद है. उन्होंने कहा,

बजट से उम्मीद थी कि ये विस्थापित मजदूरों, खास तौर पर महिलाओं को कुछ आवंटित करेगा. किसानों से जुड़ी योजनाओं में औरतों के प्रतिनिधित्व पर जितना काम होना चाहिए, उतना नहीं हो रहा है. डिजिटल इंडिया की इतनी बात होती है, लेकिन महिलाओं के पास संसाधन नहीं हैं डिजिटल इंडिया में भागीदारी के. उसके लिए बजट में कुछ होना चाहिए, लेकिन नहीं हुआ.

Anushka Singh
अनुष्का आगे कानून की पढ़ाई करना चाहती हैं.

एक एक्टिविस्ट की ज़ुबानी

तारा कृष्णास्वामी. तकनीक के फील्ड में काम करती हैं और एक्टिविस्ट भी हैं. उन्होंने बताया,

निर्मला सीतारमण ने जब बजट पेश किया, तो शुरुआत में ही महिलाओं के बारे में बात की. लेकिन बजट में महिलाओं के लिए कुछ खास था नहीं. वित्त वर्ष के आखिर में ही पता चल पायेगा कि औरतों से जुड़े मुद्दों पर कितना खर्च हुआ. पूरा बजट आप दो-तीन एंगल्स से देख-समझ सकते हैं. औरतों से जुड़े समाजिक मुद्दों के लिए कितना बजट दिया गया है. NFHS (नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे) दिसंबर 2020 में जब आया था, उसकी रिपोर्ट आप देख सकते हैं कि महिलाओं में काफी गंभीर कुपोषण की परेशानी है. महिला एवं बाल विकास (WCD) मंत्रालय के तरफ से ये बात भी सामने आई कि महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा भी बढ़ी है. COVID के टाइम पर. बच्चों पर भी लॉकडाउन के दौरान स्कूल न जाने की वजह से बुरा असर पड़ा है. जो स्कूल में उन्हें खाना मिलता था, वो भी नहीं मिल पाया, तो कई बच्चों में पोषण की कमी रह गई.

Tara Krishnaswamy
तारा समाज में जागरूकता बढाने का भी काम करती हैं.

उम्मीद थी कि इस बार बजट में इन सब पर ध्यान दिया जाएगा. लेकिन महिला एवं बाल विकास के लिए इस बार पिछले साल से 27 फीसद कम हिस्सा दिया गया है बजट में.आंगनबाड़ी या आशा वर्कर्स की सैलरी में भी कुछ बढ़ोतरी नहीं हुई है. जबकि इनको फ्रंटलाइन वर्कर्स कहा गया. खुद PM मोदी ने लॉकडाउन के दौरान इनके योगदान की तारीफ की थी. पिछले साल के मुकाबले इस साल ये बजट भी कम है.

MNC में काम करने वाले क्या कहते हैं?

एकता. मार्केटिंग प्रोफेशनल हैं. MNC में काम करती हैं. उन्होंने बताया कि एक टैक्सपेयर के तौर पर वो यही देखती हैं कि टैक्स स्लैब में कोई बदलाव हुआ है या नहीं. वो इस साल हुआ नहीं. उसके अलावा छोटे-मोटे ही बदलाव हैं. निजी तौर पर बजट में कोई ख़ास चेंज नहीं दिखा. उन्होंने कहा,

करदाता के तौर पर एक अहम चीजं मैंने ये देखी कि एफोर्डेबल हाउसिंग पर जो टैक्स रिबेट थी वो 2022 तक बढ़ गई है. ये पहले 2019 में इंट्रोड्यूस हुई थी. इससे जो लोग लोन लेकर घर लेना चाहते हैं उनके लिए थोड़ी आसानी हो जाएगी. अगर बजट वाले दिन हिसाब में रखें तो बाज़ार का रिस्पांस अच्छा रहा. ये एक पॉजिटिव इंडिकेटर है. बजट में बदलाव की बात करें तो एक चीज़ मैं बदलना चाहूंगी. हमारे टैक्स स्लैब बदले जाएं. ये ज़रूरी है. इन्फ्लेशन बढ़ा है, इन सबको ध्यान में रखना चाहिए.

फाइनेंस में काम करने वाली महिला क्या कहती है?

दिव्या द्विवेदी. MBA हैं. फाइनेंस में तकरीबन एक दशक से भी ज्यादा का एक्सपीरियंस है इनका.  इनसे भी हमने बजट की बाबत बात की. दिव्या का कहना है,

वैश्विक महामारी के दौर में सबसे ज्यादा असर औरतों पर हुआ था. अप्रैल 2020 तक 17 मिलियन (1 करोड़ 70 लाख) महिलाओं के रोजगार पर प्रभाव पड़ा था. इसके बाद जब सारी चीजें खुलीं, तो पुरुषों को तो काम मिल गया, लेकिन औरतों को वापस रोजगार नहीं मिल पाया. जब बजट पेश होना था एक महिला होने के नाते मैंने भी ये उम्मीद की थी कि इन सारी बातों को ध्यान में रखते हुए औरतों को रोजगार से जुड़ी सुविधाएं मिलेंगी. जैसे कि कई नौकरियों में जो उम्र की सीमा है उसे हटा दिया जाएगा. महिलाओं के व्यवसायी बनने के संबंध में उनके लिए कई तरह के लोन की नई-नई स्कीमें शुरू की जाएंगी. लेकिन ये बजट उम्मीद पर खरा नहीं उतरा.

Divya Dwivedi
दिव्या दो बच्चों की मां हैं, और आगे अपना वेंचर खोलने के प्लैन हैं इनके.

50 से 55 उम्र की महिलाओं के लिए खास प्रोत्साहन की व्यवस्था होती तो बेहतर होता. क्योंकि इसके पहले तक महिलाएं घर परिवार, बच्चों के बीच फंसी होती हैं. 50 के आस-पास जब कुछ करना चाहती हैं तो नौकरी के दरवाजे बंद होते हैं, चाहे वो सरकारी हो या प्राइवेट. एक व्यवसायी के लिए उम्र की कोई सीमा नहीं होती, इसलिए सरकार को व्यवस्था करनी चाहिए कि उन्हें एक व्यवसायी के रूप में खड़े होने का मौका दें.

आपका क्या सोचना है बजट के बारे में, हमें कमेन्ट सेक्शन में बताइए.


वीडियो: बजट 2021: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बहिखाते में औरतों के लिए क्या था?

 

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