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बिहार, झारखंड और असम में कई जगह 'कोरोना माई' की पूजा क्यों की जा रही है

‘हम लोग पार्क जा रहे हैं. कोरोनामाई की पूजा करने’

‘कोरोना माई की जय हो. बिहार से भाग जाओ. कोरोना माई भाग जाओ’ 

ये कुछ पंक्तियां हैं, जो आपको नीचे लगे वीडियो में देखने को मिलेंगी. बिहार के कुछ हिस्सों में कोरोना वायरस का प्रकोप ख़त्म करने के लिए पूजा की जा रही है, ताकि ‘कोरोना माई’ उन पर नाराज़ न हों.

ये मामला सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं है. ‘आज तक’ में छपी रिपोर्ट के अनुसार, असम के बिश्वनाथ चाराली से लेकर दरंग और गुवाहाटी जैसे जिलों में लोग ‘कोरोना देवी’ की पूजा कर रहे हैं. बिश्वनाथ चाराली में शनिवार को महिलाओं के एक समूह ने नदी के तट पर ‘कोरोना देवी’ की पूजा की. समूह में शामिल एक महिला ने कहा कि उनका विश्वास है कि अब इस जानलेवा वायरस का अंत करने का एकमात्र तरीका यही पूजा है.

रिपोर्ट के अनुसार, महिला ने कहा,

‘हम कोरोना माता की पूजा कर रहे हैं. पूजा के बाद हवा आएगी और वायरस को भस्म कर देगी.’

झारखंड के रांची, जमशेदपुर और धनबाद से भी ऐसी ही खबरें आईं. न्यूज 18 में छपी रिपोर्ट के अनुसार, एक वीडियो वायरल हुआ सोशल मीडिया पर. इसमें ये बताया गया कि दो महिलाओं ने एक गाय को महिला में बदलते देखा. गाय से इंसान बनी उस महिला ने कहा कि वो कोरोना माता है. सोमवार और शुक्रवार को पूजा करने से वो चली जाएंगी. इसके बाद से कोरोना माई की पूजा की घटनाएं बढ़ी हैं.

बीमारी और ‘माता’

बचपन में कई कहानियों में पढ़ने को मिला, साथ ही साथ घर पर भी बड़े-बूढ़ों से सुनने को मिला. कि कई बार बच्चों को ‘माता’ आ जाती हैं. थोड़ी अकल आई, तो पता चला, चेचक को कहते हैं. बड़ी माता और छोटी माता, दो नाम इस्तेमाल होते हैं. शीतला माता भी कहा जाता है कई जगहों पर. वहीं अंग्रेजी में स्मॉल पॉक्स और चिकनपॉक्स नाम है इनका. दोनों अलग-अलग बीमारियां हैं. दिखने में एक जैसी होती हैं, क्योंकि दोनों में ही शरीर में फोड़े निकल आते हैं. जलन होती है. कई बार घाव भी हो जाते हैं.

दोनों ही वायरस की वजह से होते हैं. लेकिन जहां चिकन पॉक्स गंभीर बीमारी नहीं है, वहीं स्मॉलपॉक्स से जानें भी जा चुकी हैं. स्मॉल पॉक्स की वैक्सीन बनने के बाद इस बीमारी को लगभग जड़ से मिटा दिया गया है. लेकिन चिकनपॉक्स अभी भी लोगों को होता है. ख़ास तौर पर बच्चों को. लेकिन टीका लगवाने वाले बच्चे इससे सुरक्षित रहते हैं.

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स्मॉलपॉक्स और चिकनपॉक्स के दानों में अंतर. (तस्वीर साभार: WebMD)

क्या है ऐसी बीमारियों को ‘माता’ कहने के पीछे की वजह?

तारा शंकर दिल्ली यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं. वो लिखते हैं,

कॉलेरा को हैज़वा माई, चिकन पॉक्स को शीतला माता, स्माल पॉक्स को छोटी माता माना जाता है. इन बीमारियों को ये नाम तब मिले, जब ये लगभग असाध्य थीं और इंसानी समझ और इलाज से परे की चीज़ थीं. 

‘ऑडनारी’ ने बात की डॉक्टर एकता पुरी से. ये अपोलो हॉस्पिटल में चीफ क्लिनिकल साइकॉलजिस्ट हैं. 21 साल से प्रैक्टिस कर रही हैं. उनसे हमने पूछा कि आखिर लोग किसी बीमारी को इस तरह पूजने क्यों लगते हैं. क्या मानसिकता होती है इसके पीछे. उन्होंने बताया,

इस वक़्त कोरोना का हमारे पास कोई इलाज नहीं है. जब कोई व्यक्ति इस तरह की परिस्थिति में फंस जाता है, जहां उसके पास कोई दूसरा उपाय नहीं होता, तो वो ऐसे तरीकों का सहारा लेता है.

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डॉक्टर एकता पुरी. (तस्वीर: स्पेशल अरेंजमेंट)

डॉक्टर पुरी ने बताया कि भारत में इस तरह की प्रार्थना और पूजा की आदत हमारे भीतर बचपन से डाली जाती है, तो वो चीज़ बाद में भी हमारे बिहेवियर में दिखती है. अभी इस तरह की खबरें लगातार आ रही हैं. कोरोना के साथ-साथ भूकंप, चक्रवात भी आ रहे हैं. तो लोग ऐसे पूजा-पाठ में अपना सपोर्ट सिस्टम ढूंढ रहे हैं. ऐसे मामलों में तार्किकता के ऊपर विश्वास हावी हो जाता है. उनके लिए ये डूबते को तिनके का सहारा वाली बात है.

उन्होंने कहा कि अगर ये मास हिस्टीरिया में बदलता है, तो कोरोना जैसे संक्रामक रोगों के मामलों में नुकसान पहुंचा सकता है. लोग बाहर निकल साथ में पूजा कर रहे हैं, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन नहीं कर रहे हैं. ये ज्यादा खतरनाक है.


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