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कोविड-19 को हराने के लिए नाक के ज़रिए दी जाने वाली वैक्सीन कैसे काम करेगी

यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से ज़रूर पूछें. दी लल्लनटॉप आपको अपनी मर्जी से दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.


 

इस वक़्त दुनिया में हर इंसान की एक ख्वाहिश है. भई, जल्दी से अब कोविड-19 की वैक्सीन आ जाए. वैसे दुनियाभर के साइंटिस्ट्स, डॉक्टर्स इस कोशिश में लगे भी हैं. आपके और हमारे लिए एक ख़ुशख़बरी आई है. क्या? इंडिया की भारत बायोटेक कंपनी कोविड से लड़ने के लिए एक इंट्रानेज़ल वैक्सीन बना रही है. अव्वल तो ये सिंगल डोज़ वैक्सीन होगी. दूसरी बात, बाकी वैक्सीन आपको इंजेक्शन के रूप में दी जाती हैं. इस वैक्सीन की ये ख़ासियत है कि ये इंट्रानेज़ल है. यानी ये आपको नाक के ज़रिए दी जाएगी. जैसे हम नाक खोलने के लिए नेज़ल स्प्रे लेते है न, वैसे. अब इसे बनाने वाली हैदराबाद की कंपनी भारत बायोटेक ने इसे बनाने के लिए हाथ मिलाया है वाशिंगटन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ़ मेडिसिन से. ये एक अमेरिकन यूनिवर्सिटी है. अमेरिका के सेंट लूइज़ शहर में.

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एक बार ये वैक्सीन बन गई, तो भारत बायोटेक इसे कहीं भी बेच सकता है, अमेरिका, जापान और यूरोप छोड़कर. हां, हां मुझे पता है, आप क्या बातें जानना चाहते हैं. एक-एक करके आपके सारे सवालों के जवाब मिलेंगे. सबसे पहले तो ये जानते हैं कि ये इंट्रानेज़ल वैक्सीन असल में होती क्या है?

क्या होती है इंट्रानेज़ल वैक्सीन?

ये हमें बताया डॉक्टर अंकुर जैन ने. एमडी मेडिसिन हैं. AIIMS रायपुर में.

डॉक्टर अंकुर जैन, एमडी मेडिसिन, AIIMS, रायपुर
डॉक्टर अंकुर जैन, एमडी मेडिसिन, AIIMS, रायपुर

– वैक्सीन एक सब्सटेंस होती है, जिसको एक बैक्टीरिया या वायरस के बॉडी स्ट्रक्चर से लिया जाता है.

– फिर इंसानों के शरीर में डाला जाता है.

-ताकि उससे इम्यून रिस्पॉन्स जनरेट हो सकें और हम उस इन्फेक्शन से बच सकें.

-वैक्सीन बहुत सारे प्रकार की होती हैं. मांसपेशियों के अंदर लगती हैं, जिसको इंट्रा मस्क्यूलर वैक्सीन कहते हैं. जैसे टिटनेस.

-ये वैक्सीन ओरल फॉर्म में भी होती है, जैसे पोलियो की ओरल ड्रॉप्स.

-उसी तरह एक वैक्सीन होती है इंट्रानेज़ल वैक्सीन.

-ये नेज़ल स्प्रे के फॉर्म में होती है, जिसे नाक के अंदर डालते हैं.

-ये वैक्सीन नाक के अंदर की सतह से होते हुए बॉडी के अंदर जाती है.

पहले भी कई बीमारियों के लिए इंट्रानेज़ल वैक्सीन को बनाया जा चुका है
पहले भी कई बीमारियों के लिए इंट्रानेज़ल वैक्सीन को बनाया जा चुका है

-बॉडी में इम्यून सिस्टम को एक्टिवेट करती है.

-इंट्रानेज़ल वैक्सीन इस टाइम कोविड-19 के समय बहुत महत्व रखती है.

-इंट्रानेज़ल वैक्सीन का एक फ़ायदा ये है कि ये कम समय में ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को लगाई जा सकती है.

-कोविड-19 की वैक्सीन ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को लगाने की ज़रूरत है.

-दूसरी बात. इसको लगाने का ख़र्च. लगाने के लिए सिखाने का खर्च कम है. टाइम भी कम लगेगा.

अब आते हैं दूसरे सबसे बड़े सवाल पर. कोविड-19 के लिए बनाई जा रही ये वैक्सीन कैसे काम करेगी? और क्या इसके कोई साइड इफ़ेक्ट होंगे?

कोविड-19 की इंट्रानेज़ल वैक्सीन कैसे काम करेगी?

ये हमें बताया डॉक्टर मोनिका लांबा ने. ये साइंटिस्ट हैं जर्मनी में.

मोनिका लांबा, साइंटिस्ट, जर्मनी
मोनिका लांबा, साइंटिस्ट, जर्मनी

-इंट्रानेज़ल वैक्सीन नाक के ज़रिए दी जाएगी.

-ये एक स्प्रे की तरह हो सकती है, जिसे आप सांस के ज़रिए अंदर ले सकें.

-हमारे शरीर में दो तरह की इम्युनिटी होती है- इन्नेट इम्युनिटी और अडेप्टिव इम्युनिटी.

-इन्नेट इम्युनिटी में जैसे ही कोई आपके शरीर पर वायरस या बैक्टीरिया अटैक करता है, तो वो उसी समय कार्यरत हो जाती है.

-अडेप्टिव इम्युनिटी में थोड़ा समय लगता है.

-बी सेल्स और टी सेल्स. ये दो सेल्स होते हैं अडेप्टिव इम्युनिटी में. बी सेल्स एंटीबॉडी बनाते हैं IGG, IGM.

-नाक की अंदरूनी सतह पर भी बी सेल्स होते हैं, जो एक स्पेशल तरीके की एंटीबॉडी बनाते हैं, जिसे हम कहते हैं IGA.

-अगर इंट्रानेज़ल वैक्सीन नाक के ज़रिए दी जाएगी, तो खून में जो एंटीबॉडी बन रही हैं, उनका भी फ़ायदा मिलेगा और नाक में मौजूद एंटीबॉडी IGA का भी फ़ायदा मिलेगा.

साइड इफ़ेक्ट

-अब तक इंट्रानेज़ल वैक्सीन केवल फ्लू में ही दी गई है.

-इसका डेटा बहुत ही लिमिटेड है.

-अभी बनाई जा रही इंट्रानेज़ल वैक्सीन का पहला फेज़ ऑफ़ क्लिनिकल ट्रायल USA में होगा.

-बाकी के फेज़ 2 और 3 भारत में होंगे.

ये वैक्सीन नाक के अंदर की सतह से होते हुए बॉडी के अंदर जाती है (सांकेतिक तस्वीर)
ये वैक्सीन नाक के अंदर की सतह से होते हुए बॉडी के अंदर जाती है (सांकेतिक तस्वीर)

-क्लिनिकल ट्रायल के बाद ही पता चलेगा कि ये वैक्सीन कितनी प्रभावशाली है और क्या इसके साइड इफ़ेक्ट हैं.

-क्योंकि ये नाक में ही दी जा रही है और नाक से ही वायरस अंदर जा रहा है, तो वैक्सीन प्रभावशाली होने की उम्मीद है.

अगर ये इंटरनेज़ल वैक्सीन काम कर गई, तो बल्ले-बल्ले है. क्योंकि ये पहली बार नहीं हुआ है कि किसी बीमारी से लड़ने के लिए इंट्रानेज़ल वैक्सीन का इस्तेमाल किया जा रहा है. चलिए जानते हैं कोविड-19 से पहले और कब और किस बीमारी के लिए इस तरह की वैक्सीन्स का इस्तेमाल किया गया है.

पहले कब इस्तेमाल हुई है ऐसी वैक्सीन

-पहले भी कई बीमारियों के लिए इंट्रानेज़ल वैक्सीन को बनाया जा चुका है.

-जैसे इन्फ्लुएंजा की फ़्लूमिस्ट वैक्सीन.

-ख़सरा (measles) के लिए भी इंट्रानेज़ल वैक्सीन बनाई गई थी.

-इंट्रानेज़ल वैक्सीन में देखा गया था कि इससे जो शरीर में इम्यून रिस्पांस बनती है, वो इतनी नहीं बनती जितनी मांसपेशियों में वैक्सीन लगाने पर बनती है.

-साइड इफ़ेक्ट में देखा गया है कि एलर्जी हो सकती है.

-सिर में दर्द हो सकता है.

-छोटा-मोटा बुखार भी हो सकता है.

-कभी-कभी गले में ख़राश, बहती नाक इसके साइड इफ़ेक्ट हैं.

चलो. उम्मीद है कि जल्द ही इनमें से कोई वैक्सीन हमें कोविड-19 से छुटकारा दिलवाएगी.


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