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अफगानिस्तान की बचा पोश प्रथा, जिसमें लड़कियों को लड़कों के जैसे रखा जाता है

अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्ज़े के बाद सबसे ज़्यादा जिस मुद्दे पर सबसे ज़्यादा बात हो रही है वो है अफगान औरतों की स्थिति. दुनियाभर में लोग अफगान औरतों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं. तालिबान ने साल 1996 से 2001 तक अफगानिस्तान में शासन किया था. उस वक़्त आठ साल से बड़ी बच्चियों के स्कूल जाने पर रोक लगा दी गई थी. बिना किसी पुरुष के महिलाएं घर के बाहर नहीं निकल सकती थीं और बुर्का पहनना अनिवार्य था. जो भी महिला इन कानूनों को तोड़ती थीं उन्हें खुले आम कोड़े मारे जाते थे. अब अफगानिस्तान में फिर से तालिबान आ गया है. और औरतों पर फिर से वैसे ही प्रतिबंध लागू हो गए हैं.

तालिबान ने वादा ज़रूर किया था कि वो महिलाओं को आज़ादी और उनका अधिकार देगा. लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है. इन सबके बीच सोशल मीडिया पर अफगानिस्तान की एक ऐसी प्रथा पर चर्चा शुरू हो गई है जो महिला और पुरुषों को बराबर अधिकार देता है.  इस परंपरा का नाम है बचा पोश.

क्या है Bacha Posh

बचा पोश अफगानिस्तान की वो परंपरा है जिसमें लड़कियों को लड़कों की तरह बड़ा किया जाता है. उनके हेयर स्टाइल से लेकर पहनावे तक सब लड़कों की तरह होते हैं. उन्हें पढ़ाई और खेलकूद के लिए भी लड़कों के बराबर ही मौके दिए जाते हैं. इस परंपरा में उनके अकेले बाहर घूमने पर भी रोक नहीं लगाई जाती. उन्हें लड़कों के समान काम पर भी भेजा जाता है और घर चलाने की जिम्मेदारी भी उनके कंधे पर डाली जाती है. हालांकि, ये व्यवस्था केवल तब तक लागू होती थी जब तक लड़की की प्यूबर्टी न आ जाए.

जेनी नोर्डबर्ग की एक किताब है. The Underground Girls of Kabul. हिंदी में इसका रफ ट्रांसलेशन होगा- काबुल की छुप हुई लड़कियां.  इसमें उन्होंने बताया कि जिन परिवारों में कोई लड़का नहीं पैदा होता, वो लड़की को ‘बचा पोश’ के ज़रिए लड़के के तरह रखते हैं. प्यूबर्टी की उम्र आने के बाद लड़कियों को आम लड़की की तरह रहना होता है. कई की शादी करवा दी जाती है और वो मां या बीवी बनकर रहती हैं. जेनी की किताब के मुताबिक, कई लड़कियां हमेशा ऐसी ज़िंदगी जीना चाहती हैं, लेकिन उनकी सुनी नहीं जाती.

जेनी कहती हैं –

“इस परंपरा की जड़ में भी असमानता है. पर फिर भी यह एकमात्र तरीका है जिससे कुछ लड़कियों को इसके कारण आज़ादी का स्वाद तो चखने मिलता है. यह बहुत रिस्की प्रथा है.लेकिन अफगान समाज के लिए यह बेहतर ही है. जहां तालिबान के आते ही औरतों के साथ भेदभाव के मामले सामने आ रहे हैं. जबकि उन्होंने कहा था कि ऐसा नहीं होगा.”

CNN की एक रिपोर्ट के अनुसार जेनी का कहना है कि बचा पोश में लड़कियों को बेसिक राइट्स मिलते हैं. वो पैन्ट्स पहन सकती हैं, छोटे बाल रख सकती हैं. घर की कैद से आज़ादी मिलती है. दुनिया को देख और समझ सकती है. एक ऐसे समाज में जहां शिक्षा का अधिकार केवल लड़कों को है, वो वहां पढ़ने जा सकती है. सेफली स्कूल जा सकती है. बचा पॉश कुछ लड़कियों के लिए आज़ादी जैसा है तो कुछ के लिए बोझ. कुछ लड़कियों के लिए यह एक विशेषाधिकार है जहां शिक्षा या कुछ आज़ादी मिल जाती है. वो बिना हिजाब पहने बाइक पर अपने पिता के साथ घूमने जा पाती हैं.

जेनी मानती हैं कि बचा पोश की प्रथा को तालिबान अप्रूव नहीं करेगा. अगर कोई परिवार ये करता है तो उसे बहुत ज्यादा सावधान रहना होगा. क्योंकि तालिबान किसी भी रूप में महिलाओं की आज़ादी के खिलाफ खड़ा है. यह प्रथा एक ऐसे समाज की सच्चाई दिखाती है जहां लड़कियों को सेकंड क्लास सिटिज़न की तरह ट्रीट किया जाता है. लेकिन तालिबान जैसी व्यवस्था में जहां औरतों को इतनी भी आज़ादी नहीं दी जाती कि वो पढ़ सकें, वहां ऐसी प्रथा लड़कियों को सांस लेने की थोड़ी जगह दे सकती है.


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