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लड़की की हत्या पर लोगों ने दुख जताया, डोनेशन दिए, फिर ऐसा क्या हुआ कि वापस लेने लगे?

नौ साला की बच्ची. लेबनान नाम के देश में रहती थी. वहां पर बढ़ रही हिंसा का असर उसके परिवार पर भी पड़ रहा था. एक अटैक में उसके पिता को भी गोली लगी. इसके बाद उन्होंने निर्णय लिया, ये देश छोड़ देंगे. अपने परिवार समेत इंग्लैंड आ गए. पति-पत्नी, और उनके चार बच्चे. ये नौ साल की बच्ची अपने भाई बहनों में सबसे बड़ी थी. ब्रिटेन में आते ही उसनें यहां का रहन-सहन अपना लिया. नौ साल की उम्र से 19 साल की टीनेजर तक. खूब पढ़ी-लिखी. कानून की पढ़ाई कर रही थी. कॉलेज के दूसरे साल में थी. उस कॉलेज की लॉ सोसाइटी की वाइस प्रेसिडेंट थी. इंटरनेशनल लॉ में काम करना चाहती थी.

थी इसलिए, क्योंकि 17 मई को उसे गोली मार दी गई.

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आया के परिवार वालों ने उसकी कुछ तस्वीरें जारी कीं. ये उसके जन्मदिन की एक तस्वीर है. (तस्वीर साभार: Lancashire Police)

कौन थी आया? क्यों मारा गया उसे?

यूनिवर्सिटी ऑफ सैलफोर्ड में ग्रेजुएशन कर रही थी. ब्लैकबर्न, लंकाशायर नाम की जगह पर रहती थी अपने परिवार के साथ. लंकाशायर इंगलैंड का एक शहर है.  17 मई को लिडल सुपरमार्केट के पास शॉपिंग कर रही थी. तभी वहां से एक गाड़ी गुजरी. उस गाड़ी से दो गोलियां चलीं. और एक गोली सीधे आया की छाती में धंसी, और उसकी मौत हो गई.

‘द गार्डियन’ में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़ इस हमले का निशाना कोई और था. आया को गलती से गोली लगी. इस मामले से जुड़े सभी संदिग्धों का पता लगाने में पुलिस जुटी हुई है. अभी तक छः लोगों को हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया जा चुका है. ये हैं फ़िरोज़ सुलेमान, अबू बाकिर सातिया, उथमान सातिया, जूडी चैपमैन, काशिफ़ मंज़ूर, और अयाज़ हुसैन.

पुलिस ने क्या कहा?

‘बीबीसी’ की रिपोर्ट के अनुसार पुलिस ऑफिसर एंडी क्रिबिन ने कहा कि पुलिस की जांच तेजी से आगे बढ़ी है, लेकिन अभी ख़त्म नहीं हुई. उन्होंने कहा,

‘आया की ऐसी बेमतलब मौत के पीछे कौन ज़िम्मेदार है, और असल में क्या हुआ था, इसकी जानकारी जुटाने के लिए हमारा निश्चय दृढ़ है और हम इसका पता लगा कर रहेंगे. हम आया के परिवार और जनता को उनके सपोर्ट के लिए शुक्रिया अदा करना चाहते हैं’.

परिवार ने क्या कहा?

आया के परिवार ने एक पब्लिक स्टेटमेंट जारी करके कहा कि उनकी प्यारी बेटी उनसे बेहद डरावने हालत में उनसे छीन ली गई.

‘वो बेहद वफादार और समर्पित बेटी थी, जो अपने परिवार के साथ समय बिताना पसंद करती थी.किहास तौर पर अपने भाइयों इब्राहम, आसिल, और आमिर के साथ’.

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आया की मौत के बाद एक नया विवाद शुरू हो गया है. ख़ास तौर पर ट्विटर पर इसे लेकर काफी बहस चल रही है. (तस्वीर साभार: Lancashire Police)

आया की मौत के बाद विवाद

आया की मौत की खबर पता चलते ही लोगों का हुजूम उसके लिए सहानुभूति जताने उमड़ पड़ा. लोगों ने डोनेशन देने शुरू किए उनके परिवार को. ताकि उसके अंतिम संस्कार इत्यादि के लिए पैसे जुटा कर परिवार को दिए जा सकें. उसकी याद में एक मस्जिद बनवाने की बात भी कही गई. लेकिन इसी बीच पता चला कि आया शिया थीं. इसके बाद कई लोगों ने डोनेशन वापस लेने या फिर न देने की बात की. सिर्फ इस वजह से कि वो एक शिया परिवार की मदद करने में हिचक रहे थे. ट्विटर पर इस चीज़ से काफी बवाल हुआ. जिस व्यक्ति ने फंडरेजिंग प्रोजेक्ट शुरू किया था, वही पलट गया.

लोगों ने इस विवाद की जमकर आलोचना की. एक मासूम 19 साल की लड़की की ह्त्या कर दी गई. उस पर भी लोगों को शिया-सुन्नी करने की सूझ रही है.

अल जज़ीरा के जर्नलिस्ट मेहदी हसन ने भी एक आर्टिकल ट्वीट करके उसमें से एक कोट लिखा,
आया शिया थी, तो क्या?

क्या है शिया और सुन्नी का फर्क?

पूरी दुनिया की मुस्लिम आबादी आम तौर पर दो भागों में बंटी है शिया और सुन्नी. पूरी दुनिया में इस्लाम को लाने वाले हैं पैगंबर मुहम्मद. पैगंबर मुहम्मद के बाद इस्लाम दो भागों में बंट गया. एक धड़ा कहता था कि पैगंबर मुहम्मद के बाद उनके चचेरे भाई और दामाद अली मुहम्मद साहब के उत्तराधिकारी हैं. वहीं दूसरा पक्ष मानता था कि असली वारिस अबू बकर को होना चाहिए. अबू बकर पैगंबर हजरत मुहम्मद के ससुर थे. जिसने अली को उत्तराधिकारी माना, वो शिया कहलाए. जिन्होंने अबू बकर को उत्तराधिकारी माना वो कहलाए सुन्नी. शिया ने अपने लिए इमाम का चुनाव किया, वहीं सुन्नी ने अपने लिए खलीफा का.

इस तरह से शिया के पहले इमाम अली हुए और सुन्नी के पहले खलीफा अबू बकर. अबू बकर के बाद इस्लाम के खलीफा हुए उमर और उस्मान. इन दोनों की हत्या कर दी गई. इसके बाद सुन्नी के खलीफा बने अली. लेकिन ये अली शिया के इमाम भी थे. दोनों ने ही अली को मान्यता दे दी. लेकिन अली की भी हत्या कर दी गई. अली की हत्या के बाद उनके बेटे हसन को इमाम माना गया. लेकिन हसन की भी हत्या हो गई. इसके बाद शिया ने हुसैन को अपना इमाम मान लिया. इसी के बाद हुई कर्बला की जंग. कर्बला की जंग शियाओं के इमाम हुसैन और उस वक्त के सुल्तान और खुद को खलीफा घोषित कर चुके यज़ीद के बीच हुई थी.


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