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असमः शॉर्ट्स पहनकर आई लड़की को पर्दा लपेटकर देना पड़ा यूनिवर्सिटी का एंट्रेंस एग्ज़ाम

कोई समाज कितना आगे बढ़ रहा है, उसने खुद को कितना बदला है, इस बात का ठीक-ठीक अंदाज़ा लगाने के लिए आप ये देखिए कि वो समाज लड़कियों को लेकर क्या सोचता है? लड़कियों की पढ़ाई, पहनावे से लेकर उनके हर एक अधिकारों के बारे में उसकी राय क्या है. हम बार-बार देखते हैं कि हमारे समाज का एक धड़ा लड़कियों के अधिकारों पर बड़ा ज़ोर देता है, लेकिन उसी समाज के कुछ लोग आज भी लड़कियों के पहनावे जैसी छोटी-छोटी चीज़ों पर सवाल उठाते रहते हैं. और तथाकथित नैतिकता उनके सिर मढ़ते रहते हैं. हालिया मामला आया है असम से. यहां 19 साल की एक लड़की एक यूनिवर्सिटी का एंट्रेंस एग्ज़ाम देने गई थी, लेकिन उसे एग्ज़ाम हॉल में इसलिए नहीं घुसने दिया जा रहा था, क्योंकि उसने शॉर्ट्स पहने थे.

क्या है पूरा मामला?

असम में तेज़पुर नाम का एक शहर है, जो सोनितपुर ज़िले में आता है. ‘इंडिया टुडे’ से जुड़े पत्रकार हेमंता कुमार नाथ की रिपोर्ट के मुताबिक, तेज़पुर के गिरिजानंद चौधरी इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी में 15 सितंबर के दिन एक एंट्रेंस एग्ज़ाम हुआ. ये एग्रीकल्चरल एंट्रेंस एग्जाम था, जिसे असम एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी ने आयोजित किया था. इस यूनिवर्सिटी को शॉर्ट में AAU कहते हैं. ये जोरहाट में स्थित है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, 19 साल की जुबली तामुली भी इस एग्ज़ाम में शामिल होने आई थीं. लेकिन उन्होंने शॉर्ट्स पहने थे. और इसी वजह से उन्हें एग्ज़ाम हॉल में घुसने नहीं दिया गया था. उन्हें मजबूरन अपने पैरों पर पर्दा लपेटना पड़ा, तब जाकर उन्हें एग्ज़ाम हॉल में जाने की परमिशन मिली.

जुबली अपने पिता के साथ असम के बिस्वनाथ चाराली सिटी से तेज़पुर आई थीं, केवल ये एग्ज़ाम देने. दोनों शहरों के बीच करीब 70 किलोमीटर की दूरी है. जुबली ने मीडिया को बताया कि एग्ज़ाम वैन्यू में जब उन्होंने एंट्री ली, तो उन्हें किसी ने कोई रोक-टोक नहीं की. लेकिन जब वो एग्ज़ाम हॉल में जाने लगीं, तो उन्हें रोक दिया गया. जुबली बताती हैं-

“प्रॉपर चेक करने के बाद अथॉरिटीज़ ने मुझे एग्ज़ामिनेशन वैन्यू में जाने की परमिशन दे दी थी. जब मैं एग्ज़ाम हॉल में जा रही थी, तब एक ऑब्ज़र्वर ने मुझे साइड में खड़ा कर दिया और इंतज़ार करने को कहा, बाकी स्टूडेंट्स अंदर जाते रहे. मेरे पास मेरे सारे डॉक्यूमेंट्स थे, एडमिट कार्ड, आधार कार्ड सबकुछ. लेकिन उन्होंने वो चेक नहीं किया. ये कहा कि शॉर्ट ड्रेस अलाऊ नहीं है. मैंने पूछा कि ऐसा क्यों? जबकि ऐसा तो कुछ एडमिट कार्ड में मेंशन नहीं किया गया था. तब उन्होंने मुझसे कहा कि मुझे खुद इस बात की जानकारी होनी चाहिए थी. मुझे कैसे पता होता, जब एडमिट कार्ड में ऐसा कुछ मेंशन ही नहीं था.”

जुबली आगे पूछती हैं कि क्या शॉर्ट ड्रेस पहनना कोई अपराध है? वो कहती हैं-

“कई लड़कियां पहनती हैं शॉर्ट ड्रेस. अगर वो इसे परमिट नहीं करते हैं, तो उन्हें एडमिट कार्ड में मेंशन करना चाहिए था. जब मैंने ऑब्ज़र्वर से कहा कि मेरे पिता आपसे बात करना चाहते हैं, तो उन्होंने बात करने से मना कर दिया. फिर आखिर में मेरे पिता से कहा कि मेरे लिए एक पैंट लेकर आएं.”

जुबली बताती हैं कि उनके पिता बाबुल तामुली आठ किलोमीटर दूर मार्केट गए थे पैंट लाने के लिए. जब वो वापस आए तो उन्हें बताया गया कि प्रॉब्लम सॉल्व कर दी गई है. और आपको पता है कि क्या सॉल्यूशन निकाला गया था. ये कि जुबली अपने पैरों पर पर्दा लपेटकर एग्ज़ाम देने बैठें. जुबली बताती हैं-

“जब मेरे पिता पैंट लेकर वापस नहीं लौटे, उस वक्त दो लड़कियां एक पर्दा लेकर आईं और मुझसे कहा कि मैं उसे लपेट लूं. बाद में उसे ही लपेटकर में एग्ज़ाम हॉल में पहुंची.”

“इंडियन एक्सप्रेस” की रिपोर्ट के मुताबिक, उनसे ऑब्ज़र्वर ने ये भी पूछा था कि क्या उनमें कोई कॉमन सेंस नहीं है? ऐसे में वो ज़िंदगी में आगे कामयाबी कैसे पाएंगी? उन्होंने मीडिया को बताया कि ऑब्ज़र्वर्स ने कोविड प्रोटोकॉल्स चेक नहीं किए, ये नहीं देखा कि मास्क लगाया है या नहीं, और न ही शरीर का तापमान चेक किया. 19 साल की ये लड़की बताती है कि जिन कपड़ों में वो AAU का एंट्रेंस एग्ज़ाम देने गई थीं, उन्हीं कपड़ों में कुछ दिन पहले उन्होंने NEET का एग्ज़ाम भी दिया था, लेकिन तब किसी ने उन्हें टोका नहीं था.

वो इस बात पर भी सवाल उठाती हैं कि जब एक लड़का बनियान पहनकर घूमता है, या फिर अपना शरीर दिखाते हुए पब्लिक में घूमता है, तो लोग उसे कुछ नहीं कहते, लेकिन जब लड़कियां शॉर्ट्स पहनती हैं, तो लोग उंगलियां उठाने लग जाते हैं. भले ही पर्दा लपेटने के बाद जुबली को एग्ज़ाम देने की परमिशन मिल गई, लेकिन ये पूरा वाकया उनके लिए काफी तनावभरा रहा. वो बताती हैं कि पूरे समय वो तनाव में थीं, और जब वो एग्ज़ाम लिख रही थीं, तब पर्दा भी बार-बार स्लिप कर रहा था. जुबली एक लाइन में कहती हैं- “ये मेरी ज़िंदगी का सबसे ज्यादा शर्मिंदगी भरा वाकया है”. वो अब असम राज्य के शिक्षा मंत्री रनोज पेगू से भी इस मामले की लिखित में शिकायत करने वाली हैं.

अधिकारी क्या कहते हैं?

‘इंडिया टुडे’ ने गिरिजानंद चौधरी इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी के प्रिंसिपल डॉक्टर अब्दुल बकी अहमद से बात की. इस घटना को लेकर उनकी राय जानने की कोशिश की. डॉक्टर अब्दुल ने साफ कह दिया कि घटना के वक्त वो इंस्टीट्यूट में मौजूद नहीं थे. कहा-

“पूरा एग्ज़ामिनेशन असम एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी ने कंडक्ट कराया था. हमने केवल अपने क्लासरूम्स, कुछ टेक्निकल और लॉजिस्टिकल सपोर्ट प्रोवाइड कराए थे. उन्होंने हमारे इंस्टीट्यूशन को केवल एग्ज़ाम के वैन्यू के तौर पर इस्तेमाल किया था. यहां तक कि ऑब्ज़र्वर्स और इनविजिलेटर्स भी बाहर के थे”

यानी इंस्टीट्यूट के प्रिंसिपल ने सीधे इस घटना से पल्ला झाड़ लिया. इस मामले में सबसे अहम पक्ष है AAU, क्योंकि इन्होंने ही एग्ज़ाम कंडक्ट कराया था. इसलिए हमारे साथी नीरज ने यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर डॉक्टर विद्युत चंदन डेका से बात की. उन्होंने तो मामले की पूरी जानकारी न होने की बात कह दी. कहा-

“हमने एंट्रेंस एग्ज़ाम थर्ड पार्टी के ज़रिए कंडक्ट कराए थे. इस मामले की मुझे पूरी जानकारी नहीं है. हमने इस मामले की जांच के लिए कमेटी बनाई है, जो कॉलेज का दौरा कर पूरे मामले की जानकारी मुझे देंगे.”

यानी असम एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी ने खुद थर्ड पार्टी पर ज़िम्मा सौंप दिया. हालांकि मामले की जांच के लिए कमिटी बनाने की बात कही है. देखते हैं कि इनकी जांच में क्या सामने आता है. हमने इस मुद्दे पर शिक्षा मंत्री रनोज पेगू से भी बात करनी चाही, लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया.

हमें आज तक समझ नहीं आया कि लड़कियों के कपड़ों को लेकर हमेशा लोगों को इतनी दिक्कत क्यों रहती है? हमारे देश में कपड़ों को तथाकथित नैतिकता से जोड़कर देखा जाता है. माना जाता है जो लड़कियां पूरी तरह से ट्रेडिशनल कपड़े पहनती हैं, वो अच्छी होती हैं. और जो थोड़ा मॉडर्न कपड़ों की तरफ चली जाती हैं, उन्हें बुरा समझ लिया जाता है. उनके लिए यही कहा जाता है कि संस्कृति खराब कर रही हैं. क्यों? कब तक? ऐसा होगा. हमारी दादी-नानी इस तरह की बातें करें तो समझ भी आता है, उनके समय और आज के समय में बहुत अंतर है. लेकिन पढ़े लिखे, ऊंचे पदों पर बैठे लोग भी कई बार लड़कियों के कपड़ों को ही टारगेट करते हैं. फिर चाहे किसी एग्ज़ाम का ऑब्ज़र्वर हो या फिर किसी राज्य का मुख्यमंत्री. खैर, इस टॉपिक पर हम इतना कुछ कह सकते हैं कि ऐसे दो-तीन शो बनाने पड़ जाएंगे. इसलिए इस खबर को यहीं पर खत्म करते हुए, चलते हैं दूसरी बड़ी खबर की तरफ.


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