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आशा कण्डाराः पति ने छोड़ा, बच्चों को पालने के लिए सड़कों पर झाड़ू लगाई, अब SDM बनेंगी

मेहनत, लगन और आत्मविश्वास. ये महज कुछ शब्द नहीं हैं. नजरिए हैं और जीवन जीने के तरीके भी. इसी पॉजिटिव अप्रोच से राजस्थान की एक नगर निगम सफाईकर्मी ने वो कर दिखाया है, जिसका सपना देश के करोड़ों युवा देखते हैं. इस आर्टिकल में हम उनकी ही कहानी जानेंगे.

दरअसल, हर साल ऐसी खबरें आती हैं कि किसी रिक्शे वाले, किसी जूते बनाने वालों या किसी ढाबे वाले के बेटे या बेटी ने किसी प्रतिष्ठित प्रतियोगी परीक्षा का इम्तिहान पास कर लिया. हम सब इस तरह की खबरें पढ़कर चौंक जाते हैं. ऐसा इसलिए होता है कि एक समाज के तौर पर हम रिक्शे वालों, जूते सीने वालों, ढाबा चलाने वालों इत्यादि को सम्मान के भाव से नहीं देखते. हमें लगता है कि वर्किंग क्लास से आने वाले ये लोग और उनके बच्चे भला जीवन में क्या ही हासिल कर पाएंगे? पर जैसा कि आशा कण्डारा ने कहा कि जो मेहनत करता है, सफलता उसके कदम चूमती है. हम उनकी बात में एक और बात जोड़कर कहानी आगे बढ़ाना चाहेंगे. सफलता के लिए मेहनत के साथ-साथ अवसर और संसाधनों की भी जरूरत होती है. पर ये आशा कण्डारा हैं कौन? पढ़ते जाइए, ये उन्हीं की कहानी है.

दो बच्चों की जिम्मेदारी के साथ की तैयारी

जोधपुर की रहने वाली आशा कण्डारा को साल 2018 में राजस्थान प्रशासनिक सेवा (RAS) के एग्जाम में बैठने का मौका मिला, जिसका रिजल्ट अब आया है. और ये एग्ज़ाम पास करके वो अब एक अफसर बन गई हैं. ट्रेनिंग के बाद SDM के पद पर उनकी पोस्टिंग होगी. लेकिन आशा के लिए ये रास्ता इतना आसान नहीं था. आठ साल पहले आशा का उनके पति से झगड़ा हो गया. पति ने उन्हें छोड़ दिया, अब उनके ऊपर दो बच्चों के पालन पोषण की जिम्मेदारी भी आ गई. जीवनयापन के लिए उन्हें कुछ ना कुछ करना था. सो आशा एक के बाद एक सरकारी नौकरियों के फॉर्म भरती गईं. उन्होंने बताया,

“मैंने साल 2016 में तैयारी शुरू की. पहले SSC की तैयारी शुरू की. फिर सोचा कि अगर कुछ करना है तो बड़ा ही करूं. इसके बाद RAS की तैयारी शुरू की. फिर जितनी भी सरकारी नौकरियां आईं, सबका फॉर्म भरा. क्योंकि जीवन जीने के लिए आपको फाइनेंशियल सपोर्ट तो चाहिए ही.”

2018 के जून में उन्होंने मेन्स का एग्जाम दिया. जुलाई में उन्हें जोधपुर नगर निगम में सफाई कर्मचारी के तौर पर नौकरी मिली. हालांकि, यहां पर भी वो परमानेंट नहीं थी. ऐसे में वो परमानेंट नियुक्ति की लड़ाई भी लड़ती रहीं. 1 जुलाई, 2021 को आशा को जोधपुर नगर निगम में परमानेंट कर दिया गया. हालांकि, 12 दिन बाद यानी 13 जुलाई को राजस्थान प्रशासनिक सेवा 2018 का रिजल्ट आया. जिसमें आशा ने अच्छी रैंक के साथ सफलता हासिल की.

आशा कण्डारा की तैयारी भी दूसरे अभ्यर्थियों के मुकाबले अलग रही. कामकाज के साथ-साथ तैयारी करना उनके लिए एक बड़ी चुनौती थी. खासकर जब रोज आठ घंटे की शिफ्ट करनी हो. और काम ऐसा जो शरीर को एकदम थका दे. फिर भी आशा हरदम किताबें साथ लेकर चलतीं. नाश्ता और लंच के दौरान किताबें खोलकर बैठ जातीं. उन्होंने बताया,

“साल 2018 में 25 या 26 जून को मेरा मेन्स का एग्जाम था. मुझे तो विश्वास था कि एग्जाम निकल जाएगा, लेकिन एक डर भी था. फिर उसी साल 7 जुलाई को नगर निगम में नौकरी लगी. नौकरी के साथ-साथ मैं तैयारी भी करती रही. यह मुश्किल था, लेकिन मुझे करना था. तो जब भी टाइम मिलता, मैं पढ़ाई करती. लोग लंच करते, तो मैं पढ़ाई करती.”

आशा कण्डारा की सफलता सच में प्रेरणा देने वाली है. इस सफलता को वो अपने शब्दों में बयां भी नहीं कर पा रही हैं. हालांकि, उनके लिए यह सफर का अंत नहीं बल्कि शुरुआत है. आशा कण्डारा IAS बनना चाहती हैं. अभी वो ट्रेनिंग के बाद SDM के पद पर नियुक्ति लेंगी, लेकिन IAS के लिए तैयारी जारी रखेंगी. आशा ने दूसरे प्रतियोगियों को भी एक संदेश भी दिया है,

“मैं अगर कर सकती हूं तो कोई भी कर सकता है. मेहनत से सफलता मिलती है. सफलता मिलने के बाद गर्व भी महसूस होता है. जब आपके माता-पिता को कोई फोन करता है और कहता है कि आपकी बेटी ने तो कितना बड़ा मुकाम हासिल कर लिया, तो अच्छा लगता है. तैयारी करने वालों से बस इतना कहना है कि पढ़ाई करते रहें. जो टाइम मिले, उसे अच्छे से यूज करें. बस खुद को धोखा न दें.”

तीन बहनों ने एक साथ पाई सफलता

राजस्थान प्रशासनिक सेवा में लड़कियों की सफलता से जुड़ी एक और खबर सामने आई है. राजस्थान का एक जिला है हनुमानगढ़. यहां एक छोटा सा गांव है. नाम है भैरूसरी. भैरूसरी की तीन लड़कियों ने राजस्थान प्रशासनिक सेवा की परीक्षा पास की है. ये तीनों लड़कियां सगी बहने हैं. इंडिया टुडे से जुड़े कपिल शर्मा की रिपोर्ट के मुताबिक, इन तीन लड़कियों का नाम ऋतु, अंशु और सुमन है. तीनों का वास्ता एक किसान परिवार से है और तीनों ही पांचवीं कक्षा के बाद कभी स्कूल नहीं गईं. न तो उनके गांव में आगे की पढ़ाई के लिए स्कूल था और न ही उनके पिता सहदेव के पास पैसे.

अपनी बाकी दो बहनों के साथ अंशू (सबसे बाईं तरफ), सुमन (बाईं तरफ से दूसरे नंबर पर) और रीतू (सबसे दाईं ओर). (फोटो: इंडिया टुडे)
अपनी बाकी दो बहनों के साथ अंशु (सबसे बाईं तरफ), सुमन (बाईं तरफ से दूसरे नंबर पर) और ऋतु (सबसे दाईं ओर). (फोटो: इंडिया टुडे)

इन तीनों बहनों ने जैसे-तैसे एक दूसरे की मदद करते हुए पढ़ाई की. NET-JRF तक पास किया. फिर प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयारी की. अपने दूसरे प्रयास में तीनों ने सफलता हासिल की. 13 जुलाई को आए रिजल्ट में अंशु को 31वीं, ऋतु को 96वीं और सुमन को 98वीं रैंक मिली. इन तीनों लड़कियों की दो बहने और हैं. मंजू और रोमा. ये दोनों भी सरकारी सेवाओं में नियुक्त हैं. इन पांचों बेटियों के पिता सहदेव कहते हैं कि उन्होंने अपनी बेटियों को कभी भी पढ़ने और आगे बढ़ने से नहीं रोका.

तीनों बहनें भी अपनी सफलता का श्रेय अपने माता-पिता को देती हैं. उनका यह भी कहना है कि सभी मिलकर दूसरी लड़कियों को आगे लाने का काम करेंगी.


 

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