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लड़की की 'सेक्स चॉइस' से खुश नहीं थे, 'इलाज' के बहाने मां-बाप ने मौत की ओर धकेला!

21 साल की लड़की. गोवा में मृत पाई गई. मार्च से ही वहां अपने दोस्तों के साथ रह रही थी. जांच जारी है कि उसकी मौत कैसे हुई. लेकिन इस मौत से पहले उसके साथ जो हुआ, वो बेहद डरावना था.

क्या है पूरा मामला?

अंजना हरीश उर्फ़ चिन्नू सुल्फिकर थालासरी के ब्रेनन कॉलेज में पढ़ती थी. ‘द न्यूज मिनट’ में छपी रिपोर्ट के अनुसार, उसकी मौत को अप्राकृतिक मौत के तहत दर्ज किया गया है. ये कहा जा रहा है कि शायद उसने आत्महत्या की है. पिछले कुछ हफ्तों में उसने अपने फेसबुक पर वीडियो डाले. अपने दोस्तों को बताया. कि उसके साथ उसके परिवार वाले बहुत बुरा व्यवहार कर रहे थे. वजह? वो बाइसेक्शुअल थी. यानी उसे लड़के और लड़कियां, दोनों अच्छे लगते थे. रोमैंटिकली. फिजिकली.

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अंजना की मौत के बाद LGBTQIA समुदाय के एक्टिविस्ट्स ने सवाल उठाने शुरू किए हैं. (तस्वीर साभार: अंजना का फेसबुक पेज)

रिपोर्ट के अनुसार, अंजना उर्फ़ चिन्नू ने जब अपने घरवालों को अपने सेक्शुअल ओरिएंटेशन के बारे में बताया, तो वो लोग उसे ‘ठीक’ कराने के लिए डॉक्टर के पास ले गए. अपने फेसबुक वीडियो में अंजना ने बताया कि उसे दो ‘डी-एडिक्शन’ सेंटर में ले जाया गया, जहां पर दावा किया गया था कि उसकी इस ‘कंडिशन’ को ‘ठीक’ कर दिया जाएगा. इसके लिए उसे ढेर सारी दवाएं भी दी गईं. इसे ‘कन्वर्जन थेरेपी’ कहा जाता है. यानी उसकी ‘बाइसेक्शुएलिटी सुधारने’ की थेरेपी. अंजना ने अपनी बात रखनी चाही, तो उसे थप्पड़ मारकर चुप करा दिया गया.

अंजना ने अपने वीडियो में बताया कि किस तरह उसके परिवार ने उन्हें मानसिक और शारीरिक तौर पर प्रताड़ित किया. जिस डॉक्टर के पास उसे ले जाया गया, उससे भी अंजना ने मिन्नतें कीं.  कि उसके साथ कुछ भी गलत नहीं है. वो ठीक है. लेकिन फिर भी उसे नशे की गोलियां दी गईं.

अंजना की दोस्त गार्गी ने बताया.

‘वो कुश्ती की टीम में हुआ करती थी. आप भरोसा नहीं करेंगे कि उन दवाओं ने उसके शरीर पर कितना बुरा असर डाला था.’

ये सब कुछ होने के बाद अंजना ने अपने दोस्तों के साथ गोवा जाना डिसाइड किया. उसके परिवार वालों ने गुमशुदा व्यक्ति की रिपोर्ट भी लिखवाई. लेकिन अंजना अपने दोस्तों के साथ ही रहना चाहती थी.

केरल में ‘सहयात्रिका’ नाम का एक NGO है. जो LGBTQIA लोगों की मदद करता है. अंजना ने उनसे भी कॉन्टैक्ट किया था. रिपोर्ट के अनुसार ‘सहयात्रिका’ के साथ काम करने वाली आहना ने बताया,

‘जब अंजना को ज़बरदस्ती उस सेंटर में ले गए थे, तब भी हमने इसमें दखल दिया था. पुलिस बहुत ज्यादा मददगार नहीं रही इस मामले में. पर वो अधिकतर मामलों में होता है. सेक्शुअल और जेंडर माइनॉरिटीज के साथ संपर्क बढ़ने के बावजूद उनके प्रति पुलिस का रवैया अधिकतर होस्टाइल ही होता है’.

क्या मतलब होता है LGBTQIA का?

‘गर्ल्स हॉस्टल में रहती हो? पक्का लेस्बियन होगी, नहीं? लड़के ट्राई किये हैं कभी? नहीं किए तो हमें कर लो.’

‘यार इतना चिपक के मत सो. लड़की है क्या? दूर हो कर सो. गे टाइप काम मत कर.’

ऐसी बातें आपने अक्सर सुनी होंगी. शायद दोस्तों के बीच, उठते बैठते. या फिल्मों में.

क्यों डरते हैं लोग गे या लेस्बियन कहलाने से? क्या होते हैं ये नाम? LGBTQIA यानी लेस्बियन,गे, बाइसेक्शुअल, ट्रांसजेंडर, क्वियर, इंटरसेक्स, और एसेक्शुअल.

1. लेस्बियन वो औरतें/लड़कियां जो औरतों/लड़कियों को पसंद करती हैं. रोमैंटिकली. फिजिकली.

2. गे वो लड़के, जो लड़कों को पसंद करते.

3. क्वियर वो, जिनका कुछ पक्का डिसाइडेड नहीं होता, किसको पसंद करेंगे. वो अपनी आइडेंटिटी को लेकर प्रयोग करने को उत्सुक होते हैं.

4. बाइसेक्शुअल वो, जिनको लड़के और लड़कियां दोनों पसंद आते हैं.

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जगह-जगह देश में प्राइड परेड निकलती है, जिसमें LGBTQIA समूह के लोगों के प्रति जागरूकता बढाने की बात की जाती है. (सांकेतिक तस्वीर: Getty Images)

5. ट्रांसजेंडर वो जो जिस जेंडर के साथ पैदा होते हैं, उस जेंडर के साथ खुद को आइडेंटिफाई नहीं करते. इसीलिए उसे बदल लेते हैं. कुछ इसके लिए सर्जरी कराते हैं, हॉर्मोन थेरेपी लेते हैं. लड़की से लड़का, या लड़के से लड़की बनने की तरफ अपना सफ़र तय करते हैं.

6. इंटरसेक्स वो, जिनके शरीर दोनों जेंडर्स की तय परिभाषा में फिट नहीं बैठते. कभी-कभी दोनों के गुण भी इनमें दिख सकते हैं. 

7. एसेक्शुअल वो, जिनको फिजिकल अट्रैक्शन नहीं होता किसी से भी.

17 मई एक ख़ास तारीख है. इस दिन International Day Against Homophobia, Transphobia and Biphobia (इंटरनेशनल डे अगेंस्ट होमोफोबिया, ट्रांसफोबिया और बाइफोबिया) मनाया जाता है. लेकिन इन पहचानों के प्रति समझ और जानकारी दोनों अभी कम हैं. समलैंगिकों को लेकर बर्ताव कई बार इतना घिनौना होता है कि वो अपनी जान तक ले लेते हैं. जैसे पिछले साल चेन्नई के एक लड़के ने आत्महत्या कर ली थी. सिर्फ इस वजह से कि वो होमोसेक्शुअल था और उसे इस बात के लिए बुली किया जाता था.

2014 में भारतीय साइकियाट्रिक सोसाइटी ने स्टेटमेंट दिया था कि समलैंगिकता कोई दिमागी बीमारी नहीं है. 2018 में भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था. लेकिन अभी भी हर उस सेक्शुअल प्रेफरेंस को गलत माना जाता है जो ‘नॉर्मल’ की परिभाषा में फिट नहीं बैठती. इसी वजह से न जाने कई लोग कभी खुलकर सामने नहीं आ पाते और कई तो अपनी जान भी ले लेते हैं.


वीडियो: लेस्बियन और रेप पॉर्न के दीवाने इस देश को समलैंगिकता अप्राकृतिक लगती है

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