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कोरोना मरीज़ों को घर-घर जाकर खोजने वाली आंगनबाड़ी और आशा वर्कर्स की ऐसी हालत हो गई

मध्य प्रदेश के बालाघाट के एक गांव में रश्मि नगरगड़े नाम की एक महिला रहती हैं. ज़ाहिर हैं आप इन्हें नहीं जानते. एक आम महिला हैं, लेकिन बहुत खास काम कर रही हैं. ग्रामीण इलाकों में लोगों के घरों में जाकर उनका हेल्थ सर्वे कर रही हैं. उनसे पूछ रही हैं कि उन्हें खांसी-ज़ुकाम या बुखार तो नहीं है. कोरोना को लेकर जागरूक कर रही हैं. अब रश्मि ये काम इसलिए कर रही हैं क्योंकि वो एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं. उनका एक वीडियो भी सामने आया था, जिसमें सर्वे के दौरान उनकी गोद में एक साल का बच्चा भी दिख रहा था. ये रश्मि का ही बच्चा था. दरअसल, घर पर कोई संभालने के लिए मौजूद नहीं था, इसलिए रश्मि को मजबूरन अपने बच्चे को साथ लाना पड़ा था. तपती धूप में रश्मि गांव की गलियों में घूम रही थीं. अपनी और अपने बच्चे की जान जोखिम में डालकर. रश्मि की तरह ही बहुत सारी औरतें इस वक्त हमारे देश के गांवों की गलियों में भटक रही हैं. आपके लिए. ताकि आप सुरक्षित रहें. ये सारी महिलाएं या तो आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं, या आशा वर्कर्स हैं या फिर ANM हैं. आपने भी अपने गांव में महिलाओं के एक ग्रुप को हाल-फिलहाल में ज़रूर देखा होगा. तो आज हम आपको इन्हीं औरतों के संघर्ष से रूबरू करवाएंगे डिटेल में.

कोरोना वायरस धीरे-धीरे ग्रामीण इलाकों में पैर पसार रहा है. इसलिए बहुत सारे राज्यों ने गांव के स्तर पर हेल्थ सर्वे शुरू करवा दिया है. वैक्सिनेशन करवाया जा रहा है. छत्तीसगढ़, उत्तर प्रेदश, मध्य प्रदेश, ओडिशा जैसे कई राज्यों में आंगनबाड़ी और आशा वर्कर्स और ANMs के हाथों ये ज़िम्मा है. मध्य प्रदेश में तो इस पूरे मिशन को ‘किल कोरोना’ नाम भी दे दिया गया है. किस तरह से ये वर्कर्स काम कर रही हैं, ये जानने के लिए हमने कुछ आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं से बात की. उन्होंने बताया कि ग्रामीण इलाके में सबसे ज्यादा दिक्कत लोगों को जागरूक करने में आती है. कई बार तो लोग अगर बीमार भी होते हैं, तो पूछने पर जानकारी नहीं देते. उन्हें डर रहता है कि कहीं उन्हें ज़बरन अस्पताल में न डाल दिया जाए, या फिर घर पर बंद न कर दिया जाए. छिंदवाड़ा ज़िले के एक गांव की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हीरा बताती हैं-

“हम सुबह 9 बजे से निकल जाते हैं. लोगों से बात करके जानते हैं कि कितने लोग उनके घर में रह रहे हैं. किसी को किसी तरह का कोई ज़ुकाम तो नहीं है. कई बार लोग हमें सच बताते ही नहीं है. हमें उन्हें बार-बार समझाना पड़ता है कि सब सही बताएं. हम उन्हें कोरोना वायरस को लेकर भी जागरूक करते हैं, गांव में तो कई लोग इसे बड़े हल्के में लेते हैं. उन्हें लगता है कि मामूली सा बुखार आएगा और सब ठीक हो जाएगा.”

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प्रीति, ANM.(फोटो- ANI)

हीरा ने आगे हमें बताया कि सर्वे के दौरान अगर किसी व्यक्ति की तबीयत सही नहीं लगती है तो उसे प्राइमरी हेल्थ सेंटर यानी PHC भेजा जाता है. वहां चेकअप के बाद डॉक्टर दवा देते हैं. लेकिन अगर ज़रूरत पड़ती है तो फिर कोरोना टेस्ट भी होता है. अगर निगेटिव आया तो ठीक, पॉज़िटिव आया तो दवा देकर उस व्यक्ति को घर में आइसोलेट कर दिया जाता है और घर के बाहर इस बात की जानकारी देते हुए एक पर्चा चिपका दिया जाता है.

UP के अयोध्या के राहत बिकापुर गांव की ANM प्रीति ने समाचार एजेंसी ANI से बात की. वो कहती हैं कि उनके कारण अगर कोई बच जाए, तो उन्हें बहुत खुशी होती है. वो कहती हैं-

“कोरोना ऐसा समय है, जिससे सभी डर रहे हैं. कोई घर से बाहर नहीं निकलता. लेकिन हम लोग हैं, आशा वर्कर्स हैं, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं. ये सभी अपनी जान को जोखिम में डालकर निकल रही हैं. कोरोना से बचाव के लिए सबको समझा रही हैं. हम लोग वैक्सीनेशन कर रहे हैं. हमारे कारण कोई बच जाए, इसकी हमें बहुत खुशी होती है. इसलिए हम सबको जागरूक कर रहे हैं. कि सब सुरक्षित रहें.”

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आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हीरा. (फोटो- स्पेशल अरैंजमेंट)

सुबह 9 बजे से निकलकर ढलती शाम तक ये महिलाएं काम कर रही हैं. ताकि आप सुरक्षित और सतर्क रहें. लेकिन कोरोना के समय में इन महिलाओं के काम की जानकारी भर दे देने से हमारा मकसद पूरा नहीं होता. हमारा मकसद तो तब पूरा होगा, जब हम आपको ये बताएंगे कि ये महिलाएं अस्तित्व में कैसे आईं और कैसे ये ग्रामीण इलाके के विकास का आधार हैं. तो देरी किस बात की शुरुआत करते हैं.

कैसे हुई शुरुआत?

1970 की बात है. एक सर्वे हुआ था, पता चला कि भारत के करीब 90 फीसद बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. और हर 1000 मृत लोगों में 120 तो नवजात बच्चे होते थे. तब सरकार को लगा कि एक मज़बूत ढांचा होना चाहिए, जो बच्चों की हेल्थ पर फोकस करे. कई सारी कमिटी बनाई गईं. फिर 1974 में ‘नेशनल पॉलिसी फॉर चिल्ड्रन’ बनाई गई. इसे लागू करने के लिए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की देखरेख में अक्टूबर 1975 में ICDS प्रोग्राम को शुरू किया गया. ICDS माने Integrated Child Development Services. इस स्कीम के तहत छह साल से छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं, स्तनपान करा रही महिलाओं को शामिल किया गया. गरीब परिवारों से ताल्लुक रखने वाली 15 से 44 उम्र के बीच आने वाली महिलाओं को और 11 से 18 के बीच की लड़कियों को भी शामिल किया गया. ICDS का मकसद था कि इस निर्धारित एज ग्रुप के लोगों तक पोषक आहार पहुंचे, बच्चों को स्कूल के पहले प्री-स्कूल नॉन-फॉर्मल शिक्षा मिले, न्यूट्रिशन और हेल्थ को लेकर जागरूकता आए, बीमारियों से लड़ने के लिए प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो और प्रॉपर हेल्थ चेकअप मिले.

माने स्कीम का पूरा खांका तो तैयार था, अब इसे लागू कैसे करवाया जाए, इसके लिए खोले गए आंगनबाड़ी सेंटर्स. ग्रामीण और शहरी इलाकों में प्रति 1000 की जनसंख्या के लिए एक आंगनबाड़ी खोला गया. और पर्वती इलाकों में प्रति 700 की जनसंख्या में एक. माने अगर किसी गांव का साइज़ जनसंख्या के हिसाब से बड़ा होगा, तो उसमें आंगनबाड़ी की संख्या भी ज्यादा होगी. हर आंगनबाड़ी की ज़िम्मेदारी एक-एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को दी गई. मदद के लिए एक आंगनबाड़ी हेल्पर भी रखा गया. और तब से लेकर अब तक ICDS के कई सारे प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं, इन प्रोजेक्ट्स के तहत आंगनबाड़ी काम कर रही है. आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की ज़िम्मेदारी होती है कि वो अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले छह से कम उम्र के बच्चों को प्री-स्कूल की ट्रेनिंग दे, यानी स्कूल जाने से पहले उन्हें बैठना सिखाए. उनका प्रॉपर हेल्थ चेकअप लेते रहे. महिलाओं और बच्चों को टीका लग रहा है या नहीं इसका भी ध्यान रखें. इस स्कीम का खर्च केंद्र और राज्य सरकार मिलकर उठाती हैं.

आंगनबाड़ी कार्यकर्ता बनने के लिए स्कूली शिक्षा का पूरा होना ज़रूरी है. ये कार्यकर्ता सरकार के लिए तो काम करती हैं, लेकिन सरकारी कर्मचारी नहीं होतीं. इन्हें प्रति माह करीब 10 हज़ार रुपए मिलते हैं. कोशिश होती है कि जिस इलाके का आंगनबाड़ी हो, उसी इलाके की महिला को कार्यकर्ता बनाया जाए. भारत में इस वक्त करीब 13 लाख आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं.

ASHA वर्कर्स कौन हैं?

इसके बाद आती है हमारी अगली कड़ी ASHA वर्कर्स. पूरा नाम है- Accredited Social Health Activist. माने मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता. 2005 में इन्हें मिनिस्ट्री ऑफ हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर ने लॉन्च किया था. नेशनल हेल्थ रूरल हेल्थ मिशन यानी NRHM के तहत. सरकार का टारगेट है कि हर गांव में कम से कम एक आशा वर्कर तो रहे ही. इनके नाम में ही इनका काम छिपा है. माने इन वर्कर्स को गांव की औरतें, खासतौर पर प्रेगनेंट महिलाओं का ख्याल रखना होता है. इन्हें ये इन्श्योर करना होता है कि महिलाओं की डिलीवरी घरों में न होकर अस्पतालों में ही हो. अस्पताल में होने वाली प्रत्येक डिलीवरी के लिए इन्हें पैसे दिए जाते हैं. मध्य प्रदेश में 600 रुपए मिलते हैं. इनका सेलेक्शन गांव की पंचायत करती है, और ये उसी गांव की होती हैं, जहां उन्हें सेवा देनी हो.

ग्रामीण भारत का हेल्थ सिस्टम भी जानिए

आशा वर्कर को ग्रामीण लोगों और पब्लिक हेल्थ सिस्टम के बीच की सबसे अहम कड़ी माना गया है. एक आशा वर्कर को आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और ANM के साथ मिलकर काम करना होता है. कम से कम 10वीं पास होना ज़रूरी है. और अपनी ड्यूटी जॉइन करने से पहले इन्हें प्रॉपर ट्रेनिंग दी जाती है. ये भी सरकार के लिए काम करती हैं, लेकिन सरकारी कर्मचारी नहीं कहलातीं. सरकार का टारगेट है कि कुल 10,22, 265 (10 लाख 22 हज़ार 265) आशा वर्कर्स वर्किंग रहें, लेकिन 2018 के आंकड़ों के मुताबिक ये संख्या अभी 9,39,978 (9 लाख, 39 हज़ार 978) ही है.

अब बात करते हैं ग्रामीण हेल्थ सिस्टम की. इसकी तीन लेयर्स होती हैं. सबसे पहली, सबसे छोटी और सबसे अहम लेयर है- सब सेंटर्स. नेशनल हेल्थ मिनिस्ट्री के मुताबिक, पठारी इलाकों में प्रति 5000 की जनसंख्या पर एक सब सेंटर होगा, पर्वती इलाकों में 3000 की जनसंख्या पर ये होगा. हर सब सेंटर में एक ANM यानी Auxiliary Nurse Midwife होनी चाहिए या फिर एक फीमेल हेल्थ वर्कर (HWF) होना चाहिए, साथ ही एक मेल हेल्थ वर्कर भी होना ज़रूरी है. ANM बनने के लिए दो साल का डिप्लोमा करना होता है, उसके बाद वैकेंसी के हिसाब से आपका एग्ज़ाम लिया जाता है, फिर आपकी पोस्टिंग होती है. ANM अभी कोरोना के संकट के दौरान वैक्सिनेशन ड्राइव में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही हैं. इनका काम गांव की औरतों की डिलीवरी करवाना और उन्हें टीका लगवाने का होता है.

हेल्थ सिस्टम की अलगी लेयर है PHC. यानी प्राइमरी हेल्थ सेंटर. हर PHC के तहत करीब पांच से छह सब-सेंटर्स काम करते हैं. ये चार से छह बेड वाला छोटा सा अस्पताल होता है. इसमें एक मेडिकल ऑफिसर इनचार्ज होता है. और करीब 14 पैरामेडिकल स्टाफ काम करते हैं. इस स्टाफ में एक ANM भी होती हैं. अगली लेयर है कम्युनिटी हेल्थ सेंटर. यानी CHC. ये तहसील के स्तर पर बना एक बड़ा सरकारी अस्पताल होता है. इसके तहत चार से पांच PHC आते हैं. कम से कम 30 बेड्स इस अस्पताल में होने ज़रूरी हैं. CHC चूंकि एक प्रॉपर अस्पताल होता है, तो यहां पर हर तरह के डॉक्टर्स मौजूद होते हैं.

तो ये है हमारे देश का ग्रामीण हेल्थ सिस्टम. सबसे अहम कड़ी आंगनबाड़ी और आशा वर्कर हैं, और ANM भी हैं. जो इस वक्त कोरोना से लड़ने के लिए अथक मेहनत कर रही हैं.


वीडियो देखें: कोरोना के चलते मां का दूध न पाने वाले बच्चों के लिए ह्यूमन मिल्क बैंक कितना सही?

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