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सेक्स क्राइम के मामलों में अदालतों की 5 चौंकाने वाली टिप्पणियां

यौन शोषण. ये शब्द अपने आप में इतना लिजलिजापन लिए हुए है. इस शब्द हमें यूं ही इतना डिसगस्टिंग महसूस करवा सकता है. मगर ये और भी बुरा तब हो जाता है जब इसका शिकार कोई बच्चा हो. बच्चों के यौन शोषण के मामलों में सज़ा देने के लिए POCSO नाम का ऐक्ट हमारे कानून में है. POCSO का मतलब प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंसेस एक्ट. आज इस ऐक्ट की बात क्यों? बताते हैं.

POCSO ऐक्ट से जुड़े एक मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट की एक टिप्पणी और फैसला हर तरफ चर्चा में है. एक मामले की सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि “ओरल सेक्स अति गंभीर श्रेणी वाला अपराध नहीं है.” और इसी के आधार पर कोर्ट ने दोषी की सज़ा भी कम कर दी है. आज म्याऊं के इस एपिसोड हम इसी केस के बारे में बात करेंगे. और साथ ही ये भी बताएंगे कि कोर्ट की तरफ से और कब-कब आरोपियों की सज़ा कम करते हुए या ज़मानत देते हुए ऐसी टिप्पणियां की हैं.

फैसले की आलोचना करते हुए लोग क्या कह रहे हैं?

रोहिणी सिंह ने इस ख़बर को शेयर करते हुए लिखा,

“एक आदमी 10 साल के बच्चे को ओरल सेक्स के लिए फ़ोर्स करता है. और जज को लगता है ये ‘गंभीर सेक्सुअल असॉल्ट’ नहीं है. हमारी न्याय व्यवस्था के ये हाल है. मैं निशब्द हूं.”

 

TMC सांसद महुआ मोइत्रा ने लिखा,

“इलाहाबाद हाईकोर्ट का कहना है कि POCSO के अंतर्गत ओरल सेक्स ‘अग्रेवेटेड सेक्सुअल असॉल्ट’ नहीं है. बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा था कि पॉक्सो के अंतर्गत अपराध के लिए स्किन तो स्किन कांटेक्ट होना ज़रूरी है. हाईकोर्ट्स को जागना चाहिए. POCSO का मतलब बच्चों को हेवानियत भरे अपराधों से बचाना है. इसे कमज़ोर मत करिए.”

कत्युषा नाम की एक यूज़र ने सवाल किया,

“क्या कोर्ट पीडियोफाइल्स को चाइल्ड प्रौस्टीट्युशन के लिए बढ़ावा दे रहे हैं?”

डॉक्टर अविरल वत्स ने लिखा,

“मुझे लगता है जज को एक रिमाइंडर की ज़रूरत है. सेक्सुअल ऑफेंस की कैटेगरी में – रेप, पेनिट्रेशन बाय सेक्सुअल असाल्ट, ओरल सेक्स, सेक्सुअल एक्सपोज़र, सेक्सुअल पर्पज़ के लिए नशा देना भी आता है. ओरल सेक्स एक सीरियस क्राइम है.”

जयदेव नाम के एक यूजर ने पूछा,

“क्या सुप्रीम कोर्ट इसमें इंटरफेयर करेगा. या हाईकोर्ट्स को इस टाइप के जजमेंट देने के लिए अलाऊ करेगा?”

मामला क्या है?

इंडिया लीगल लाइव की ख़बर के अनुसार मामला 26 मार्च 2016 को हुई एक घटना से जुड़ा है. उत्तरप्रदेश के झांसी ज़िले के चिरगांव में सोनू कुशवाहा नाम का शख्स एक लड़के को 20 रूपए का लालच देकर मंदिर ले गया. लड़के की उम्र उस समय 10 साल थी. सोनू ने पैसों का लालच देकर लड़के को ओरल सेक्स करने को कहा. ऐसा करने के बाद सोनू ने लड़के को धमकी दी कि वो इस बारे में किसी को ना बताए.

जब लड़का घर पहुंचा तो उसके पिता ने 20 रूपए को लेकर पूछताछ की. तब लड़के ने पिता को पूरी घटना के बारे में बता दिया. पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और पुलिस ने सोनू कुशवाहा के खिलाफ आईपीसी की धारा 377 और 506 के अलावा POCSO ऐक्ट की धारा 3/4 के तहत मामला दर्ज कर लिया गया.

झांसी की अदालत में मामला चला और सोनू दोषी पाया गया. 24 अगस्त 2018 को उसे पॉक्सो ऐक्ट की धारा-6 के तहत अलग से 10 साल के कठोर कारावास की सज़ा सुनाई गई. 5000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया. इसके खिलाफ सोनू हाई कोर्ट पहुंच गया.

हाई कोर्ट की सुनवाई के दौरान ये सामने आया कि पुलिस ने आईपीसी के अलावा पॉक्सो ऐक्ट की धारा 3/4 के तहत सबूत इकट्ठा किए थे. लेकिन झांसी में सुनवाई के दौरान एडिशनल सेशन जज ने सोनू पर पॉक्सो की धारा 5/6 लगा दी थी. पॉक्सो ऐक्ट की इस धारा में ही ‘अति गंभीर यौन हमलों’ की बात कही गई है. अंग्रेजी में इन्हें ‘अग्रेवेटिड सेक्शुअल ऐक्ट’ लिखा गया है, जिनमें कम से कम 20 साल की सजा तो होती ही है. जबकि धारा 4 में ‘पेनेट्रेटिव सेक्शुअल असॉल्ट’ का जिक्र है. यानी जब कोई शख्स अपना लिंग बच्चे के मुंह में प्रवेश कराता या डालता है या ऐसा करने की कोशिश करता है, तब ये धारा लगाई जाती है.

सांकेतिक तस्वीर

पुलिस ने इसी धारा के तहत सोनू पर केस दर्ज किया था. और इसमें कम से कम पनिशमेंट है 10 साल की. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने धाराओं में अंतर बताते हुए कहा कि इस केस में ‘पेनेट्रेटिव सेक्शुअल असॉल्ट’ हुआ, न कि ‘अग्रेवेटिड सेक्शुअल असॉल्ट’. सोनू कुशवाहा के वकील ने अदालत को बताया कि दोषी को गलत धारा के तहत सजा दी गई है. उन्होंने कहा कि धारा-6 में ‘अग्रेवेटिड सेक्शुअल ऐक्ट’ की बात कही गई है, जबकि उनके क्लाइंट ने ‘पेनेट्रेटिव सेक्शुअल असॉल्ट’ किया. इसलिए उसे धारा-4 के तहत सज़ा सुनाई जानी चाहिए, न कि धारा-6 के तहत. वकील ने कोर्ट को ये भी बताया कि पुलिस के सबूत भी धारा-4 से संबंधित हैं.

इंडिया लीगल लाइव और बार एंड बेंच जैसी कानूनी मामलों से जुड़ी वेबसाइट्स की रिपोर्ट्स के मुताबिक, कोर्ट ने पुलिस की जांच को सही पाया और माना कि सोनू ने वाकई में अपराध किया है, लेकिन उसका अपराध POCSO ऐक्ट के सेक्शन-4 के अंतर्गत आता है, न कि धारा 6 के. इसी कारण कोर्ट ने सोनू की सजा कम कर दी.

हालांकि पीड़ित की उम्र को देखते हुए कई लोगों का कहना है कि हाई कोर्ट का ये निर्णय सही नहीं है. जानकार कह रहे हैं कि ये मामला वाकई में पॉक्सो की धारा 5/6 से जुड़ा है, क्योंकि अपराध के समय पीड़ित की उम्र 10 साल थी. गौरतलब है कि पॉक्सो ऐक्ट की धारा 5 के मुताबिक 12 साल से कम उम्र के बच्चों का यौन उत्पीड़न गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है, जबकि उच्च न्यायालय ने धारा 4 के तहत फैसला सुना दिया.

मामले में अभी क्या है?

इस मामले में ताज़ा अपडेट ये है कि हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ तत्काल अपील दायर करने के लिए राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग ने यूपी के मुख्य सचिव को पत्र लिखा है. खैर, ये पहली बार नहीं है जब हाईकोर्ट ने इस तरह की टिपण्णी की है. इससे पहले भी बॉम्बे हाईकोर्ट ने पॉक्सो के मामले में बलात्कार के दोषी को बरी करते हुए टिप्पणी की थी. लाइव लॉ के मुताबिक, कोर्ट ने कहा था –

“पीड़िता की उम्र 5 साल है. उसका बयान प्रशिक्षित है. बच्ची के माता पिता सीआरपीसी की धारा 164 के तहत बयान दर्ज करने के वक़्त मौजूद थे. बच्ची ने बताया कि माता पिता ने उसे बताया कि बयान कैसे देना है. इसलिए एक बाल गवाह के सबूत की अत्याधिक सावधानी के साथ जांच की जानी चाहिए.”

इसी साल जनवरी में एक मामले की सुनवाई करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा था,

“किसी घटना को यौन हमले की श्रेणी में तभी माना जाएगा जब स्किन टू स्किन टच होगा. केवल जबरन छूना यौन हमला नहीं माना जाएगा.”

बाद में इस विवादास्पद फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि POCSO के तहत अपराध के लिए स्किन-टू-स्किन टच ज़रूरी नहीं है.

इसी साल मार्च में एक और मामला आया था. 23 साल के लड़के पर एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार करने का आरोप था. उस समय लड़की की उम्र 16 साल थी. सुनवाई के दौरान सीजेआई बोबड़े ने अभियुक्त से पूछा था, “क्या वह पीड़िता से शादी करेगा?”

ये कोर्ट्स की कुछ टिप्पणियां थीं जिन पर पहले भी जमकर बवाल हुआ था. और ये सिर्फ वो टिप्पणियां थीं जो कुछ हाई कोर्ट्स या सुप्रीम कोर्ट ने की थीं और इसी वजह से नेशनल न्यूज़ का हिस्सा बन सकीं. क्या ये कल्पना करना गलत होगा कि डिस्ट्रिक्ट कोर्ट जाने ऐसे कितने फैसले सुनाते होंगे जो पीड़ित बच्चे या महिला का न्यायतंत्र पर से भरोसा उठाने के लिए पर्याप्त होंगे?

हम इन टिप्पणियों और फैसलों के आधार पर जज पर सवाल नहीं उठा रहे. हम जानते हैं कि इस केस में जज इज़ गोइंग बाय द बुक. लेकिन क्या इन मामलों में और संवेदनशील नहीं हुआ जा सकता? वो कानून जो बच्चे के ओरल रेप को रेप न माने, या कम सीरियस अपराध माने, क्या उस कानून पर विचार किए जाने की ज़रुरत नहीं है?


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