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अफगानिस्तान की इन महिलाओं ने रंग-बिरंगे कपड़ों में फोटो डालकर तालिबान को करारा जवाब दिया है!

अफगानिस्तान (Afghanistan) में तालिबान (Taliban) की ज़ीरो फीमेल रिप्रेजेंटेशन वाली सरकार काम शुरू कर चुकी है. इस सरकार ने औरतों को लेकर तमाम कायदे और कानून तय किए हैं. इनमें से ही एक नियम औरतों के पहनावे को लेकर है. तालिबान की तरफ से कहा गया है कि अफगानिस्तान की महिलाएं इस्लामिक कानून शरिया (Sharia) की तहत कपड़े पहनेंगी. उनके ऊपर पहनावे को लेकर कड़े नियम लागू होंगे. सामान्य तौर पर इसका अर्थ यह है कि तालिबान के पिछले शासन के दौरान महिलाओं को जिस तरह से पूरा शरीर ढकने वाला बुर्का पहनना पड़ा था, इस बार भी उन्हें ठीक वैसा ही करना पड़ेगा.

तालिबान की तरफ से की गई इस घोषणा के बीच कुछ महिलाओं ने तालिबान के समर्थन में रैली भी निकाली. काले और नीले रंग के बुर्के पहने इन महिलाओं के हाथों में तालिबान के झंडे थे. बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, इन महिलाओं का कहना था कि मेकअप करने और आधुनिक कपड़े पहनने वाली महिलाएं अफगानिस्तान की महिलाओं की प्रतिनिधि नहीं हैं. इन महिलाओं ने यह भी कहा कि उन्हें उन महिला अधिकारों की जरूरत नहीं हैं, जो विदेशी हैं और शरिया के अनुरूप नहीं हैं.

#DoNotTouchMyClothes

तालिबान का समर्थन करने वाली इन महिलाओं की बातें सोशल मीडिया पर वायरल हुईं. इनके ऊपर दुनिया के दूसरे कोनों में रह रहीं अफगान महिलाओं ने आपत्ति जताई. खासकर, पहनावे को लेकर. आपत्ति जताने वाली इन महिलाओं ने कहा कि तालिबान का समर्थन करने वाली जो महिलाएं काले और नीले रंग के बुर्के का समर्थन कर रही हैं, असल में इस तरह के बुर्के कभी भी अफगान महिलाओं के पहनावे का हिस्सा नहीं रहे. इन महिलाओं ने कहा कि अफगानिस्तान की महिलाएं तो हमेशा से रंग बिरंगे और हवादार कपड़े पहनती आई हैं, जिनमें उन्हें अपना चेहरा और सिर नहीं ढकना पड़ता.

देखते ही देखते इन महिलाओं ने सोशल मीडिया पर एक मुहिम छेड़ दी. उन्होंने #DoNotTouchMyClothes, #AfghananWomen और #AfghanistanCulture हैशटैग के साथ इन रंग बिरंगे कपड़ो में अपनी फोटो डालीं. देखते ही देखते पूरा सोशल मीडिया इस तरह की फोटो से भर गया. डॉ. बहार जलाली ने अपनी फोटो ट्वीट करते हुए लिखा,

“यह है अफगान संस्कृति. मैं पारंपरिक अफगान ड्रेस पहने हुए हूं.”

डॉ. बहार जलाली ने बीबीसी से बात भी की. उन्होंने बताया कि वो दुनिया को बताना चाहती हैं कि जो कपड़े तालिबान का समर्थन करने वाली महिलाओं ने पहन रखे थे, वो अफगानिस्तान की संस्कृति का हिस्सा नहीं हैं. एक और यूजर ने अपनी फोटो पोस्ट करते हुए लिखा,

“यही अफगानिस्तान की असली पोशाक है. अफगानिस्तान की महिलाएं इस तरह के रंग बिरंगे और शालीन कपड़े पहनती हैं. काले रंग का बुर्का कभी भी अफगानिस्तान की संस्कृति का हिस्सा नहीं रहा.”

दीबा नाम की एक यूजर ने भी अपनी फोटो डाली और लिखा,

“आखिर में बात यही है कि अफगानिस्तान की महिलाएं क्या पहनना चाहती हैं, यह अधिकार उनसे छीन लिया गया है. उन्हें काले रंग का बुर्का पहनने के लिए मजबूर किया जा रहा है. मैंने जो पहन रखा है, वही अफगानिस्तान की पारंपरिक ड्रेस है.”

नाहिद फतही नाम की यूजर ने ट्वीट किया,

“हम, अफगानिस्तान की औरतें, इस तरह से कपड़े पहनती हैं. कुछ औरतें पारंपरिक कपड़े पहनती हैं और पश्चिम में चलने वाले कपड़े पहनती हैं. कुछ हिजाब भी पहनती हैं. लेकिन हिजाब और नकाब हमारे ड्रेस कोड का हिस्सा नहीं है. तालिबान इन्हें थोप रहा है.”

साल 2001 में तालिबान का शासन खत्म होने के बाद जब अफगानिस्तान की महिलाओं ने सार्वजनिक जीवन में हिस्सा लेना शुरू किया, तो उन्होंने अपने मन के कपड़े पहने. बड़े शहरों में पढ़ने और काम करने वाली महिलाएं वेस्टर्न कपड़ों में देखी गईं. गांवो और कस्बों में रहने वाली महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में नजर आईं.

अफगान महिलाओं की पारंपरिक वेशभूषा काफी रंग बिरंगी है. उसमें रंगीन धागों, शीशों का काम दिखता है. उन पोशाकों में औरतें आज़ाद दिखती हैं. कम्फर्टेबल दिखती हैं. तालिबान अपनी परिभाषा के इस्लाम के हिसाब से अफगानिस्तान की महिलाओं को इन रंगो से महरूम कर देना चाहता है. लेकिन उसे यह समझ नहीं आता कि अगर खुदा केवल यही चाहता है कि महिलाएं एक रंग का ही लबादा ओढ़कर चलें, तो फिर कुदरत में इतने सारे अलग-अलग रंग क्यों हैं?


 

वीडियो-  केवल अफगानिस्तान ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों की सत्ता में महिलाओं के कोई भागीदारी नहीं

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