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गर्भ गिराने को लेकर संसद जो नया बिल पास हुआ है उसमें क्या है

तारीख 16 मार्च, 2021. राज्य सभा में औरतों से जुड़ा एक बिल पास हुआ. लोकसभा में ये पहले ही पास हो गया था. बिल औरतों के मेडिकल अबॉर्शन यानी गर्भपात से जुड़ा हुआ है. बिल में अबॉर्शन की टाइम लिमिट को बढ़ाकर 24 हफ्ते कर दिया गया है. यह पहले 20 सप्ताह थी. साथ ही साथ कुछ शर्तें भी हैं.

मेडिकल अबॉर्शन के नए नियम में क्या है?

इस बिल का नाम है- मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी बिल 2020, जिसे शॉर्ट में MTP बिल कहते हैं. इसके तहत स्पेशल कैटेगरी में आने वाली औरतों को कानूनी तरीके से गर्भपात की इजाज़त दी गई है. हालांकि ये परमिशन पहले से ही है, लेकिन मौजूदा कानून के हिसाब से केवल 20 हफ्ते तक के गर्भ को ही अबॉर्ट कराया जा सकता है. जो नया बिल पास हुआ है, इसमें इस टाइमलिमिट को बढ़ाकर 24 हफ्ते कर दिया गया है. औरतों की स्पेशल कैटेगरी की अगर बात करें तो इनमें रेप विक्टिम्स, इनसेस्ट यानी परिवार के अंदर ही गैरकानूनी शारीरिक संबंध की वजह से प्रेगनेंट हुई औरतें, गंभीर बीमारी से जूझ रहीं गर्भवती महिलाएं शामिल होंगी. साथ ही वो औरतें भी इस कैटेगरी में आएंगी, जिनके लिए बच्चे को जन्म देना उनकी जान पर बन आया हो.

अब बताते हैं कि इसे लेकर राज्यसभा में किसने क्या कहा? केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन सिंह ने कहा कि MTP कानूनों को लेकर इस बिल के ज़रिए जो बदलाव किए जा रहे हैं, उसके लिए दुनिया भर में अबॉर्शन की प्रैक्टिस को लेकर मौजूदा समय में क्या कंडिशन है, उसकी स्टडी की गई. साथ ही एक्सपर्ट्स से सलाह ली गई है. आगे हेल्थ मिनिस्टर ने कहा कि पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हम कोई ऐसा नियम नहीं बनाएंगे, जिससे औरतों को नुकसान हो. नया कानून महिलाओं की गरिमा की रक्षा करेगा, उसे बनाए रखेगा.

दूसरी तरफ विपक्षी पार्टियों के सांसदों ने इस बिल पर सवाल भी उठाए. PTI की रिपोर्ट के मुताबिक, कांग्रेस के सांसद प्रताप सिंह बाजवा ने बिल को सेलेक्ट कमिटी के पास भेजने का प्रस्ताव दिया. हालांकि, उनका प्रस्ताव गिर गया. कांग्रेस के साथ-साथ तृणमूल कांग्रेस, सीपीआई, सीपीएम और समाजवादी पार्टी के सांसदों ने भी बिल को सेलेक्ट कमिटी के पास भेजने की बात कही थी. लेकिन ये बिल वॉइस वोट यानी ध्वनि मत के ज़रिए राज्यसभा में पास हो ही गया.

पास हुए नए बिल के तहत 24 हफ्ते के गर्भपात के लिए दो डॉक्टरों का रेकमेंडेशन होना ज़रूरी होगा. और ये डॉक्टर रेकमेंडेशन तभी देंगे, जब उन्हें लगेगा कि बच्चे के पैदा होने से महिला को मानसिक या शारीरिक नुकसान पहुंच सकता है. अगर डॉक्टर को ये लगे कि बच्चे के पैदा होने के बाद, उसे खुद यानी बच्चे को कोई गंभीर शारीरिक या मानसिक दिक्कत से जूझना पड़ सकता है, तो भी डॉक्टर गर्भपात के लिए रेकमेंडेशन दे सकते हैं. नया बिल ये भी कहता है कि जो औरत गर्भपात कराएगी, उससे जुड़ी कोई भी जानकारी किसी और को नहीं दी जाएगी. जानकारी सिर्फ कानूनी तौर पर अपॉइंट किए गए अधिकारी या कर्मचारी को मिलेगी. जो कोई भी महिला की प्राइवेसी का उल्लंघन करेगा, उसे एक साल तक की कैद की सज़ा हो सकती है.

राज्य सभा में विपक्षी पार्टियों के सांसदों ने नए बिल को सेलेक्ट कमेटी के पास भेजने का प्रस्ताव दिया.
राज्य सभा में विपक्षी पार्टियों के सांसदों ने नए बिल को सेलेक्ट कमेटी के पास भेजने का प्रस्ताव दिया.

कानून में एक अहम बात ये है कि इसके तहत हर राज्य की सरकार को एक मेडिकल बोर्ड बनाना होगा. इस बोर्ड में अलग-अलग फील्ड के डॉक्टर होंगे, जो यह देखेंगे कि गर्भपात नए नियमों के तहत हो रहा है या नहीं.

नया बिल महिलाओं के अधिकार पर हमला?

इसी प्रावधान को लेकर शिव सेना सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने सवाल भी किया था. उन्होंने कहा कि एक महिला के लिए गर्भपात का फैसला करना बहुत ही मुश्किल और इमोशनल होता है. इस फैसले में तमाम तरह के डॉक्टर और मेडिकल बोर्ड को इनवॉल्व कर देना एक तरीके से महिला को अपमानित करना है. साथ ही साथ ये उसकी प्राइवेसी और चॉइस का भी उल्लंघन है.

इसी तरह सीपीआई के सांसद बिनॉय विश्वम ने कहा कि अपने गर्भपात का फैसला पूरी तरह से एक महिला का होना चाहिए, न कि किसी मेडिकल बोर्ड का. तृणमूल कांग्रेस के शांतनु सेन ने कहा कि बिल में सेक्स वर्कर्स के लिए कोई प्रावधान नहीं है. कांग्रेस के सांसद एमी याग्निक ने कहा कि बिल में मेडिकल बोर्ड के लिए किसी टाइम फ्रेम का जिक्र नहीं है, कि कितने समय में बोर्ड फैसला लेगा. NCP की सांसद फौजिया खान ने कहा कि ग्रामीण इलाकों में दो डॉक्टरों का रेकमेंडेशन लेना प्रैक्टिकल नहीं है. वहीं सीपीएम के सांसद झरना दास ने कहा कि नया बिल उन महिलाओं को कोई अधिकार नहीं देता, जिनकी शादी नहीं हुई है.

नए बिल के क्या फायदे क्या नुकसान?

पहले हम गर्भपात के मौजूदा कानून पर बात करते हैं. यानी MTP एक्ट 1971 की. ये कानून साल 1971 में बना था. पारित होने के बाद ये केवल जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं हुआ था. इसके तहत 12 हफ्ते के गर्भ को एक डॉक्टर के रेकमेंडेशन पर और 20 हफ्ते के गर्भ को दो डॉक्टर्स के रेकमेंडेशन पर गिराया जा सकता है. इसमें भी अबॉर्शन कराने के कुछ आधार तय किए गए थे. या तो मां की जान को खतरा हो. या फिर बच्चे के पैदा होने पर उसके विकलांग या मानसिक रूप से अस्वस्थ होने का खतरा हो. बच्चे के जन्म लेने से पहले ही कोई ऐसा विकार पता चले जिसका कोई इलाज नहीं है.  फिर ऐसी हालत में जब इस प्रेग्नेंसी से या बच्चे के पैदा होने से महिला को गहरी मानसिक पीड़ा हो. जैसे रेप के मामले या फिर शादी-शुदा महिलाओं के कॉन्ट्रासेप्टिव (गर्भ निरोधक) फेल हो जाने के मामले.

मौजूदा कानून के तहत 18 साल से कम उम्र की महिला के साथ उसके गार्जियन का होना जरूरी था. इस कानून के सेक्शन-4 में यह प्रावधान है कि अगर डॉक्टरों को लगता है कि महिला की जान बचाने के लिए उसका अबॉर्शन करना जरूरी है, तो ऐसे में यह पता लगाना कि गर्भ 20 हफ्ते का है या उससे ज्यादा का है, जरूरी नहीं है. इस कानून के तहत कुछ अधिकार राज्य सरकारों को भी दिए गए थे.

MTP एक्ट 1971 में क्या कमियां हैं? इस नए बिल के क्या फायदे और नुकसान हैं? और क्या अविवाहित महिलाओं को भी इसके अंदर रखा गया है या नहीं? इन सवालों के जवाब जानने के लिए हमने एडवोकेट विजयलक्ष्मी से बात की. उन्होंने क्या कहा, सुनिए-

“इसमें दो चीजें नई हुई हैं. पहला, टाइमलिमिट को बढ़ाकर 20 से 24 सप्ताह कर दिया है और दूसरा कि महिला की प्राइवेसी की बात कही गई है. महिला की पहचान उजागर होने पर जुर्माना और पनिशमेंट दोनों होगा. पहले केवल जुर्माना लगता था. लेकिन ये जुर्माना थोड़ा बढ़ाना चाहिए था. और सजा को भी थोड़ा और कठोर करना चाहिए था. पुराने कानून और इस नए बिल में ज्यादा कुछ परिवर्तन नहीं है. पहले बस आइडेंटिटी रिवील हो जाती थी. कोर्ट में, अस्पताल में. अब औरत की प्राइवेसी को बचाने का प्रयास हो रहा है. बाकी इस बिल में कमियां भी हैं. जैसे ये सेक्स वर्कर को लेकर बिल्कुल चुप है. शादीशुदा महिलाओं के लिए भी स्पेसिफिकली कुछ नहीं है. लेकिन 18 साल से कम उम्र की लड़कियां अगर अनप्लान्ड तरीके से प्रेगनेंट हो जाती हैं या उनका यौन शोषण होता है तो ये एक्ट उन्हें अबॉर्शन की इजाजत देता है.”

अब ज़रा उन केसेज पर भी नजर डालते हैं, जिनमें इस बिल के आने से पहले ही औरतों को प्रेग्नेंसी के 20 हफ्ते के बाद भी गर्भपात कराने की परमिशन दी गई थी. PTI की रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने एक महिला को 28 हफ्ते के गर्भ का अबॉर्शन कराने की इजाज़त दी थी. महिला ने अल्ट्रासोनोग्राफी कराई थी, जिसमें पता चला था कि गर्भ में पल रहे बच्चे के सिर की हड्डी का विकास नहीं हुआ है. ऐसे में जस्टिस डी एन पटेल और जस्टिस ज्योति सिंह की बेंच ने गर्भपात की इजाजत दे दी.

वहीं पिछले साल जुलाई में बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक 17 साल की नाबालिग रेप पीड़िता को गर्भपात की परमिशन दी थी. द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक पीड़िता की प्रेग्नेंसी के 25 महीने हो चुके थे. हालांकि, मेडिकल रिपोर्ट में पीड़िता को गर्भपात न कराने की सलाह दी गई थी. रिपोर्ट में कहा गया था कि गर्भपात से पीड़िता को स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें हो सकती हैं.

बिजनेसवर्ल्ड में छपी एक लीगल रिपोर्ट के मुताबिक, मई 2019 से लेकर अगस्त 2020 के बीच अलग-अलग हाई कोर्ट में अबॉर्शन कराने की कुल 243 याचिकाएं डाली गई थीं. इनमें से 84 फीसद मामलों में अबॉर्शन को मंजूरी दे दी गई. लीगल रिपोर्ट के मुताबिक कुल 243 याचिकाओं में से 74 फीसदी याचिकाएं ऐसी थीं, जिनमें 20 हफ्ते से ज्यादा के गर्भ का अबॉर्शन कराने की परमिशन मांगी गई थी.

डॉ. अनुराधा सीनियर गायनेकोलॉजिस्ट हैं.
डॉ. अनुराधा सीनियर गायनेकोलॉजिस्ट हैं.

अबॉर्शन के हेल्थ पहलुओं पर भी बात करना ज़रूरी है. मसलन प्रेग्नेंसी के कितने हफ्ते तक अबॉर्शन कराना सेफ है? कितने समय में पता चल जाता है कि गर्भ में पल रहे बच्चे को किसी तरह की दिक्कत नहीं हो रही है? इन सवालों के जवाब के लिए हमने बात की डॉ. अनुराधा से. उन्होंने क्या कहा, सुनिए-

“12 हफ्ते के गर्भ का अबॉर्शन कराना तो बिल्कुल सेफ होता है. 12 से 20 का भी सेफ होता है अगर ट्रेन्ड गायनेकोलॉजिस्ट करें तो. 24 हफ्ते तक भी सेफ होता है. यूके में इसे सेफ माना गया है. हम भी इसकी मांग कर रहे थे. वहीं बच्चे में अगर कोई खामी है तो वो जनरली लेवल 2 के स्कैन से पता चलती है. ये स्कैन 18 से 19 हफ्ते के बीच होता है. ऐसे में पुराने नियम के कारण खामी पता चलने के बाद भी हम गर्भपात नहीं करा पाते थे. टाइमलिमिट बढ़ाकर सरकार ने अच्छा काम किया है. हम इसका स्वागत करते हैं. इससे सेलेक्टेड कैटेगरी की महिलाओं को उनका हक मिल पाएगा.”

अबॉर्शन पर दूसरे देश कहां खड़े हैं?

हाल ही में अर्जेंटीना की औरतों ने लंबी लड़ाई के बाद अबॉर्शन का अधिकार पाया. द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया में अभी 25 ऐसे देश हैं, जहां अबॉर्शन कराना गैरकानूनी है. इनमें पश्चिमी एशिया, दक्षिणी और पूर्वी अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कुछ देश शामिल हैं. जिन देशों में ये पूरी तरह से बैन है, उनमें दुनिया की करीब 9 करोड़ महिलाएं रहती हैं. करीब 39 देशों में महिलाओं की जान बचाने के लिए अबॉर्शन को मंजूरी दी जाती है. इन देशों में दुनिया की करीब 36 करोड़ महिलाएं रहती हैं.

करीब 56 देशों में थैरेपी और हेल्थ के आधार पर अबॉर्शन को मंजूरी मिली हुई है. हेल्थ और थैरेपी के इतर कुछ देश महिला की सामाजिक और आर्थिक हालत को ध्यान में रखते हुए अबॉर्शन की इजाजत देते हैं. ऐसे करीब 14 देश हैं. इनमें ब्रिटेन सहित यूरोप के दूसरे देशों के साथ भारत भी शामिल है.

करीब 67 देशों में महिला की रिक्वेस्ट पर गर्भपात की इजाजत है. हालांकि, इन देशों में गर्भ की टाइमलिमिट तय करने के अलग-अलग नियम हैं. इन देशों में अमेरिका, कनाडा, चीन, रूस, ऑस्ट्रेलिया, साउथ अफ्रीका और यूरोप के ज्यादातर देश शामिल हैं.

गर्भपात को लेकर किस देश में कैसे नियम हैं, उसे प्रदर्शित करना नक्शा. गहरा लाल रंग प्रतिबंध को प्रदर्शित करता है और नीला रंग नियमों के लचीलेपन को. फोटो रिप्रोडक्टिव राइट्स की वेबसाइट से ली गई है.
गर्भपात को लेकर किस देश में कैसे नियम हैं, उसे प्रदर्शित करना नक्शा. गहरा लाल रंग प्रतिबंध को प्रदर्शित करता है और नीला रंग नियमों के लचीलेपन को. फोटो रिप्रोडक्टिव राइट्स की वेबसाइट से ली गई है.

सामाजिक तौर पर खुले माने जाने वाले और विकसित देशों में भी अबॉर्शन को मंजूरी देने के कानून हाल फिलहाल में ही बने हैं. द गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक पुर्तगाल में 2007 के रेफरेंडम के बाद अबॉर्शन को लीगल किया गया. वहीं स्पेन में 2010 में अबॉर्शन से जुड़े कानूनों को आसान बनाया गया. अमेरिका में टेक्सास और एलबामा जैसे कुछ कंजर्वेटिव राज्य हैं, जहां पर अबॉर्शन को बैन करने की तरफ काम हो रहा है. राज्यों के सेनेटेर इस दिशा में जुटे हुए हैं. यूरोप में ही पोलैंड और हंगरी जैसे कुछ देश हैं, जहां अबॉर्शन लगभग बैन है. इन देश की महिलाओं को अबॉर्शन कराने के लिए दूसरे देशों की यात्रा करनी पड़ती है. ब्रिटेन जैसे देश भी अबॉर्शन के लिए महिलाओं को उतनी आजादी नहीं देते.

अबॉर्शन एक मानवाधिकार है

अबॉर्शन महिलाओं का मानवाधिकार है. हम ये बात पूरी मजबूती से कह रहे हैं. एक महिला, जिसके गर्भ में बच्चा पलता है, उसे पैदा करने या गिराने का अधिकार उसे होना चाहिए. अबॉर्शन के खिलाफ तर्क देने वाले अक्सर ऐसा कहते हैं कि गर्भपात करना असल में किसी बच्चे की जान लेना है. लेकिन उन्हें साल 2018 में संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार कमेटी की इस संदर्भ में कही गई बात को सुनना चाहिए. कमिटी ने कहा था कि किसी के भी जीवन का अधिकार उसके जन्म लेने के बाद उसे मिलता है.

वहीं अबॉर्शन का अधिकार महिला के निजता के अधिकार से भी जुड़ा है, जो अपने आप में एक मानवाधिकार है. साथ ही साथ जीवन और अपने फैसले लेने का अधिकार भी. दुनिया के हर एक नागरिक को अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखने का अधिकार है. इनमें औरतें भी शामिल हैं. महिलाओं को अपने शरीर से जुड़े फैसले लेने का अधिकार है. यह एक बेसिक मानवाधिकार है. किसी संस्था, समाज और सरकार को इसमें दखल नहीं देना चाहिए. आप किसी को जबरन बच्चा पैदा करने के लिए मजबूर नहीं कर सकते.

वहीं हमारे देश में एक बहुत बड़ा विरोधाभास है अबॉर्शन को लेकर. वैसे तो अबॉर्शन को नैतिकता के तकाजे पर कुछ लोग बुरा मानते हैं. सरकारें भी कानून बनाने से पहले इसी कथित नैतिकता का हवाला देती हैं. लेकिन इसी देश में गैरकानूनी तरीके से गर्भ में पल रहे बच्चे का लिंग पता किया जाता है, अगर वो लड़की होती है, तो या तो उसे गर्भ में ही मार दिया जाता है या फिर जन्म के बाद सड़क पर या कूड़े के ढेर में फेंक दिया जाता है. अस्पतालों और क्लिनिक्स में बोर्ड तो लगे रहते हैं कि जन्म से पहले लिंग पता करवाना गैरकानूनी है, लेकिन ये काम होता धड़ल्ले से है. हम ये नहीं कह रहे कि हर जगह ऐसा होता है, लेकिन 21वीं शताब्दी के भारत की एक बहुत बड़ी जनसंख्या आज भी इस सोच से ग्रस्त है.


 

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