महिला दिवस पर ईरान में बिना हिजाब वाली औरतों का बेहद ताकतवर वीडियो आया है
हिजाब को लेकर देश में लगातार विरोध प्रदर्शन चलता आ रहा है.

मैं उन औरतों को जो अपनी इच्छा से कुएं में कूदकर और चिता में जलकर मरी हैं फिर से ज़िंदा करूंगा और उनके बयानात दोबारा कलमबंद करूंगा कि कहीं कुछ छूट तो नहीं गया? कहीं कुछ बाक़ी तो नहीं रह गया? कि कहीं कोई भूल तो नहीं हुई?
क्योंकि मैं उस औरत के बारे में जानता हूं जो अपने सात बित्ते की देह को एक बित्ते के आंगन में ता-जिंदगी समोए रही और कभी बाहर झांका तक नहीं और जब बाहर निकली तो वह कहीं उसकी लाश निकली जो खुले में पसर गयी है मां मेदिनी की तरह
ये रमाशंकर यादव 'विद्रोही' की लिखी लाइनें हैं जो मुझे इस खबर के मालूम चलते ही याद आईं. खबर है ईरान की. ईरान यानी वो देश जहां औरतों को हिज़ाब पहनना ज़रूरी है. यानी वहां ऐसा कानून है कि वो अपना सर और चेहरा ढक कर ही रखेंगी. ऐसा न करना गैर कानूनी है. हिजाब ईरानी राजनीति का एक बहुत बड़ा हिस्सा रहा है. इसे वहां का राम मंदिर भी कह सकते हैं. 1930 के दशक में आया रेज़ा शाह नाम का तानाशाह जो तबीयत से सेक्युलर था और उसने हिजाब को गैर-कानूनी घोषित कर दिया. कट्टरपंथियों की पत्नियों के सर से हिजाब नोच के फेंक देने के लिए उसने पुलिस तक भेज दी. 40 साल बाद 1979 में अयातुल्लाह वापस राज करने लगे और हिजाब को फिर से कम्पलसरी कर दिया गया. अब नया नियम बना कि अगर आपने हिजाब नहीं पहना है तो आपको 2 महीने की जेल होगी. अब पुलिस दूसरा काम कर रही थी. पुलिस अब ईरान की सड़कों पर ये मुक़म्मल कर रही थी कि हर जनाना सर एक कपड़े से ढंका था और सब कुछ 'ठीक' था. पुलिस अब सड़क पर चिल्ला रही थी - "या रुसारी या तुसारी" (या ढको या फंसो).
खैर, बात 2018 की. पिछले कुछ महीनों से ईरान में विद्रोह हो रहा हैं. विद्रोह करने वाली औरतें हैं जिन्हें अब और हिजाब नहीं पहनना है. क्या है कि सेचुरेशन पॉइंट हर चीज़ का होता है. गुब्बारे के फूलने और फिर फूट जाने का भी और इंसान के आजिज़ आकर फट पड़ने का भी. ईरान में वही हो रहा है. कम से कम दिख तो ऐसा ही रहा है.
ईरान में जगह-जगह औरतें अपने हिजाब को हवा में लहराती हुई 'नंगे सर' खड़ी देखी जा रही हैं. वो चलते-फिरते अपने बिना ढके सर को साथ लेकर चल रही हैं. ये उनका विद्रोह है. हम और आप इसे सोचेंगे तो अजीब लगेगा कि सर खुला रखना भी विद्रोह हो सकट अहै लेकिन एक तबका है जिसके लिए यही सच्चाई है. खैर, वीडियो देखिये,
इस वीडियो में ईरानी महिला जो कह रही है उसकी हिंदी कुछ ऐसी है, "मेरा नाम बहर है. मैं ईरान से हूं. मैं हिजाब पहनने को ज़रूरी किये जाने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ हूं. कुछ लोग ये कह सकते हैं कि हिजाब एक गंभीर समस्या नहीं है लेकिन एक ईरानी होने के तौर पर मैं इसे पहनने से साफ़ इनकार करती हूं. ये नियम हमारे देश के मर्दों का भी उतना ही अपमान करता है क्यूंकि मुझे हिजाब इसलिए पहनना चाहिए जिससे वो कोई 'पाप' न करें. ये कतई बुरी सोच है. मुझे डर लग रहा है कि अभी, जब मैं ये सब कह रही हूं, कोई मुझे परेशान कर सकता है, टोक सकता है. ये दुख की बात है कि मैं अपनी पसंद का काम करने का भी हक़ नहीं रखती हूं. मैं इसलिए अपने जैसी उन महिलाओं, जो हिजाब पहनने से इंकार करती हैं, को संबोधित करते हुए कहना चाहती हूं कि आप भी इसके ख़िलाफ़ अपना विरोध दर्ज करें. मेरे देश के पुरुष अपनी पत्नी, अपनी मां, अपनी बेटी को सपोर्ट करें. आइये, एक होकर इस बुरी प्रथा के ख़िलाफ़ लड़ाई करें. मैं जीत के प्रति आशावान हूं. बीते दिनों आई रिपोर्ट्स से मालूम चला है कि ईरान में सिर्फ़ फ़रवरी भर में 29 महिलाओं को हिजाब का विरोध करने के 'आरोप' में जेल में डाल दिया गया. ऐसे समय में 'विमेन्स डे' के मौके पर एक वीडियो सामने आया. ईरान की राजधानी तहरान से. वहां की मेट्रो ट्रेन से. महिलाओं का एक ग्रुप दिखाई दे रहा है. असल में तीन महिलाएं हैं. तीनों के सर पर कोई हिजाब-विजाब नहीं है. तीनों कुछ गा रही हैं. मालूम पड़ा कि वो 'सॉंग ऑफ़ इक्वालिटी' गा रही थीं. आप ये ताकतवर वीडियो देखिये.Today on Tehran's subway: Unveiled women bravely sing a popular women's movement song called "The song of equality" #InternationalWomensDay pic.twitter.com/cA3CkvUbA1
— Maryam Nayeb Yazdi (@maryamnayebyazd) March 8, 2018
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