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JNU के 3 प्रोफेसर गांव-भ्रमण पर थे, देशद्रोह का आरोप लेकर लौटे हैं

छत्तीसगढ़ के गांव वालों का कहना है कि वे नक्सलियों के पक्ष में भड़का रहे थे.

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20 मई 2016 (अपडेटेड: 20 मई 2016, 11:47 AM IST)
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पहले JNU में ही देशद्रोह को लेकर हुआ था बवाल. कन्हैया गए थे जेल.
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कन्हैया-कांड के बाद जेएनयू फिर चर्चा में है. स्टूडेंट्स को लेकर नहीं, बल्कि तीन प्रोफेसरों की वजह से. घटना छत्तीसगढ़ के सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित बस्तर इलाके की है. छत्तीसगढ़ पुलिस ने जेएनयू के तीन प्रोफेसरों के खिलाफ देशद्रोह के मामले में जांच शुरू की है. ये प्रोफेसर हैं, अर्चना प्रसाद, ऋचा केशव और विनीत तिवारी. शुरुआती जांच में पुलिस ने तीनों को देशद्रोह और छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा एक्ट के तहत दोषी पाया है. तफसील से जांच के बाद प्रोफेसर्स को गिरफ्तार किया जाएगा. केस दर्ज करने से पहले पुलिस तीनों आरोपियों को बयान  दर्ज करवाने के लिए नोटिस भेजेगी. पुलिस ने लोकल गांव वालों की शिकायत पर ये जांच शुरू की है.

मामला क्या है

12 से 16 मई 2016 के बीच की घटना है. तीनों प्रोफेसर बस्तर के कुम्बकोलेंग और नामा गांव गए थे. वहां वे गांव वालों से मिले. इलाके के पंच-सरपंच, सरकारी और गैर सरकारी उपक्रम से जुड़े लोगों से भी मुलाकात की. पहले तो नॉर्मली बात की. हाल-चाल पूछा. उसके बाद इलाके की पुलिस और नक्सलियों की गतिविधियों के बारे में पूछने लगे. बात खत्म हुई और तीनों प्रोफेसर जाने लगे. गांव वालो का कहना है कि वे जाते-जाते हमें धमकाते गए. और कहा कि हम सबको नक्सलियों के साथ रहना चाहिए, वरना वो हमारा गांव जला देगें. प्रोफेसर्स की ये बात गांव वालों को खराब लगी और उन्होंने तीनों के खिलाफ पुलिस में शिकायत कर दी. पुलिस ने तुरंत एक्शन लिया. हेडक्वार्टर में फौरन 8 अफसरों की टीम बनाकर उन्हें गांव भेजा गया. लोगों से बात कर मामले से जुड़ी सारी जानकारी इकठ्ठा की. प्रोफेसर से मिलने वाले लोगों के बारे में भी पुलिस ने पूछताछ की. यह बातचीत रिकॉर्ड भी की गई.

JNU का नाम है तो शिकायत कर दो: आरोपी प्रोफेसर

प्रोफेसर अर्चना प्रसाद का रिएक्शन आया है. उन्होंने कहा कि हम वहां माओवादियों और BSF/प्रशासन के कॉन्फ्लिक्ट की वजह से गांव वालों की मुश्किलों पर स्टडी करने गए थे. छत्तीसगढ़ के कई गांवों में गए. 4 दिन वहां रहे. रास्ते में कई चेक पोस्ट आए और हर चेक पोस्ट पर हमने अपनी सही जानकारी दी. हमने कोई भाषण नहीं दिया. लोगों से बातचीत की. हमने तो गांव वालों को सिर्फ एकजुट होने को कहा. साथ ही उनसे कहा कि वो न पुलिस के चक्कर में पड़ें, न माओवादियों के. अर्चना का दावा है कि गांव वालों के नाम से जो शिकायत की गई है, वह झूठी है. उनके मुताबिक, 'हम तो गांववालों के घर में रुके. उस गांव में 101 मकान में से सिर्फ 35 मकान है. उसमें भी 20-22 के नाम से ये कंम्पलेंट है. जिन गांव वालों को हिंदी ठीक से नहीं आती वो हिंदी में शिकायत और अंग्रेजी में सिग्नेचर कैसे कर सकते हैं. इसमें न सरपंच, न उपसरपंच के नाम हैं. जेएनयू का नाम है तो बस शिकायत कर दो. छत्तीसगढ़ सरकार नहीं चाहती कि उनकी गलत नीतियां सबके सामने आए. जो भी बाहर से उनकी स्कीम्स पर सवाल उठाता है वो विरोधी हो जाता है. ये सब प्रोपेगेंडा है.'
फिलहाल JNU के तीनों प्रोफेसर इलाके का दौरा कर वापस लौट आए हैं. लेकिन इसके बाद बस्तर के दोनों कुम्मकोलेंग और नामा गांव में बवाल मचा है. पुलिस को की गई शिकायत में 25 गांव वालों के सिग्नेचर हैं. जिसमें 13 गांव वालो ने अंग्रेजी में साइन किए हैं. पुलिस ने अपनी शुरुआती जांच में तीनों प्रोफेसरों के आचरण को गैरजिम्मेदार पाया. पुलिस के मुताबिक, तीनों प्रोफ़ेसर ग्रामीणों को सरकार के खिलाफ बगावत के लिए उकसा रहे थे. कुछ ग्रामीणों ने अपने बया में यह भी कहा है कि प्रोफेसर उनसे कह रहे थे कि केंद्र और राज्य सरकार उनके लिए कुछ नहीं कर सकती. सिर्फ नक्सली ही उनकी मदद कर सकते है. छत्तीसगढ़ के 29 में से 25 जिले नक्सल प्रभावित है. कोई आंशिक तो कोई पूरी तरह से. राज्य की जनता 1980 से नक्सलवाद का दंश भोग रही है.
ये स्टोरी 'द लल्लनटॉप' के साथ इंटर्नशिप कर रही जागृतिक ने एडिट की है.  

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