भारत में हिंदुओं की आबादी सबसे ज्यादा है. इसलिए इसे आम तौर पर भारत के संदर्भ मेंबहुसंख्यक समुदाय कहा जाता है. लेकिन, क्या भारत में ही हिंदू अल्पसंख्यक भी होसकते हैं? जवाब है हां. ऐसा हम नहीं, बल्कि भारत सरकार कह रही है. केंद्र सरकार नेकहा है कि अगर किसी राज्य में हिंदुओं की आबादी किसी समुदाय के मुकाबले कम है तो उसराज्य के भीतर उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा दिया जा सकता है. दरअसल, केंद्र सरकार नेसुप्रीम कोर्ट में कहा है कि राज्य सरकार भी धार्मिक या भाषाई आधार पर किसी समुदायको 'अल्पसंख्यक समुदाय' का दर्जा दे सकती है. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एकहलफनामा दाखिल किया है. यह हलफनामा बीजेपी नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय की साल2020 की एक याचिका के जवाब में दाखिल किया गया है. कई राज्यों में हिंदू अल्पसंख्यकयाचिका में कहा गया था कि 2011 की जनगणना के हिसाब से मिजोरम, नागालैंड, मेघालय,जम्मू-कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश, लक्षद्वीप, मणिपुर और पंजाब में हिंदू अल्पसंख्यकहैं. और सुप्रीम कोर्ट के 2002 के एक फैसले के मुताबिक इन राज्यों में उन्हेंअल्पसंख्यक का दर्जा दिया जाना चाहिए. 2002 में TMA पाई फाउंडेशन के मामले मेंसुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि धार्मिक और भाषाई आधार पर अल्पसंख्यक राज्यवार तय होनेचाहिए. केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में यह बताया है कि राज्य आबादी के हिसाब सेकिसी भी समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा देने को स्वतंत्र हैं. उसके मुताबिकमहाराष्ट्र ने 2016 में यहूदियों को अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा दिया था. इसी तरहकर्नाटक ने भी उर्दू, तेलुगू, तमिल, मलयालम, मराठी, तुलु, लमानी, हिंदी, कोंकणी औरगुजराती को अल्पसंख्यक भाषाओं का दर्जा दिया था. अश्विनी उपाध्याय ने क्यों दायर कीयाचिका? याचिका में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान आयोग कानून, 2004 कीधारा-2(F) को चुनौती दी गई थी. इस कानून के तहत अल्पसंख्यक समुदायों को स्वतंत्रतरीके से शिक्षण संस्थानों की स्थापना करने और उसे चलाने का अधिकार दिया जाता है.इसी कानून के तहत सरकार ऐसे संस्थानों को फंड और दूसरी सुविधाएं देती है. हालांकि,इस कानून की धारा-2(F) अल्पसंख्यकों की पहचान केंद्र सरकार द्वारा तय किए समुदायोंके रूप में ही करती है. याचिकाकर्ता ने कहा कि लद्दाख, मिजोरम, लक्षद्वीप, कश्मीर,नागालैंड, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, पंजाब और मणिपुर में यहूदी, बहाई और हिंदू धर्मको मानने वाले लोग "वास्तविक अल्पसंख्यक" हैं. लेकिन, वे अपनी पसंद से शिक्षणसंस्थानों को नहीं खोल और चला सकते हैं. अश्विनी उपाध्याय ने यह भी कहा किराष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान आयोग कानून, 2004 केंद्र को काफी ताकत देताहै, जो मनमाना और अतार्किक है. हालांकि, केंद्र ने इस दलील को गलत बताया और कहा किराज्य भी अपने नियमों के हिसाब से संस्थानों को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा देसकते हैं. याचिका के जवाब में सरकार ने कहा कि हिंदू, यूहदी और बहाई भी जहांअल्पसंख्यक हैं, वहां वे अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान खोल सकते हैं. केंद्र सरकारने ये भी कहा कि संविधान के तहत संसद और राज्य विधानमंडल दोनों के पास अल्पसंख्यकोंको संरक्षण देने के लिए कानून बनाने का अधिकार है. हालांकि, केंद्र सरकार ने ये भीकहा कि अल्पसंख्यकों से जुड़े मामलों में कानून बनाने का अधिकार सिर्फ राज्यों कोनहीं दिया जा सकता. क्योंकि इससे संविधान और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उल्लंघनहोगा. "संविधान में नहीं है दर्ज" इस बारे में संविधान के जानकार और लोकसभा केपूर्व सेक्रेटरी जनरल पीडीटी आचार्य ने दी लल्लनटॉप से बातचीत में कहा कि येसंविधान में कहीं दर्ज नहीं है कि राज्य सरकारें किसी समुदाय को अल्पसंख्यक कादर्जा दे सकती हैं. हालांकि उन्होंने आगे कहा, "संविधान के अनुच्छेद-30 के आधार परसभी अल्पसंख्यकों (भाषाई और धार्मिक आधार पर) के अधिकारों को तय किया गया है. अगरकेंद्र सरकार राज्यों को यह अधिकार दे रही है तो यह सही है." संविधान के अनुच्छेद30(1) के तहत, सभी धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थानको स्थापित करने और उसे चलाने का अधिकार है. सुप्रीम कोर्ट ने इसी अनुच्छेद काहवाला देते हुए TMA पाई फाउंडेशन केस में कहा था कि यह राज्यवार होना चाहिए. सवालउठता है कि क्या राज्यों द्वारा तय अल्पसंख्यक और केंद्र सरकार द्वारा तयअल्पसंख्यकों को मिलने वाली अलग-अलग सुविधाओं से कोई टकराव हो सकता है. इस परपीडीटी आचार्य ने कहा, "किसी राज्य में अल्पसंख्यक होने की वजह से किसी खास समुदायको अगर मदद मिलती है तो वह मिलनी चाहिए. वहीं केंद्र सरकार अपने हिसाब सेअल्पसंख्यकों को सुविधाएं देगी. भले ही वो किसी खास राज्य में बहुमत में हों. इससेफर्क नहीं पड़ता है." केंद्र के मुताबिक कौन हैं अल्पसंख्यक? राष्ट्रीय अल्पसंख्यकआयोग कानून, 1992 की धारा-2(C) के तहत, केंद्र सरकार ने 1993 में 5 समुदायों कोअल्पसंख्यक का दर्जा दिया था. इसके तहत मुस्लिम, सिख, बौद्ध, पारसी और ईसाई समुदायको शामिल किया गया. जनवरी 2014 में इसमें जैन समुदाय को भी जोड़ा गया.Central govt clarifies before #SupremeCourt:- States are empowered to notify minorities, - Allegation that Hindus, JewsBaha’i followers cannot establish educational institutions of their choice isnot correct pic.twitter.com/YFU0qQ5uMQ — Bar & Bench (@barandbench) March 27,2022 इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अश्विनी उपाध्याय ने सबसे पहले2017 में अल्पसंख्यकों की पहचान के लिए उपयुक्त गाइडलाइंस और कुछ राज्यों मेंहिंदुओं को अल्पसंख्यक घोषित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था. उन्होंने1993 के केंद्र सरकार के उस नोटिफिकेशन को रद्द करने की मांग की थी जिसमें 5समुदायों को अल्पसंख्यक घोषित किया गया था. अश्विनी उपाध्याय का कहना था कि 2014में जैन समुदाय को भी अल्पसंख्यक सूची में जोड़ा गया. लेकिन कुछ राज्यों औरकेंद्रशासित प्रदेशों में हिंदुओं के अल्पसंख्यक होने के बावजूद उन्हें अल्पसंख्यकका दर्जा नहीं दिया गया.