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सुप्रीम कोर्ट में क्यों हुआ बिधूड़ी का जिक्र? अपमानजनक बयानबाजी पर क्या बोली अदालत?

JMM की सीता सोरेन से जुड़े 'वोट के लिए रिश्वत' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि सदन में अपमानजनक बयान को क़ानूनी छूट नहीं मिलनी चाहिए. इसी दौरान BJP सांसद रमेश बिधूड़ी की बयानबाजी का भी जिक्र हुआ.

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6 अक्तूबर 2023 (अपडेटेड: 6 अक्तूबर 2023, 03:15 PM IST)
jmm sita soren supreme court defamatory statement in parliament
सुप्रीम कोर्ट में हुआ BJP सांसद रमेश बिधूड़ी के बयान का जिक्र. (फोटो: लोकसभा टीवी)
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क्या सांसद-विधायक सदन के अंदर कुछ भी कहें, कुछ भी करें, उन पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हो सकती? खबर है कि सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) ने संसद या विधानसभाओं में अपमानजनक बयानबाजी को अपराध मानने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने 5 अक्टूबर को कहा है कि सदन के अंदर राजनीतिक विरोधियों के लिए अपमानजनक बयान देना अपराध नहीं है. 

इससे पहले, प्रस्ताव में कहा गया था कि देश की संसद और राज्यों की विधानसभाओं में अपमानजनक बयान देने को क़ानून से छूट नहीं मिलनी चाहिए और ऐसा करने वालों पर आपराधिक साजिश के तहत सजा वाले कानूनों को लागू किया जाए. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने ये कहते हुए प्रस्ताव को खारिज कर दिया कि सदन के अंदर कुछ भी बोलने पर सांसदों या विधायकों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती. उन्हें सदन के अंदर बोलने की पूरी आजादी है.

मामला क्या था?

अंग्रेजी टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट, झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की विधायक सीता सोरेन के खिलाफ ‘वोट के बदले रिश्वत’ के आरोप में एक मामले की सुनवाई कर रहा था. सीता सोरेन पर साल 2012 में राज्यसभा चुनाव के लिए वोट देने के बदले रिश्वत लेने का आरोप लगा था. सात जजों की बेंच में CJI DY चंद्रचूड़, जस्टिस AS बोपन्ना, MM सुंदरेश, PS नरसिम्हा, JB पारदीवाला, संजय कुमार और मनोज मिश्रा शामिल थे.

सुनवाई के दौरान, सीनियर एडवोकेट राजू रामचंद्रन, सीता सोरेन के बचाव में दलीलें दे रहे थे. उन्होंने तर्क दिया कि सीता सोरेन को संविधान के आर्टिकल 194(2) के तहत सदन में 'कुछ भी कहने या वोट देने' की छूट हासिल है. उन्होंने ये भी कहा कि अगर सदन में वोट डालने या भाषण देने से जुड़ा कोई पुराना गैरकानूनी काम इम्यून नहीं है (यानी उसे कानूनी कार्रवाई से छूट नहीं है), तो सदस्यों को सदन के अंदर अपमानजनक भाषण देकर दूसरे सदस्यों को बदनाम करने की साजिश के लिए दोषी ठहराया जाएगा.

राजू ने हाल ही में बसपा सांसद दानिश अली और भाजपा सांसद रमेश बिधूड़ी से जुड़े संसद में बयानबाजी वाले प्रकरण का भी जिक्र किया. कहा कि वोट या भाषण से जुड़ी कोई भी चीज, भले ही वह रिश्वत या साजिश क्यों न हो, उसे अभियोजन से पूरी तरह छूट (Absolute Immunity) मिलनी चाहिए, वरना सदन के पटल पर अपमानजनक भाषण देने वाले लोगों की भाषण देने से पहले ही संभावित साजिश की जांच करनी होगी. माने ये जांच भाषण देने के पहले ही करनी होगी कि क्या वो जानबूझकर अपमानजनक भाषण देने की साजिश तो नहीं कर रहे.

दरअसल, 21 सितंबर को लोकसभा के स्पेशल सेशन के आखिरी दिन देश के वैज्ञानिकों और चंद्रयान की उपलब्धि पर बात हो रही थी. तभी दक्षिणी दिल्ली लोकसभा क्षेत्र से सांसद रमेश बिधूड़ी ने अपना भाषण पढ़ना शुरु किया. बिधूड़ी जब बोल रहे थे तो विपक्ष की बेंच से हल्ला हो रहा था. यूपी के अमरोहा से आने वाले बसपा सांसद कुंवर दानिश अली की आवाज तेज सुनाई दे रही थी. इसके बाद रमेश बिधूड़ी ने दानिश अली के खिलाफ अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया. बाद में बिधूड़ी के इस बयान को सदन की कार्यवाही से हटा दिया गया.

इसके बाद दानिश अली ने लोकसभा स्पीकर को चिट्ठी लिखी. लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला ने बुलावा भेजा. रमेश बिधूड़ी हाजिर हुए. चेतावनी दी गई. क्या चेतावनी? अगली बार ऐसा हुआ तो कड़ी कार्रवाई होगी. चेतावनी देने के बाद छोड़ दिया गया. मामला विशेषाधिकार समिति के पास तक पहुंच गया. सदन के भीतर तो ये सबकुछ हुआ, बाहर भाजपा ने रमेश बिधूड़ी को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया. 

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कोर्ट ने क्या कहा?

हालांकि जजेज़ की बेंच ने सदन के अंदर कुछ भी बोलने को कानूनी कार्रवाई से 'पूरी छूट' देने के प्रस्ताव से असहमति जताई. लेकिन आगे CJI चंद्रचूड़ ने ये भी कहा,

“अगर जिस काम को करने का इरादा है वो एक गैरकानूनी काम है तो ये एक आपराधिक साजिश है. लेकिन यहां सदन के पटल पर एक कथित मानहानि वाला बयान देने का काम गैरकानूनी नहीं है. और इसे अभियोजन से संवैधानिक छूट है. और अगर किसी अपराध की सामग्री, उस भाषण में है जिसे कानूनी छूट है, तो इस पर कोई सजा वाला क़ानून लागू नहीं किया जा सकता.”

CJI ने ये भी कहा कि सदन ऐसे भाषणों के मामले खुद देखने में सक्षम है.

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सीता सोरेन का मामला अलग?

इधर अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने कहा कि कुछ भी जो किसी भी क़ानून के तहत अपराध है, उसे सदन में भाषण देने या वोट देने के मामलों में अभियोजन से मिली छूट के तहत छोड़ा नहीं जा सकता. उन्होंने सीता सोरेन के मामले को भी अलग बताया. उन्होंने कहा कि राज्यसभा के चुनाव में वोटिंग का सदन की कार्यवाही से कोई लेना-देना नहीं है, इसलिए राज्यसभा के चुनाव में 'मतदान के लिए कथित रूप से ली गई रिश्वत' के लिए सीता पर अभियोग चलाया जाना चाहिए.

ऐसा ही कुछ सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी कहा. उनका कहना था कि रिश्वतखोरी को कभी भी आर्टिकल (105)(2) और 194(2) के तहत छूट के दायरे में नहीं लाया जा सकता. क्योंकि भले ही ये संसद या विधानसभा में वोटिंग या भाषण से जुड़ा हो, लेकिन ये अपराध सदन के बाहर किया जाता है.

उन्होंने कहा,

"सुप्रीम कोर्ट को किसी सांसद द्वारा सदन के अंदर दूसरे सांसद को रिश्वत देने के दुर्लभतम मामले को लेकर प्रावधानों की व्याख्या करने की जरूरत नहीं है."

बेंच ने दो दिनों की कार्यवाही के बाद इस मामले पर अपना फैसला सुरक्षित कर लिया है. ये बड़ा मामला इसलिए है क्योंकि ये सुनवाई, 25 साल पहले के PV नरसिम्हा राव के उस फैसले की समीक्षा के लिए शुरू की गई थी, जिसमें उन्होंने JMM के उन सांसदों और विधायकों को बचाया था जिन्होंने वोट डालने के लिए घूस ली थी.

वीडियो: बीजेपी एमपी रमेश बिधूड़ी बोले- 'मैंने आपको धक्का भी नहीं दिया'

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