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कोर्ट में नहीं चलेगा मुस्लिम मर्दों का तीन तलाक सिस्टम

तलाक देने के लिए पहले सारी कंडीशंस कोर्ट में रखनी होंगी. ताकि बीवी न चाहती हो तो उन पर जिरह हो सके.

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27 जनवरी 2016 (अपडेटेड: 26 जनवरी 2016, 04:18 AM IST)
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Source: PTI
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मुस्लिम औरतों को मुंबई हाईकोर्ट के इस फैसले से थोड़ा आराम मिलेगा. कोर्ट ने कहा है कि आदमी जो धांय से तीन बार तलाक कह देता है. और सब जिम्मेदारियों से भाग छूटता है. अब ऐसा नहीं होगा. कोर्ट में सिर्फ तलाकनामा लगाने से काम नहीं चलेगा. मुस्लिम पर्सनल लॉ के हिसाब से मर्दों को ये हक हासिल है. जरा सा मामला भड़का बस बोल दिया तलाक तलाक तलाक. इत्ते में काम हो गया. इंटरनेट, फोन और मैसेज से भी होने लगा था ऐसे ही. अब इस तरह के तलाक को गैर कानूनी माना जाएगा. कोर्ट ने कहा कि तलाक कहने भर से तलाक नहीं होगा. उससे पहले की कंडीशंस आदालत में पेश करनी होंगी. जिन पर बहस होगी. अगर बीवी को न मंजूर हो तो उन कंडीशंस पर वकालत हो. जिस मामले की सुनवाई हो रही थी. मजिस्ट्रेट ने मुस्लिम पत्नी के गुजारे भत्ते के लिए धारा 125 वाली अर्जी लगा दी थी. सेशन कोर्ट ने उसको एक्सेप्ट किया. 1500 रुपए हर महीने गुजारे के और 5000 मुकदमा खर्च देने का ऑर्डर दिया. कोर्ट ने कहा कि प्रॉपर कानूनी तलाक की ये शर्ते हैं 1: शादी जारी रखने के लिए मतलब भर की कोशिश हुई हो. बड़े बुजुर्गों से लेकर खुद उन्होंने शादी बचाने की कोशिश की हो. 2: अलगाव के बाद फिजिकल रिलेशन न बने हों. 3: तलाकनामा जो कोर्ट में पेश किया जा रहा है. उसके गवाह मुस्लिम हों. चाहे दो मर्द या दो औरतें. इतना करने के बाद सारे नियम और शर्तों पर दलीलें गवाहियां होने के बाद तलाक होगा. सिर्फ तीन बार कहने से नहीं. [total-poll id=8363]

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