वो एक्टर, जिनकी फिल्मों की टिकट लेते 4-5 लोग तो भीड़ में दबकर मर जाते हैं
एनटीआर और अक्किनेनी नागेश्वरा राव के बाद तेलुगु फिल्मों के सबसे बड़े आइकन चिरंजीवी से जुड़े पांच किस्से.

आंध्र प्रदेश के सिनेमा यानी तेलुगु भाषा वाली फिल्मों के सबसे बड़े स्टार चिरंजीवी ने 2007 में प्रदर्शित हुई 'शंकर दादा एमबीबीएस' के बाद फिल्में छोड़ दी थीं. ये राजकुमार हीरानी की 'मुन्नाभाई एमबीबीबएस' की रीमेक थी. इस बीच उन्होंने प्रजा राज्यम पार्टी बनाई थी, फिर कॉन्ग्रेस में शामिल हुए, पर्यटन राज्यमंत्री बने, राज्यसभा सांसद बने, इन महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के दौर में उनके पास फिल्मों के लिए टाइम नहीं था. करीब दस बरस बाद, उनकी कमबैक फिल्म आई - 'कैदी नंबर 150'. ये नाम इसलिए क्योंकि ये उनकी 150वीं फिल्म थी.
इसका निर्माण उनके बेटे राम चरण तेजा ने किया था, जिन्होंने प्रियंका चोपड़ा के साथ 'जंजीर' (2013) से हिंदी सिनेमा में एंट्री लेने की कोशिश की लेकिन फ्लॉप रहे. वे खुद तेलुगु में बड़े सितारे हैं लेकिन पापा एक्टिंग कर रहे थे तो वे प्रोड्यूसर बन गए.
चिरंजीवी को फिल्मों में आए 42 साल से ज़्यादा हो चुके हैं. उनकी ज्यादातर फिल्में तेलुगु में रही हैं लेकिन कुछ हिंदी फिल्मों में भी हमने उन्हें देखा. इनमें सबसे पहली थी 1990 में आई 'प्रतिबंध'. अनीस बज़्मी की लिखी थी. जूही चावला हीरोइन थीं. इसमें चिरंजीवी वैसे ही एंग्री यंग पुलिसवाले बने थे जैसे अमिताभ बच्चन 'जंजीर' में थे. अगले साल मीनाक्षी शेषाद्रि के साथ 'आज का गुंडाराज' रिलीज हुई. 1994 में 'द जेंटलमैन' रिलीज हुई जिसे महेश भट्ट ने डायरेक्ट किया था. 2002 में प्रदर्शित उनकी तेलुगु फिल्म 'इंद्रा' का हिंदी में डब्ड वर्जन 'इंद्रा - द टाइगर' टीवी पर बहुत बार दिखाया जा चुका है.
जानते हैं एनटीआर और अक्किनेनी नागेश्वरा राव के बाद तेलुगु फिल्मों के सबसे बड़े आइकन चिरंजीवी से जुड़े पांच किस्से और अन्य बातें:
1. सलमान के साथ जिगरी दोस्ती
चिरंजीवी के यहां एक सेलिब्रेशन पर पहुंचे सलमान.
सलमान खान और चिंरजीवी गहरे दोस्त हैं. दोनों ने पेय पदार्थ थम्स अप का विज्ञापन साथ में शूट किया था तब से. चिरंजीवी आमतौर पर फिल्म इंडस्ट्री के लोगों के साथ पार्टियां नहीं करते हैं लेकिन सलमान अकेले हैं जो ऐसा करवा लेते हैं. चिरंजीवी के बेटे और एक्टर राम चरण तेजा कहते हैं कि सलमान ही है जो मेरे पिता को युवा बना देते हैं. वे हमेशा कहते हैं, तुम अपने पिता को एक हफ्ते के लिए मेरे पास मुंबई छोड़ दो. वो एक नए चिरंजीवी बन जाएंगे. मैं उन्हें उनकी 150वीं फिल्म से पहले तरोताजा कर दूंगा और वो दस साल छोटे लगेंगे.
2. हनुमान भक्त, वहीं से लिया फिल्मी नाम
चिरंजीवी का असली नाम सिवा संकर वरा प्रसाद है. जब वे फिल्मी दुनिया के लिए अपना नया नाम सोच रहे थे तो उन्हें सपना आया कि एक बुजुर्ग आदमी और एक लड़की उन्हें चिरंजीवी नाम से पुकार रहे हैं. उन्होंने अपनी मां से इस बारे में बात की जो हनुमान की बड़ी भक्त रहीं. चिंरजीवी भी हैं. उनकी मां ने इस नाम के लिए हां कर दी क्योंकि ये अंजनेय स्वामी यानी हनुमान का ही दूसरा नाम है.
3. एक्टर बने क्योंकि आकर्षण का केंद्र बनना था
जब चिरंजीवी किशोर थे तब उन्हें सबके आकर्षण का केंद्र बनना बहुत पसंद था. वे स्कूल में, एनसीसी कैंप में और अपने रिश्तेदारों के सामने फिल्मी गानों पर नाचा करते थे. 70 के दशक में उन्होंने एक्टर बनने की ठान ली. कुछ नाटकों में काम किया. फिर मद्रास के एक इंस्टिट्यूट में एक्टिंग सीखने लगे. 1978 में कोर्स खत्म किया और पहली फिल्म की शूटिंग शुरू कर दी. ये इतना जल्दी यूं हुआ कि फिल्म संस्थान में थे तब उनके एक दोस्त को संबंधित फिल्म में रोल करना था. लेकिन उसका किसी अन्य निर्माता से दूसरी फिल्म न करने का करार था. ऐसे में उसने चिरंजीवी का नाम सुझाया. उस फिल्म को देख एक और तेलुगु प्रोड्सूसर क्रांतिकुमार ने अपनी ब्लैक एंड वाइट आर्ट फिल्म में चिरंजीवी को लिया. उसके बाद बापू और बालाचंदर जैसे बड़े निर्देशकों ने कई फिल्मों के लिए साइन कर लिया. करियर के अधिकतम समय तक चिरंजीवी की एक फिल्म खत्म होने और दूसरी शुरू होने में 10 दिन से ज्यादा का फर्क नहीं रहा.
4. अच्छे डांसर हैं तो हैलेन के कारण
हैलेन और चिरंजीवी.
साउथ के स्टार्स में चिरंजीवी के डांस को सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है. लेकिन उन्होंने डांस कहीं से सीखा नहीं है. दरअसल उन्होंने हिंदी फिल्म एक्ट्रेस हैलेन को "पिया तू अब तो आजा.." गाने पर नाचते हुए देखा तब से नाचने लगे. जब भी रेडियो पर ये गाना बजता वे नाचते थे. फिर ऐसा वे लगातार घर के सदस्यों के सामने करने लगे और उनकी तारीफ से उनका हौसला बढ़ता गया. हैलेन के कारण ही वे डांसर बने.
5. नई फिल्मों की ये दीवानगी कि लोग मारे जाते हैं
फिल्म टैगोर के पोस्टर में चिरंजीवी.
उनकी दीवानगी इतनी है कि अंदाजा लगाना मुश्किल है. उनकी नई फिल्मों की रिलीज के पहले ही दिन टिकट के लिए इतनी भीड़ मचती है कि भगदड़ में लोग मारे जाते हैं. ऐसा एक से ज्यादा बार हो चुका है. 2003 में उनकी फिल्म 'टैगोर' की टिकट लेने के दौरान भगदड़ में चार लोग मारे गए. एक बार एक फैन उनके करीब आकर छूने की कोशिश कर रहा था कि उसे बिजली का झटका लग गया.
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