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'हम निर्दोष, राजनीति का शिकार हुए', जेल से रिहा हुए बिलकिस बानो केस के दोषी बोले

2002 गुजरात दंगों के दौरान बिलकिस बानो के साथ गैंगरेप और उनके परिवार के 7 लोगों की हत्या करने वालों को राज्य सरकार ने रिहाई दे दी.

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16 अगस्त 2022 (अपडेटेड: 16 अगस्त 2022, 11:27 PM IST)
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21 जनवरी, 2008 को मुंबई की एक विशेष सीबीआई अदालत ने 11 आरोपियों को दोषी पाया | फोटो : आजतक
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गुजरात के बिलकिस बानो गैंगरेप और मर्डर केस में दोषी सभी 11 कैदियों को रिहा कर दिया गया है. इन लोगों में से कई ने जेल से बाहर आने के बाद दावा किया है कि उन्हें राजनीति का शिकार बनाया गया था. न्यूज़ एजेंसी PTI की रिपोर्ट के मुताबिक, एक दोषी शैलेश भट्ट ने मंगलवार, 16 अगस्त को दावा किया कि राजनीति के चलते उनका इस मामले में नाम आया था.

63 वर्षीय शैलेश भट्ट ने मीडिया से बातचीत में कहा,

जो लोग दोषी ठहराए गए सभी दाहोद जिले के सिंगोर के हैं, ये एक छोटा सा गांव है. हम सभी राजनीति के शिकार थे. जब मुझे गिरफ्तार किया गया, तो मैं एक किसान और भाजपा की जिला इकाई का पदाधिकारी था. जबकि मेरे साथ दोषी ठहराया गया मेरा भाई मितेश पंचमहल डेयरी में क्लर्क के रूप काम कर रहा था.  

‘हमने 18 साल जेल में बिता दिए’

शैलेश भट्ट ने पत्रकारों से बातचीत में आगे कहा,

'हमें 2004 में गिरफ्तार किया गया था और हम 18 साल से अधिक समय तक जेल में रहे. अपने परिवार के सदस्यों के साथ घर में रहना अच्छा लग रहा है. हर कोई खुश है कि हम वापस आ गए हैं. मेरा बेटा तब आठ या नौ साल का था, अब वो बड़ा हो गया है. पंचमहल डेयरी में काम करता है. मैं उसके लिए खुश हूं.'

एक अन्य दोषी राधेश्याम शाह ने भी सोमवार, 15 अगस्त को अपनी रिहाई के बाद दावा करते हुए कहा था,

‘हम सभी निर्दोष हैं. हमारी विचारधारा के कारण हमें फंसाया गया था.’

क्या था बिलकिस बानो केस?

27 फरवरी 2002 को गुजरात के गोधरा स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस के कोच को जला दिया गया था. इस ट्रेन से कारसेवक अयोध्या से लौट रहे थे. इससे कोच में बैठे 59 कारसेवकों की मौत हो गई थी. इसके बाद गुजरात में दंगे भड़क गए थे. दंगों की आग से बचने के लिए बिलकिस बानो अपनी बच्ची और परिवार के साथ गांव छोड़कर चली गई थीं. बिलकिस बानो और उनका परिवार जहां छिपा था, वहां 3 मार्च 2002 को 20-30 लोगों की भीड़ ने तलवार और लाठियों से हमला कर दिया. भीड़ ने बिलकिस बानो के साथ बलात्कार किया. उस समय बिलकिस 5 महीने की गर्भवती थीं. इतना ही नहीं, उनके परिवार के 7 सदस्यों की हत्या भी कर दी थी. बाकी 6 सदस्य वहां से भाग गए थे.

बिलकिस बानो केस में 6 साल सुनवाई के बाद सजा

इस मामले में करीब 6 साल तक सुनवाई हुई. फिर 21 जनवरी, 2008 को मुंबई की एक विशेष सीबीआई अदालत ने 11 आरोपियों को दोषी पाया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई. बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी सजा को बरकरार रखा.

रीमिशन पॉलिसी से छूटे दोषी

इस मामले के एक दोषी ने 15 साल से अधिक की सजा काटने के बाद CrpC की धारा 432 और 433 के तहत सजा को माफ करने के लिए गुजरात हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. HC ने ये कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि उनकी माफी के बारे में फैसला करने वाली 'उपयुक्त सरकार' महाराष्ट्र है, ना कि गुजरात. तब दोषियों की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई. सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार को 9 जुलाई 1992 की माफी नीति के अनुसार समय से पहले इन दोषियों की रिहाई की एप्लीकेशन पर विचार करने का निर्देश दिया. जिसके बाद राज्य सरकार ने इनकी रिहाई को मंजूरी दे दी. 15 अगस्त को इन्हें जेल से रिहा कर दिया गया.

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