क्या इन 297 पंछियों की जान 5G नेटवर्क टेस्टिंग की वजह से गई?
क्या अक्षय कुमार ने 2.0 में सही कहा था कि मोबाइल से पक्षी मरते हैं?
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फोटो - thelallantop
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दुनिया भर के अख़बारों में एक खबर छपी. हेग में 5G की टेस्टिंग के दौरान 297 पक्षियों की जान चली गर्इ. खबर में ये भी बताया गया कि आसपास के अन्य जीव जंतुओं में भी इसके काफी दुष्परिणाम देखे गए. हाल ही में रिलीज़ हुई 2.0 याद आ गई.
पड़ताल
2.0, वो फिल्म जिसमें दिखाया गया था कि कैसे मोबाइल नेटवर्क के चलते पक्षी मारे जा रहे हैं. ऐसे में इस खबर का भारत में ‘जगंल की आग’ सरीखा फैलना लाज़िमी था. देश की कई ट्रस्टेड न्यूज़ एजेंसीज़ भी फेक न्यूज़ के इस मकड़जाल में फंसती नज़र आईं. कुछ न्यूज़ पोर्टल्स ने ये खबर गैलेक्टिक कनेक्शन
तो कुछ ने हेल्थ नट न्यूज़
नाम की वेबसाइट्स का हवाला देकर चलाई.
यूएस की स्नोप्स
नाम की एक न्यूज़ वेबसाइट के ‘फैक्ट चेक’ नाम के सेक्शन में ये खबर फेक पाई गई. उनके अनुसार ये सही है कि हेग में सैकड़ों की संख्या में पक्षी मारे गए थे लेकिन इनका किसी ‘5G टेस्टिंग’ से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं था. वेबसाइट के अनुसार पक्षियों में ये घटना ‘एबनॉर्मल’ होते हुए भी असामान्य नहीं है.
हेग के नज़दीक 28 जून, 2018 को बेशक एक 5जी टेस्ट किया गया था लेकिन उस वक्त पक्षियों के मारे जाने की कोई खबर नहीं थी. पक्षियों के मारे जाने का क्रम 19 अक्टूबर के आस पास शुरू हुआ था. स्नॉप्स ने कई अन्य स्रोतों से भी पुष्टि की कि हेग में उस दौरान ऐसा कोई अन्य परीक्षण नहीं हुआ है.

मित्रों अच्छे आतंकवाद और बुरे आतंकवाद जैसी कोई चीज़ नहीं होती. आतंकवाद, आतंकवाद होता है! हां, रेडिएशन के बारे में बात दूसरी है!
भारत की फैक्ट चेक करने वाली एक और वेबसाइट ऑल्ट न्यूज़
ने भी इस खबर की पड़ताल की और पाया कि दुनिया भर के अख़बारों/न्यूज़ पोर्टल्स में छपी ये स्टोरी अक्षरशः झूठ है.
दरअसल गुड टेरेरिज्म - बेड टेरेरिज्म की तर्ज़ पर ही गुड रेडिएशन - बेड रेडिएशन भी होता है. गुड रेडिएशन को नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन और बेड रेडिएशन को आयोनाइजिंग रेडिएशन कहते हैं. रेडियो वेव, जो मोबाइल में यूज़ होती हैं वो गुड रेडिएशन या नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन हैं.
इस पूरी साइंस को हम पहले भी रीडर्स को आसान भाषा में समझा चुके हैं. एक्स-रे के डर को रीडर्स के दिमाग से निकालने के लिए –
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बेशक मोबाइल और मोबाइल टावर से रेडिएशन निकलते हैं लेकिन ये हानिकारक नहीं होते हैं या यूं कहें कि एक तय मानकों के भीतर सेफ हैं. और वो तय मानक दुनिया भर में इतने कठोर बनाए गए हैं कि उस तक पहुंचना चाह कर भी मुश्किल है.साथ ही छोटे-मोटे नेगेटिव इफेक्ट तो किस चीज़ के नहीं होते, इसके भी हैं हीं. मगर इतने नहीं कि एक जगह टेस्टिंग हो और सैकड़ों पक्षी मारे जाएं. तो यदि आप पशु प्रेमी हैं तो बिना किसी गिल्ट के अपने मोबाइल फोन का उपयोग कीजिए. कीजिए मगर कम कीजिए. आखिर मृत्यु के अलावा जीवन में और भी खतरे हैं.
वीडियो देखें -
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