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डीपी त्रिपाठी : राजीव गांधी के करीबी नेता, जिन्होंने सोनिया के विरोध में कांग्रेस छोड़ दी थी

"संसद में सेक्स पर बात क्यों नहीं होती" कहने वाले डीपी त्रिपाठी का आज निधन.

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2 जनवरी 2020 (अपडेटेड: 2 जनवरी 2020, 10:04 AM IST)
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डीपी त्रिपाठी, जो अरुण जेटली और राहुल गांधी दोनों के करीबी थे, और इंदिरा गांधी के विरोध में जेल चले गए
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देवी प्रसाद त्रिपाठी. छोटे में कहें तो डीपी त्रिपाठी. डीपीटी. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता और राज्यसभा सांसद. लम्बे समय से कैंसर से पीड़ित थे. 2 जनवरी 2020 की सुबह दिल्ली में उनका देहांत हो गया.
उनके निधन की जानकारी एनसीपी नेता सुप्रिया सुले ने दी. यूपी के सुल्तानपुर में जन्मे. 16 साल की उम्र में ही राजनीति में आए. पहले इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में गए. फिर आए जेएनयू. स्टूडेंट यूनियन के प्रेसिडेंट चुने गए. उस समय डीपीटी वामपंथी संगठन SFI से जुड़े हुए थे. देश में आई इमरजेंसी. डीपीटी को गिरफ्तार करने पुलिस पहुंची जेएनयू. डीपीटी वहां नहीं मिले. डीपीटी बाराखम्भा रोड की धोबियों की कॉलोनियों में जाकर छिप गए थे.
उस समय इंदिरा गांधी की बहू मेनका गांधी जेएनयू में पढ़ने आती थीं. डीपीटी छिपकर जेएनयू पहुंचे और मेनका गांधी से कहा कि वे छात्र आंदोलन का स्वागत करें. मेनका गांधी को गुस्सा आ गया. पुलिस ने डीपीटी की खोज और तेज़ी से शुरू कर दी. डीपीटी फिर से अंडरग्राउंड. लेकिन नवम्बर में हो गए गिरफ्तार.
डीपीटी इमरजेंसी के समय मेनका गांधी से मिलने जेएनयू पहुंच गए थे. मेनका को आया था गुस्सा और पुलिस ने डीपीटी की और तेज़ी से खोज शुरू कर दी थी. डीपीटी इमरजेंसी के समय मेनका गांधी से मिलने जेएनयू पहुंच गए थे. मेनका को आया था गुस्सा और पुलिस ने डीपीटी की और तेज़ी से खोज शुरू कर दी थी.

डीपीटी अपने किस्सों में बताते हैं कि गिरफ्तारी के बाद जब वे तिहाड़ जेल पहुंचे, तो सबसे पहले अरुण जेटली ने उनका स्वागत किया. अरुण जेटली दिल्ली यूनिवर्सिटी में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नेता थे. डीपीटी को देखते ही जेटली ने कहा था, "हम लोग तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहे थे. कहां थे? आओ. बैठो. बैठो." इस समय से ही अरुण जेटली और डीपीटी की दोस्ती की जीवन भर की दोस्ती की शुरुआत हुई.
अरुण जेटली और डीपीटी की गहरी दोस्ती के किस्से लम्बे हैं. और अक्सर डीपीटी राज्यसभा में भी जेटली से दोस्ती की बातें ज़ाहिर करते थे अरुण जेटली और डीपीटी की गहरी दोस्ती के किस्से लम्बे हैं. अक्सर डीपीटी राज्यसभा में भी जेटली से दोस्ती की बातें ज़ाहिर करते थे

इसके बाद डीपीटी धीरे-धीरे सीपीएम और छात्र संगठनों से दूरी बनाने लगे. डीपीटी को आना था राष्ट्रीय राजनीति में. साथ मिला कांग्रेस का. 80 के दशक में राजीव गांधी से करीबी बढ़ी. वही राजीव गांधी, जिनकी मां इंदिरा गांधी का विरोध करने के बाद डीपीटी को जेल जाना पड़ा था.
राजीव गांधी के निधन के बाद कांग्रेस पार्टी में नेतृत्त्व की कमी महसूस हुई. 1999 में लोकसभा चुनाव होने थे, पार्टी को एक चेहरे की ज़रूरत थी. पार्टी में सोनिया गांधी का नाम प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर लिया जाने लगा. इसी समय डीपीटी ने कांग्रेस पार्टी छोड़ दी. क्यों? क्योंकि सोनिया गांधी के विदेशी मूल का होना डीपीटी को मंज़ूर नहीं था. शरद पवार ने भी जमकर सोनिया गांधी का विरोध किया था. डीपीटी ने नई पार्टी चुन ली. आ गए शरद पवार के साथ राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में. डीपी त्रिपाठी बने NCP के राष्ट्रीय महासचिव और राष्ट्रीय प्रवक्ता.
राजीव गांधी के साथ डीपी त्रिपाठी

डीपीटी सिर्फ नेता ही नहीं, एक अच्छे स्कॉलर के रूप में जाने जाते रहे. कई साहित्यिक मंचों पर भी बुलाया जाता था. कई मौकों पर अपने सिग्नेचर सफारी सूट पहनकर पहुंचते थे. अपने भाषणों में संस्कृत कवि कालिदास और भास से लेकर फैज़ और मीर का ज़िक्र करते थे. 28 मार्च 2019 को राज्यसभा में डीपी त्रिपाठी का आखिरी दिन था. इस दिन उन्होंने विदाई भाषण दिया. जो बहुत वायरल हुआ, जमकर शेयर हुआ. उन्होंने भाषण की शुरुआत में कहा था,
"कई बार सच नंगा होता है. सख्त-खुरदुरा होता है. मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं कि पिछले छह सालों में सदन के कामकाज का करीब 48 फीसद हिस्सा बाधा पहुंचाने और हंगामेबाजी में बर्बाद हुआ है. हंगामेबाजी को सेमी-परमानेंट (करीब करीब स्थायी) रणनीति के तौर पर इस्तेमाल किए जाने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए. लोकसभा को देखिए. वो एक दिन के लिए भी स्थगित नहीं हुआ. वहीं राज्यसभा में स्थितियां सोच से भी परे हैं. हमें इसके लिए कुछ चीजें, कुछ इंतजाम करने होंगे. अध्यक्ष महोदय, ऐसे सदस्य जो कि वेल में नहीं जाते उनके साथ अच्छा व्यवहार होना चाहिए. उनका ख्याल रखा जाना चाहिए."
फिर उन्होंने कहा कि सदन में महिलाओं की संख्या कम है, तो महिलाओं के मुद्दे सदन में क्यों नहीं उठाए जाते हैं. और महिला सदस्यों को बोलने के लिए ज्यादा वक़्त क्यों नहीं दिया जाता है. उन्होंने कहा,
"मेरा सुझाव ऐसे कुछ मु्द्दों को लेकर है, जिनके बारे में कोई चर्चा ही नहीं होती. जिनके ऊपर कोई बात ही नहीं होती है. एक है न्यायपालिका. मैंने दो नोटिस दिए थे. हमने कभी न्यायपालिका पर बात नहीं की. हम न्यायपालिका पर बात करने, इसे लेकर बहस करने में इतनी हिचकिचाहट क्यों दिखाते हैं? इसके अलावा मीडिया का भी मुद्दा है. एक और भी मसला है. वो देश जहां कामसूत्र लिखा गया और जहां वात्स्यायन को ऋषि माना गया, जहां अजंता-एलोरा और खजुराहो हैं, वहां संसद ने सेक्स के बारे में सभ्य तरीके से कभी चर्चा नहीं की. हम क्यों डरते हैं? दो नेता हुए भारत में. एक महात्मा गांधी, जिन्होंने अपने तरीके से सेक्स पर बात की. दूसरे राममनोहर लोहिया. वो आखिरी नेता थे, जिन्होंने सेक्स के बारे में न केवल खुलकर बात की, बल्कि इसके बारे में लिखा भी. खासतौर पर महिलाओं के अधिकारों से जुड़े प्रसंगों में. लोहिया जी का प्रसिद्ध लेख है. लोहिया रचनावली खंड पांच में पढ़ लीजिए. योनि शुचिता और नर-नारी संबंध. एक शोध के मुताबिक, अगले पांच सालों में करीब 10 लाख युवा भारतीय सेक्स से जुड़ी बीमारियों की वजह से मर जाएंगे. लेकिन संसद इसके बारे में चर्चा करने, इस पर बहस करने से डरती है. क्यों?"
आप चाहें तो डीपीटी का उस दिन का पूरा वक्तव्य इस लिंक पर
जाकर पढ़ सकते हैं. नीचे वीडियो है, वो भी देख सकते हैं.

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