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सांसद ने संसद में कहा, 'संसद में सेक्स पर बात क्यों नहीं होती'

सांसद ने कहा - दो ही तो नेता हुए भारत में, जो खुलकर सेक्स से जुड़ी बातें करने की हिम्मत रखते थे.

संसद का जिक्र होते ही हंगामा याद आता है. फलां पार्टी के सांसद नारेबाजी करते हुए वेल में पहुंचे. सदन की कार्यवाही स्थगित. नेताओं की एक-दूसरे पर फब्तियां. ये ही सारी चीजें पढ़ने में आती हैं. ऐसा कम ही होता है, जब संसद में किसी नेता की कही बातें अच्छी लगें. ऐसा लगे कि वो कहा गया है, जो कहा जाना चाहिए था. किसी नेता का भाषण सुनकर अच्छा लगे. पॉजीटिव सा लगे. ये कभी-कभार होने वाली चीज राज्यसभा में हुई है.

नैशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी. शरद पवार मुखिया हैं इसके. इसी पार्टी के एक नेता हैं- डी पी त्रिपाठी. महाराष्ट्र के हैं. राज्यसभा से रिटायर हो गए हैं. 28 मार्च को राज्यसभा में इन्होंने अपना विदाई भाषण दिया. जाते-जाते कुछ जरूरी चीजें कह गए. बेहद जरूरी कुछ सवाल पूछ गए. कुछ बहुत जरूरी मुद्दे उठा गए. हमने उनके कहे को शब्दों में लिखा है. ताकि आप पढ़ सकें. विडियो देखना चाहें, तो इसका भी लिंक नीचे मौजूद है. पढ़िए:

भाषण के बीच में एक जगह डी पी त्रिपाठी ने महिलाओं से जुड़े मुद्दे उठाए. उन्होंने कहा कि पिछले छह सालों में एक बार भी इनके ऊपर विस्तार से चर्चा नहीं हुई. इसी समय पीछे से जया बच्चन की आवाज आई. वो कह रही थीं- चर्चा हुई ही नहीं.
भाषण के बीच में एक जगह डी पी त्रिपाठी ने महिलाओं से जुड़े मुद्दे उठाए. उन्होंने कहा कि पिछले छह सालों में एक बार भी इनके ऊपर विस्तार से चर्चा नहीं हुई. इसी समय पीछे से जया बच्चन की आवाज आई. वो कह रही थीं- चर्चा हुई ही नहीं.

सभापति महोदय,

मैंने सोचा कि आज बहादुर शाह जफर से शुरू करूं. लेकिन फिर मुझे एहसास हुआ कि अगर मैं कालिदास से शुरू करूं, तो मौजूदा चीजों को बेहतर तरीके से बता पाऊंगा. कालिदास रघुवंश के पंचम सर्ग में लिखते हैं. कि राजा रघु सबकुछ दान करके गरीब हो गए. उनके पास कुछ नहीं बचा. वो कह रहे हैं कि आपकी जो ये स्थिति है, वो सबसे अच्छी और आदर्श स्थिति है. जैसे कि देवताओं द्वारा पीये जाते हुए चंद्रमा की कलाओं का क्षय (यानी घटता हुआ चांद) उसकी वृद्धि (बढ़ते हुए चांद) से ज्यादा श्रेयस्कर होता है. कालिदास का श्लोक है:

साने भवाने कनराधिप्रहसण, अकिंचनत्वं मखजमवयक्ति
पर्याय पीतस्य सुरेर हिमांशो, कला क्षयस्य स्लाघ्र

मतलब इसका ये है कि प्राप्ति से बेहतर त्याग होता है. और आज मैं आपका समय अपने बारे में बात करके या अपने नेता श्री शरद पवार के बारे में बात करके नहीं नष्ट करूंगा. वो तो सब किताबों में लिखा हुआ है. मीडिया में है. लेकिन जीवन में राजनीति के 50 वर्ष पूरे करने के बाद, 1968 में जब 10वीं में पढ़ता था तब पहला प्रदर्शन किया और आज 2018 है. लेकिन मुझे वो दिन याद आता है सभापति जी, जब मुझे साढ़े चार महीने भूमिगत संघर्ष करने के बाद इमर्जेंसी में लाल किले में जांच के बाद तिहाड़ ले जाया गया. सुबह साढ़े चार बजे वहां मेरा स्वागत करने वाले व्यक्ति आज इस सदन के नेता हैं. वो हैं श्री अरुण जेटली. जिन्होंने साढ़े चार बजे कहा- आ गए, बहुत देर से इंतजार था. बैठो बैठो.

ऐसा साथ रहा है. मैं आप सभी का आभारी हूं. अध्यक्ष महोदय का, उपसभापति कूरियन साहब का, तमाम नेताओं का समय बचाने के लिए नाम नहीं ले रहा हूं. लेकिन इस सदन से इतना सीखने के बाद मैं आज अपनी भूमिकाओं की आलोचना करना चाहता हूं. हम क्या कर पाए और हम क्या नहीं कर पाए. स्वीडन के एक महान कवि टॉमस ट्रान्सट्रोमर हुए. उन्हें साहित्य का नोबेल प्राइज मिला था. संसद के कामकाज के बारे में बात करते हुए उनकी लिखी एक लाइन बड़ी सही मालूम पड़ती है. उन्होंने लिखा था कि सच को फर्नीचर (सजावट) की जरूरत नहीं पड़ती.

कई बार सच नंगा होता है. सख्त-खुरदुरा होता है. मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं कि पिछले छह सालों में सदन के कामकाज का करीब 48 फीसद हिस्सा बाधा पहुंचाने और हंगामेबाजी में बर्बाद हुआ है. हंगामेबाजी को सेमी-परमानेंट (करीब करीब स्थायी) रणनीति के तौर पर इस्तेमाल किए जाने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए. लोकसभा को देखिए. वो एक दिन के लिए भी स्थगित नहीं हुआ. वहीं राज्यसभा में स्थितियां सोच से भी परे हैं. हमें इसके लिए कुछ चीजें, कुछ इंतजाम करने होंगे. अध्यक्ष महोदय, ऐसे सदस्य जो कि वेल में नहीं जाते उनके साथ अच्छा व्यवहार होना चाहिए. उनका ख्याल रखा जाना चाहिए.

दूसरा मुद्दा ये है कि पिछले छह सालों में इस सदन के अंदर महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर गंभीरता से बात नहीं हुई है. और एक बात आप नोट कीजिए. और अभी आपने ही ध्यान दिलाया कि महिला सदस्यों की तादाद महज 11.7 फीसद है. जब वो बोल रही होती हैं, तब हम उन्हें ज्यादा समय क्यों नहीं दे सकते हैं?

फिर मेरा सुझाव ऐसे कुछ मु्द्दों को लेकर है, जिनके बारे में कोई चर्चा ही नहीं होती. जिनके ऊपर कोई बात ही नहीं होती है. एक है न्यायपालिका. मैंने दो नोटिस दिए थे. हमने कभी न्यायपालिका पर बात नहीं की. हम न्यायपालिका पर बात करने, इसे लेकर बहस करने में इतनी हिचकिचाहट क्यों दिखाते हैं? इसके अलावा मीडिया का भी मुद्दा है. एक और भी मसला है. वो देश जहां कामसूत्र लिखा गया और जहां वात्साययन को ऋषि माना गया, जहां अजंता-एलोरा और खजुराहो हैं, वहां संसद ने सेक्स के बारे में सभ्य तरीके से कभी चर्चा नहीं की. हम क्यों डरते हैं? दो नेता हुए भारत में. एक महात्मा गांधी, जिन्होंने अपने तरीके से सेक्स के ऊपर बात की. दूसरे राममनोहर लोहिया. वो आखिरी नेता थे, जिन्होंने सेक्स के बारे में न केवल खुलकर बात की, बल्कि इसके बारे में लिखा भी. खासतौर पर महिलाओं के अधिकारों से जुड़े प्रसंगों में. लोहिया जी का प्रसिद्ध लेख है. लोहिया रचनावली खंड पांच में पढ़ लीजिए. योनि शुचिता और नर-नारी संबंध. एक शोध के मुताबिक, अगले पांच सालों में करीब 10 लाख युवा भारतीय सेक्स से जुड़ी बीमारियों की वजह से मर जाएंगे. लेकिन संसद इसके बारे में चर्चा करने, इसपर बहस करने से डरती है. क्यों?

मैं संसद के दो सदस्यों का बहुत सम्मान करता हूं. एक राज्यसभा के राजीव गौणा. दूसरे लोकसभा के शशि थरूर. उन्होंने इन सवालों को उठाने की कोशिश की. ये जरूरी मुद्दे हैं. जब मैं राजनीति में अपने 50 सालों को याद करता हूं, तो महसूस होता है मैंने संसद से बहुत कुछ सीखा है. मुझे कई नेताओं का प्यार मिला. मुझे अटल बिहारी वाजपेयी का भी प्यार मिला. मैं नानाजी देशमुख के साथ कुछ समय तक जेल में रहा था. इमर्जेंसी के दौरान कितने सारे नेताओं का साथ मिला. इमर्जेंसी के बाद भी कई नेताओं का प्यार मिला. जैसे राजीव गांधी, हरकिशन सिंह सुरजीत, ज्योति बसु, चंद्रशेखर. कितनों का नाम लूं. ऐसा इसलिए कि लोकतंत्र इंसानी रिश्तों पर चलता है. ये सबसे अहम चीज है लोकतंत्र की. लोकतंत्र में और खासतौर पर संसद में ऐसा होना चाहिए कि सरकार अपने तरीके से काम करे, लेकिन विपक्ष की भी सुनी जाए.

मैं आपको राज्यसभा में अपने सबसे अच्छे दिन के बारे में बताऊंगा. हालांकि ये एक ट्रेजडी के वक्त की बात है. ये 2013 की बात है. तारीख थी 23 अगस्त. जब इस सदन ने नरेंद्र दाभोलकर की हत्या की निंदा करते हुए एकमत से प्रस्ताव पारित किया था. मैं उस समय सदन में विपक्ष के नेता रहे अरुण जेटली का शुक्रगुजार हूं. मैं तत्कालीन ट्रेजरी बेंच, यूपीए सरकार और खासतौर पर कांग्रेस पार्टी का भी शुक्रगुजार हूं. नैशनल मीडिया में संपादकीय लिखे गए. कि कैसे मैंने ऐसा करवाने में एक भूमिका निभाई. वो सबसे अच्छी याद है.

सदन के अंदर अपने सबसे निराश अनुभव के बारे में भी मैं आपको बताता हूं. एक बहस चल रही थी. ब्यूटी के ऊपर. शायद कुछ गलत शब्दों का इस्तेमाल किया गया था. मैं इस मुद्दे को ऊठाना चाहता था. इसी सिलसिले में मैंने कालिदास की लिखी कुछ पंक्तियां कहीं. सदन की कुछ महिला सांसदों ने (जिनमें से एक अब ट्रेजरी बेंच में भी हैं) मुझे चुप कराया. कि चुप हो जाइए, यहां ये सब मत बोलिए. कि ये लैंगिक भेदभाव है. कालिदास की लिखी पंक्तियों का जिक्र करना लैंगिक पक्षपात कैसे हो सकता है? आज जाते-जाते भी मैं जो आखिरी बात करना चाहता हूं, वो सुंदरता के बारे में है. राज्यसभा की सुंदरता के बारे में है. मेरे दिमाग में सुंदरता के बारे में सोचते हुए दो चीजें आ रही हैं इस वक्त. एक है तुलसीदास की रामचरितमानस से. जब राम पहली बार सीता की तरफ देखते हैं, तब वो क्या सोचते हैं? इसे तुलसीदास ने ऐसे लिखा है- सुंदरता कह सुंदर करई, छवि गृह दीपशिखा जिमि बरहीं. माने- वो सुंदरता को और सुंदर बना रही है, जैसे खूबसूरत चित्रकारी से भरे एक कमरे में दीया जला दिया जाए. और आखिरी चीज. ये संस्कृत में लिखी गई है.

क्षणै क्षणै यन नमतामुपयति, तदैव रूपम् रमणीयताया

वो चीज जो हर समय नई बनी रहती है, वो खूबसूरती है. राज्यसभा भी हर साल दो साल बाद नया रंग लेती है. नए सदस्य आते हैं. मैं सारे नए सदस्यों का स्वागत करता हूं.


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